आज भी घर के लिए तरस रहे भारतीय बर्मी

- Author, अनबरासन इथिरंजन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
मोहम्मद यूसुफ़ सरलान हर रोज़ थोड़ी दूर पर स्थित अपनी प्यारी मातृभूमि को देखते हैं.
लेकिन उनके लिए वहां जा पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि म्यांमार के सैनिक उन्हें अपने देश लौटने नहीं देते.
ऐसे कई बर्मी तमिल हैं जो शरणार्थी की तरह भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के शहर मोरेह में रह रहे हैं जिसकी सीमाएं म्यांमार से लगी हुई हैं.
म्यांमार में 1960 में सैन्य तख़्तापलट हुआ था जिसके बाद भारतीय मूल के ये तमिल म्यांमार छोड़ने पर मजबूर हो गए थे.
रंगून (अब यांगून) में रहने वाले 74 वर्षीय मोहम्मद यूसुफ़ सरलान और उनके ही जैसे तीन लाख़ लोगों को म्यांमार छोड़ना पड़ा और सरकार ने उनके व्यवसाय और संपत्ति को ज़ब्त कर लिया.
एक ही रात में ये सभी लोग सड़क पर आ गए.
सरलान कहते हैं, "जब हम भारत पहुंचे तो हमने तीन महीने तमिलनाडु में शरणार्थी के तौर पर बिताए."
उन्होंने बताया, "हालांकि तमिलनाडु हमारे पूर्वजों की धरती थी, लेकिन किसी के समर्थन के बग़ैर वहां रहना आसान नहीं था."
मजबूरी में छोड़ा बर्मा

कई सदियों से भारतीय बर्मा में रह रहे थे, लेकिन ब्रिटिश राज के दौरान बड़े पैमाने पर पलायन हुआ.
इन लोगों को अधिकारियों, व्यापारियों, किसानों, मजदूरों और कारीगरों की तरह इस्तेमाल किया जाता था.
बर्मा के लोग भारतीयों को हमेशा से शक की नज़र से देखते थे. 1930 में भारत विरोधी दंगे भी हुए थे.
1948 में बर्मा से अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारतीय मूल के लोग बहुत ही असुरक्षित हो गए और 1962 के तख़्तापलट के बाद उन्हें बर्मा छोड़ने को मजबूर होना पड़ा.
भारत में बसना इन सबके लिए मुश्किल साबित होने लगा इसलिए कई लोगों ने बर्मा वापस लौटने का मन बनाया.
कई हफ्तों तक तमिलनाडु से क़रीब 3200 किलोमीटर का सफर तय कर ये लोग मोरेह पहुंचे.
इसके बाद जब वो आगे बढ़े तो बर्मी सैनिकों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. इसलिए उन सभी लोगों ने मोरेह में डेरा डाल दिया.
'मिनी इंडिया'

सरलान बताते हैं, "मोरेह में जब हम आए थे तो यह एक आदिवासी गांव था. यहां कोई भी मूलभूत सुविधाएं नहीं थीं."
वो कहते हैं, "लेकिन बर्मा के कई लोग यहां कई भारतीय चीज़ों जैसे ऑटोमोबाइल के कलपुर्ज़े, कपड़े और प्रसाधन सामग्री ख़रीदने आते थे. चूंकि हमें बर्मी भाषा आती थी इसलिए हमारे लिए यहां व्यवसाय शुरू करना काफी आसान था."
इसके बाद यहां मौजूद लोगों ने अपने रिश्तेदारों को यहां बुलाना शुरू कर दिया जिससे व्यवसाय में मदद हो सके. 1990 तक मोरेह में बर्मी तमिलों की संख्या 15 हज़ार हो गई और इसे 'मिनी इंडिया' कहा जाने लगा.
चीनी उत्पाद और शिक्षा

इन तमिलों के व्यवसाय को तब धक्का लगा जब बर्मा की सरकार ने 1990 के मध्य में सीमा के नज़दीक नंफालॉन्ग में बाज़ार बनाया.
इस बाज़ार में चीनी उत्पादों की भरमार हो गई और लोग मोरेह की बजाए यहीं से सामान ख़रीदने लगे.
मणिपुर में व्यापारियों को विद्रोहियों से धमकियां भी मिलने लगीं.
जिन व्यापारियों ने इनकी बात नहीं मानी उन्हें मार दिया गया.

बढ़ती हिंसा और घटते व्यवसाय के चलते तमिलों ने मोरहे छोड़ना शुरू कर दिया, इसमें से कुछ चेन्नई चले गए.
अब मोरेह में केवल 3,500 तमिल ही बचे हैं. मोरेह के एक विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली छात्रा बी रेवथी का कहना है कि इलाके में पढ़ाई और रोज़गार की अधिक संभावनाएं नहीं हैं.
रेवथी कहती हैं, "अगर हमें पढ़ाई की सुविधा नहीं मिलेगी तो हमें कहीं और जाना ही पड़ेगा. यहां उच्च शिक्षा की सुविधा नहीं है."
वो बताती हैं, "यहां रहने वाली महिलाओं के पास शिक्षक बनने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. ऐसे में हमें मजबूरन चेन्नई जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है."
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