लाजवाब है ज़िन्दगी, शतरंज की बिसात पर

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- Author, इंदु पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
शाहजहाँ का बसाया चाँदनी चौक का दरीबा कलां जो आज भी अपनी चमक बरक़रार रखे हुए है.
यहां सोने चांदी की दुकान रविवार को बंद होती है और पटरी पर सामान बिकता नज़र आता है.
यहीं कुछ बंद दुकानों के आगे कुछ लोग दूसरी दुनिया में खोए हुए नज़र आ सकते हैं.
शतरंज की बिसात

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रविवार को कुछ लोग इन बंद दुकानों के आगे बड़े आराम से शतरंज की बिसात बिछा कर खेलते हैं.
सत्तर साल के एक बुज़ुर्ग का कहना है कि पिछले चालीस साल से तो वो ख़ुद ही इस जगहं हर रविवार को आ जाते है और अपने दूसरे साथियों के साथ शतरंज की बाज़ी खेलते हैं और बचपन से ये देखते आ रहे हैं.
कॉलेज में पढ़ने वाले उन्नीस साल के सागर शर्मा कहते हैं, "ये ठंडे दिमाग़ का खेल है, बड़ों के आशीर्वाद से अब जाकर इस खेल को सीखा है.''
मेरे पूछने पर की शतरंज के मायने क्या है तब सागर कहते हैं कि, ''ये सौ दुःख देती है, ये गणित है, दिमाग़ में शतरंज ही चलती है.''
रविवार इसकी बैठक में सागर जैसे और भी लोग आते हैं.

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आज़ाद चेस क्लब
थोड़ा आगे बढ़ते ही जामा मस्जिद के पास मीना बाज़ार के पास स्ट्रीट लाइट के नीचे एक पुराना बोर्ड लगा हुआ देखा जिस पर लिखा था- आज़ाद चेस क्लब 1932, जहाँ तीन शतरंज की बिसात बिछी हुई थी और लगभग आठ दस लोग बैठे शतरंज खेल रहे थे.

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अनिल शिवपुरी जो की इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं और लम्बे समय से यहां शतरंज खेलने आते हैं. आजकल शतरंज की कोचिंग करते हैं.
उनका कहना है कि, ''इस जगह पर कोई भी कभी भी आकर शतरंज खेल सकता है, अस्सी साल से लेकर अट्ठारह साल तक के लोग खेलते हैं और इस क्लब की कोई मेम्बरशिप फ़ीस भी नहीं है.''

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दिल्ली चेस एसोसिअशन के सचिव एके वर्मा मानते हैं की ये ''कई सालों से अपने मनोरंजन के लिए खेलते हैं अगर ये थोड़ा सेस्टीमेटिक हो जाए तो अच्छा होगा.''
जामा मस्जिद के मीना बाज़ार की सीढ़ियों पर शतरंज खेलने वाली राकेश शर्मा मानते हैं ''अगर सरकार इन पर ध्यान दे तो अच्छे खिलाडी निकल सकते हैं.''

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बहरहाल कोई कुछ कहे पर यहाँ के लोगों का यही कहना हैं कि पिछले सत्तर सालों से ये लोग इस खेल में अपनी बाज़ी चलते चले आ रहे हैं जिनको देखकर यही कह सकते हैं-
लाजवाब हूँ ज़िन्दगी तेरे ख़्याल पे
सौ दर्द हैं, सौ हमदर्द भी, सौ सवाल, सौ रंज भी, शतरंज भी.
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