एक सुपरस्टार और उसकी एकांत की महफ़िल..

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- Author, संजय छैल
- पदनाम, फ़िल्म लेखक और निर्देशक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
1996-97 की एक बरसाती शाम. मुंबइ लिंकिंग रोड का ऊंचा मकान. ऑफ़िस बिल्कुल ख़ाली.
पुराना फ़र्नीचर अतीत की शान की गवाही देती है. दीवार पर राजेश खन्ना का खिलखिलाता हुआ फोटो है. उसमें बसी चार्मिंग स्माइल और आंखों की चमक देख कर मेरे मुंह से निकल जाता है,"वाह! क्या तस्वीर है!"
उसी समय, खिड़की के पास खड़ा एक आदमी पलटकर कहता है,"क्यूट है ना? एक ज़माने में मुझे भी यह आदमी बहुत पसंद था."
ये शख़्स राजेश खन्ना ही थे. सफ़ेद कुर्ता, हाथ में सिगरेट और खिड़की के बाहर ढलती शाम का धुंधला आसमां, उनकी मुस्कुराहट कुछ ऐसी कि सामने वाला हमेशा के लिए मुस्कुराहट में क़ैद हो जाए.
वो अपनापन...

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धीमे मद्धम स्वर में बातें, बातों में उत्साह, संजय से संजू बोलने की अदा और नज़रों से ऐसा सम्मोहन कि आप समझ जाएंगे कि राजेश खन्ना को सुपर स्टार बनाने वाला जादुई फॉर्मूला क्या थाः एक चुंबकीय चार्म, कमाल की कशिश!
सिर्फ दो मिनटों में अपनापन का अटैक कर उन्होंने मुझे हमेशा के लिए अपना बना लिया.
मैं तो उनके घमंड, अंहकार के किस्से सुनकर डरते-कांपते उनके पास गया था, पर उनकी मिठास ने मुझे मोह लिया.

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होठों के कंपन से, आंखे नचाते हुए बोले, "पॉलिटिक्स में तो मुझे राजीव गांधी खींच के ले गए, वर्ना 30-35 सालों से इन रगों में सिर्फ सिनेमा ही है. अब मुझे सिर्फ फ़िल्में करनी हैं, तुम फ़िल्म शुरू करो. कहानी लेके आ जाओ, प्रोड्यूसर मिल जाएगा…ये काका का वादा है!"
तब तो मैं आदर के साथ बहाना बना वहां से निकल आया. पर कुछ दिनों के बाद, एक शाम उनका फ़ोन आया, "अरे संजू, फ़िल्में-शिल्में तो होती रहेंगी…कभी एकाध शाम मिलने तो आओ, बैठ के साथ में खाएंगे-पिएंगे. यक़ीन करो, मज़ेदार आदमी हूँ मैं."
मैं हिल गया! जिसके घर यश चोपड़ा से लेकर ह्रषिकेश मुखर्जी तक बॉलीवुड के 15-20 निर्माता-निर्देशकों की भीड़ हर रोज लगती थी, उस सुपर स्टार का ऐसा अकेलापन देख कर मैं सहम गया.
बंगला बेचने की अफवाह

मस्त महफ़िलों का शहंशाह अब हर शाम अपने एकांत की महफ़िल सजा कर, अपने श्रोताओं के आने का इंतज़ार करता रहता था!
कुछ साल पहले अफ़वाह उड़ी थी कि राजेश खन्ना अपना बंगला 'आशीर्वाद' बेचना चाहते हैं.
सलमान खान को जब पता चला तो उन्होंने काका तक मैसेज पहुंचाया कि वो बंगला खरीदना चाहते हैं!
एक दिन, देर रात, सलमान के भाई सोहेल को काका ने फ़ोन लगा कर अपने अंदाज़ में कहा, "ऐसा कैसे सोचा कि मैं बंगला बेचूंगा? कभी कोयल अपनी कूक बेचती है? कभी समंदर अपनी लहरें बेचता है? कभी राजा अपना बंगला बेचता है?"
ये थी राजेश खन्ना की अदा!
काम पर लौटने की खुशी

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खैर, उनके जाने के बाद उसी बंगले को बेचा गया है, यह अलग बात है.
मैं ख़ुशनसीब हूँ कि काका के साथ काम करने का मौका मिला. मैंने एक दक्षिण भारतीय फ़िल्म का एक रीमेक बनाया था 'क्या दिल ने कहा?'
उस फ़िल्म में हीरो तुषार कपूर के पिता के रोल के लिए राजेश खन्ना मेहमान कलाकार बनने पर राजी हो गए.
शायद बहुत साल बाद वो काम कर रहे थे, तो वो अपने किरदार के लिए जूते, कपड़े को लेकर वो बार बार बड़े उत्साह से फ़ोन करने लगे!
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