अकेली लड़की और दिल्ली के रेस्तरां!

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भारत में एक अकेली महिला के लिए राजधानी दिल्ली में बाहर खाना खाना काफ़ी दिक्कत भरा साबित हो सकता है.
पब्लिक रिलेशन प्रोफ़ेशनल और लेखिका अनसुया बासु को कुछ ऐसा ही महसूस हुआ.
पढ़िए उनके अनुभव उन्हीं की ज़ुबान में.
चुनौती
मुझे लगता है कि लोग सोचते होंगे कि मैं अकेली अविवाहिता हूँ या फिर अपनी क़िस्मत का ताला खोलने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रही हूँ, जब मैं गहरी सांस भरकर वेटर से कहती हूँ, "एक जन के लिए टेबल मिलेगी?"
जब मैं टेबलों की भूल-भुलैया में से निकलती हूँ और बड़बड़ाते हुए मेहमानों को बैठे रहने को कहती हूँ तो अक्सर रेस्तरां मैनेजर या वेटर मुझे सतर्क होकर देखते हैं.
दिल्ली के किसी भी लोकप्रिय रेस्तरां में अनमने वेटर्स और सपाट चेहरे वाले मैनेजरों से एक जन के लिए टेबल के लिए बात करना एक चुनौती ही है.
दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए मशहूर एक लोकप्रिय भोजनालय में एक वेटर ने पूछा, "एक के लिए, मैडम?"
यह एक काम वाला दिन था, वक़्त भोजनावकाश का था और रेस्तरां तेजी से भर रहा था.
साफ़ तौर पर मेरा स्वागत करने का अनिच्छुक फ़्लोर मैनेजर कई खाली टेबलों के पास से गुज़रा, कुछ बेहूदे तर्क दिए और भयंकर गर्मी में मुझे रेस्तरां के बाहर इंतज़ार करने को कहा.
मैंने हटने से इनकार कर दिया. तुरंत वरिष्ठ प्रबंधक से बात की गई और मुझे एक टेबल दे दी गई, लेकिन क्षमा का एक शब्द भी नहीं कहा गया.
तनाव और विरोध साफ़ दिख रहा थी. कोई भी मेरा ऑर्डर लेने नहीं आया. लोग मेरा चेहरा देख रहे थे ताकि परेशानी का कोई भाव नज़र आ जाए.
करीब 15 मिनट बाद एक अनिच्छुक वेटर मेरा ऑर्डर लेने आया.
मैं उनकी पसंदीदा ग्राहक नहीं थी, जो कई बातूनी दोस्तों के साथ हो और काफ़ी पैसा खर्च करने वाली हो, बल्कि चार लोगों वाली टेबल को घेरकर उनकी आमदनी कम करने वाली थी.
खाना खा रहे दूसरे लोग भी मेरी ओर देख रहे थे.
लेकिन मुश्किल तब और बढ़ गई जब वेटर ने मेरी टेबल पर मेरे साथ बैठने के लिए दो और लोगों को भेज दिया, बिना मुझसे पूछने की ज़हमत उठाए.
मैं उस जगह के मैनेजरों से बहस करने की मनःस्थिति में कतई नहीं थी, इसलिए तुरंत भुगतान किया और यह कसम खाते हुए निकल गई कि अब वापस नहीं आउंगी.
'फ़ाइव स्टार तक नहीं'

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मध्य दिल्ली में एक 60-साल पुराना महंगा रेस्तरां जिसे लोनली प्लेनेट पर प्रमुखता से दिखाया जाता है, वह कहता है, "इत्मीनान से स्वाद लें और अलग तरह का अहसास लें."
लेकिन यह अपने बड़े-बड़े दावों पर ख़रा नहीं उतरता.
वे अकेले खाने वाली महिलाओं को पसंद नहीं करते, आपको टेबल देने को तैयार नहीं होते. अगर आप अड़ जाती हैं तो चुपके से आपको कमरे के कोने में एक टेबल पर बैठा देते हैं जिसमें धीमी रोशनी होती है और सामान्यतः बीयर पी रहे तेज़ आवाज़ में बोलने वाले आदमियों से घिरी होती है.
इस अंधेरे कोने में आप चार लोगों की टेबल पर अकेली बैठी होती हैं और धीमी सी सीटियों, घूरती निगाहों और अट्टहासों का निशाना होती हैं. वेटर मंद-मंद मुस्कुरा रहा होता है और पूछ रहा होता है कि क्या आप अल्कोहल वाले पेय पदार्थ लेना चाहेंगी.
मैंने उस टेबल पर जाने से इनकार कर दिया, वरिष्ठ प्रबंधक से बात की और दो लोगों वाली टेबल ले ली. एक जिन टॉनिक ऑर्डर किया और अपना दिन का खाना खाने के लिए बैठ गई.
मैं जानती थी कि मेरे आसपास लोग मुझे घूर रहे हैं लेकिन मैंने उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया. कुछ देर बाद मुझे वह सब फ़र्नीचर जैसे लगने लगे.
अगर आप किसी पुरुष साथी के साथ आएं तो मैनेजरों और स्टीवर्ड्स की यही नस्ल आपका बहुत गर्मजोशी से स्वागत करती है.
फ़ाइव स्टार होटल्स का नज़रिया भी जुदा नहीं है.
नम्रता के आवरण के नीचे स्टीवर्ड्स आप पर लगातार नज़र रखते हैं और नियमित अंतराल पर पूछते रहते हैं कि आप ठीक तो हैं और कुछ चाहिए तो नहीं.
फ़ूड राइटर और ब्लॉगर पारुल शिराज़ी कहती हैं, "मैं बाहर खाना खाने अकेले बमुश्किल ही जाती हूँ और रात को अकेले बाहर खाने जाने से बचती हूँ. एक बार मैं एक फ़ाइव स्टार होटल में जल्दी पहुंच गई और रात के खाने पर अपने पति का इंतज़ार कर रही थी. वेटर हर कुछ मिनट पर मुझसे पूछता रहा कि मैं ठीक तो हूँ."
"मुझे दौरा नहीं पड़ रहा था. मैंने उसे बताया और कहा कि अगर ज़रूरत होगी तो उसे इशारा कर दूंगी. मुझे नहीं लगता कि वह किसी पुरुष मेहमान के साथ ऐसा बर्ताव करते होंगे. मैं खुद को यह सोचने से नहीं रोक पाई कि वह चाहते थे कि मैं वहां से चली जाऊं."
यकीनन, कुछ अपवाद भी हैं.
पब और बार

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उदाहरण के लिए दक्षिणी दिल्ली में एक छोटे रेस्तरां का माहौल, एक ख़ुशनुमा बदलाव था.
मणिपुर की मैरी लैलबोइ एक रेस्तरां कमाल की सहजता से चलाती हैं. उनकी एक महिला शेफ़ और एक महिला रेस्तरां मैनेजर भी हैं.
वह विशेष प्रयास करती हैं कि खाने आने वाली महिलाएं आराम से रहें, अगर अकेली हैं तो अजीब महसूस न करें. वह अन्य ग्राहकों के साथ ही अक्सर अकेली महिला ग्राहकों के पास रुक जाती हैं बतियाती हैं.
वह कहती हैं, "मैं कभी भी किसी महिला ग्राहक को वापस नहीं लौटाती, चाहे रेस्तरां कितना ही भरा हुआ क्यों न हो. मैं अपनी सेवा की गुणवत्ता और अपने ग्राहकों की साख के बूते एक ब्रांड बनाना चाहती हूँ. लाभ महत्वपूर्ण है लेकिन सब कुछ नहीं है."
शहर में बार आदमियों के गढ़ हैं. किसी बार में शाम को शराब पीती किसी महिला को देखकर उससे ज़्यादा सिर घूमेंगे और व्यंग्य बाण छोड़े जाएंगे जितना किसी आदमी को सार्वजनिक रूप से चुंबन लेते देखकर.
हालांकि पब्स और बार हफ़्ते में एक दिन सिर्फ़ महिलाओं के लिए रखते हैं और उन्हें मुफ़्त ड्रिंक्स भी देते हैं लेकिन किसी अकेली महिला के लिए परेशान किए गए बगैर अपनी मर्ज़ी की शराब पीना और अपनी पसंद की टेबल पर खाना खाना अब भी दूर की कौड़ी है.
सार्वजनिक स्थान पर अपना दावा करने की कोशिश को मैंने विद्रोह के स्तर को बढ़ा दिया है. अब मैं अपने कदम वापस खींचने से इनकार करती हूँ.
अकेली टेबल एक लोग के लिए उतनी ही मज़ेदार है जितनी दो लोगों के लिए.
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