दलित अत्याचार की ख़बरों से बोर हो चुके हैं?

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, डांगावास से
क्या आप सालों से दलितों पर अत्याचार की ख़बरें पढ़ कर बोर हो चुके हैं? मेरे काफ़ी ऐसे दोस्त जो मीडिया से नहीं जुड़े हैं कहते हैं, हाँ.
बोर हो गए लोगों को भले ही दिलचस्पी न हो लेकिन ये सच है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ रही है, साल दर साल.
इससे भी गंभीर समस्या ये है कि उनके ख़िलाफ़ हमलों में ग़िरफ्तार होने वाले अक्सर रिहा हो जाते हैं.

क़ानून ठीक है लेकिन इसके पालन में खोट है.
पिछले दिनों राजस्थान के नागौर ज़िले के डांगावास गाँव में 5 लोगों की हत्या दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार का अकेला किस्सा नहीं था. राज्य में ऐसे किस्से बार-बार दुहराये जा रहे हैं.
लगभग तीन महीने पहले इसी ज़िले के बासवानी गाँव में एक 80 साल की दलित महिला को जिंदा जला दिया गया.
उनके बेटे बाबूलाल मेघवाल अब भी इस इंतज़ार में हैं कब उनकी माँ के हत्यारों को कब गिरफ़्तार किया जाएगा.
कमज़ोर दलित आवाज़

मैं पिछले 24 सालों से गाहे बगाहे दलित-अत्याचार की कहानियों पर काम करता आया हूँ लेकिन अब तक बोर नहीं हुआ हूँ.
दलित आवाज़ अब भी कमज़ोर है. मीडिया की सुर्ख़ियों में वो उसी समय आते हैं जब उनकी हत्याएं होती हैं या वो धर्म परिवर्तन पर उतारू हों.
समाज और सरकार तक उनकी आवाज़ सुनी नहीं जाती. केवल मानव अधिकार संस्थाओं ने उनकी कहानी को ज़िंदा रखा है.
राजस्थान में पुष्कर के निकट डांगावास गाँव जाटों का गढ़ है. वहां 14 मई को ज़मीन के एक मामले में हुई हिंसा में 5 दलितों की हत्या कर दी गयी और दर्जन भर घायल हो गए.
'वहशियाना तरीका'

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हर ज़ख़्मी के दोनों पैर और दोनों हाथ तोड़ डाले गए हैं. जो मारे गए उन पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया गया.
मैंने इस हिंसा के फ़ौरन बाद का रिकॉर्ड किया हुआ एक वीडियो देखा जिसमें एक व्यक्ति का एक पैर काट दिया गया था.
एक और व्यक्ति अपनी जांघ से बहे खून में लथपथ ज़मीन पर पड़ा दर्द से कराह रहा था. वो बच नहीं सका.
वीडियो में देखा कि एक ट्रैक्टर जल रहा था और कुछ मोटर साइकिलें भी.
इस वीडियो को रिकॉर्ड करने वाले स्थानीय पत्रकार ने कहा कि दलितों पर हमला करना एक बात है लेकिन उन्हें इस वहशियाना तरीके से मारना समझ में नहीं आने वाली बात है.
दलितों पर हमले क्यों?

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मानव अधिकार संस्था पीयूसीएल की कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि दलितों की पिटाई और हत्या उन्हें सबक सिखाने के उद्देश्य से की गयी थी. उनके अनुसार ये पैग़ाम राजस्थान भर के दलितों के लिए था.
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में में दलितों के लिए काम करने वाली एक संस्था से जुड़े बद्री नारायण कहते हैं कि दलित जब भी अपने अधिकार को मनवाने का साहस करता है उस पर हमला होता है.
डांगावास में भी ज़मीन को लेकर हिंसा हुई. एक ज़मीन पर जाट खेती करते थे लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में ये ज़मीन एक दलित परिवार के नाम थी.
जब दलित अपने अधिकार को जताने के लिए ज़मीन पर धरना देने गए तो उसके कुछ दिनों बाद उनपर हमला हुआ.
दलित के अधिकार

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राजस्थान दलितों पर अत्याचार में देश भर में पहले नंबर पर है.
यूँ तो ऐसे कोई सरकारी आंकड़े नहीं जुटाए गए हैं जिससे ये पता चले कि राजस्थान में दलितों कि कितनी ज़मीनों पर ऊंची जाति के लोगों का कब्ज़ा है लेकिन कविता श्रीवास्तव कहती हैं ऐसे उदाहरण हज़ारों की तादाद में हैं.
कविता कहती हैं कि ये मामला गंभीर है. आज का दलित अपने पिता और दादा के ज़माने का दलित नहीं है जो सारे अत्याचार सह लेगा. उनका कहना था कि आज का युवा दलित अपने अधिकार को मांगने के लिए अब और आगे आएगा.
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