मिर्चपुर: चुनाव में दिलचस्पी नहीं

सजना, मिर्चपुर, हरियाणा

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    • Author, दलजीत अमी
    • पदनाम, मिर्चपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

हरियाणा के मिर्चपुर गांव में साल 2010 में दलितों की बस्ती के कई घर जलाए जाने की घटना ने सभी को स्तब्ध कर दिया था.

21 अप्रैल, 2010 को घटी यह घटना भारत में दलित उत्पीड़न का प्रतीक सी बन गई.

इस गांव की दलित बिरादरी के लोग हिसार में झुग्गी-झोपड़ी में रह रहे हैं और सरकार से रिहायशी प्लॉट की मांग कर रहे हैं.

हरियाणा में हो रहे विधानसभा चुनाव को लेकर ज़्यादातर गांव वालों में कोई उत्साह नहीं है.

चार साल पहले घटी घटना का डर उनके मन से अभी तक नहीं गया है.

पढ़ें पत्रकार दलजीत अमी की रिपोर्ट विस्तार से

मिर्चपुर, गांव, दलित, हरियाणा

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28 वर्षीय रानी अपने दो से बारह साल के बच्चों के साथ एक झोपड़ी में रहती हैं. रानी 2010 में अपने गांव मिर्चपुर से तब आईं थी जब जातीय हिंसा में दलित वाल्मीकि समुदाय की बस्ती के घर जला दिए गए थे.

हिंसा में तारा चंद और उनकी बेटी सुमन को ज़िंदा जला दिया गया था.

हिसार के कैमरी रोड से थोड़ा हटकर हरियाणा जनहित कांग्रेस(एचजेसी) नेता वेद पाल तंवर के साथ मिर्चपुर के दलित समुदाय के लोग बैठे हैं.

वेद पाल तंवर तोशान विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं. हिसार में बैठे मिर्चपुर के दलित समुदाय के वोट नारनौंद क्षेत्र में हैं.

इन हालत में नलवा के एचजेसी उम्मीदवार चन्दर मोहन का रोड शो कैमरी रोड से गुज़र रहा है. रोड शो और दलित समुदाय की एक-दूसरे में कोई दिलचस्पी नहीं लगती.

इस बस्ती में चुनाव की एकमात्र निशानी लोकसभा चुनाव का इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का चुनावी फ्लेक्स है जो एक झुग्गी की छत पर पानी रिसने से रोकने का काम कर रहा है.

वापस नहीं जाना

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रानी अपने बच्चों को संभालते हुए उस दिन को याद करती हैं जब जाट समुदाय ने उनके घरों पर हमला किया था. वह किसी हालत में मिर्चपुर नहीं लौटना चाहतीं.

उनका नाम मिर्चपुर की वोटर सूची में दर्ज है. 29 वर्षीय रीना की कहानी भी रानी जैसी ही है.

वह हिसार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में सफाई कर्मचारी हैं और कभी मिर्चपुर नहीं जाना चाहतीं और ना किसी को वोट डालने के बारे में सोच रही हैं.

80 वर्षीय सूबे सिंह स्वास्थ्य विभाग से सेवामुक्त हुए हैं और वेद पाल तंवर की इच्छा मुताबिक़ वोट देना चाहते हैं.

उन्हें उम्मीद है कि कोई उनको वोट डालने के लिए मिर्चपुर ले जाने का बंदोबस्त करेगा.

तंवर फार्म की दलित बस्ती से पचास किलोमीटर दूर मिर्चपुर में वाल्मीकि बस्ती में केंद्रीय सीमा सुरक्षा बल की चौकी बनी हुई है.

औरतें सरकारी नल से पानी भर रही हैं. गलियों की नालियाँ किनारों से बाहर उछल रही हैं. सुअर और मुर्गियां घूम रही हैं. यहीं पर तारा चंद और सुमन का घर है.

घर है, घरवाले नहीं

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सरकार ने नया घर बनवा कर ऊपर तारा चंद का नाम लिख दिया है. नाम मिट रहा है और दरवाज़े खुले पड़े हैं.

तारा चंद के पड़ोसी सजना बताते हैं की इस घर में कभी कोई नहीं रहा. तारा चंद का परिवार हिसार में रहता है. उन्हें यहाँ सरकारी नौकरी और घर मिल गए हैं.

मिर्चपुर में मुख्य सड़क पर कुछ दुकानें हैं. यहां गांव के कुछ लोग बैठे हैं. पत्रकार के रूप में परिचय देने पर यहाँ के लोग तुरंत 2010 से बात शुरू करते हैं.

जाट समुदाय के ईश्वर कहते हैं कि दलित उनके साथ प्यार से रहते हैं और आज भी दलित औरतें उनके खेतों में कपास चुनने गई हैं.

ईश्वर के साथ बैठे पंडित बिरादरी के सुरेश कुमार कहते हैं कि मामला पत्रकारों ने ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है.

वो कहते हैं, "उसके बाद या पहले ऐसा कुछ नहीं हुआ. उसके बाद जाट बिरादरी ने कितनी बार माफ़ी मांगी पर मीडिया उसकी बात नहीं करता."

पत्रकारों पर सवाल

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सजना भी पत्रकारों पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, "दुनिया भर के पत्रकार बयान तो ले जाते हैं पर उससे वाल्मीकियों को कोई फ़ायदा नहीं होता."

सजना बताते हैं कि पहले वह भी गांव छोड़ कर चले गए थे पर एक सप्ताह बाद ज़्यादातर लोग वापस आ गए थे.

उन्होंने कहा, "हम भयभीत हैं और केंद्रीय सीमा सुरक्षा बल की मदद से रह रहे हैं. अगर ये नहीं रहेंगे तो हम चले जाएंगे. सरकार अगर हमें रहने के लिए शहर में मकान दे दे तो हम अभी चले जाएंगे."

सजना की गली में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, एचजेसी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, और इनेलो के इश्तिहार लगे हैं. ज़्यादातर मर्द-औरतें खेतों में दिहाड़ी करने गए हैं.

डर तो लगता है

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इमेज कैप्शन, सरकार ने तारा चंद का घर बनवाकर उसपर उनका नाम लिखा दिया है लेकिन घर में कोई रहता नहीं है.

सजना ने कहते हैं, "काम तो हम जाटों के खेतों में ही करते हैं. उस के बाद तो कुछ भी नहीं हुआ पर हमें डर तो लगता है."

चुनाव के बारे में पूछने पर सजना ने बताया, "सभी अपनी-अपनी मर्जी से मतदान करेंगे. अगर इकट्ठे होते तो हमें क्या कमी होती."

सजना बात मिर्चपुर की कर रहें हैं पर उनकी धारणा हरियाणा के बीस फ़ीसदी दलितों पर भी कमोवेश लागू होती हैं.

मिर्चपुर ने केवल दलित उत्पीड़न का बल्कि दलित राजनीति की भी प्रतीक बन गया है.

मिर्चपुर के दलितों को पिछले कुछ सालों में कुछ हासिल हुआ हो, या न हो उन्होंने कम से कम पत्रकारों से पलटकर सवाल करना ज़रूर सीख लिया है.

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