शायद अब पार्टी से भी निकाले जाएँ: प्रशांत

आम आदमी पार्टी और उसके संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण की राहें अलग होती हुई दिख रही हैं.
हालांकि राजनीति में सब कुछ खत्म होने तक संभावनाएं जीवित बनी रहती हैं पर धीरे धीरे ये साफ़ होता जा रहा है कि आम आदमी पार्टी अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मुताबिक ही चलेगी.
बीबीसी हिंदी के राजेश जोशी ने एक्टिविस्ट एडवोकेट कहे जाने वाले प्रशांत भूषण से कई राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बातचीत की है.
पेश है पूरी बातचीत
लोग कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने देश के लोगों को जो सपने दिखाए थे, उन्हें चूर चूर करने में जितना हाथ अरविंद केजरीवाल का है, उतना ही प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव का भी. हालांकि अभी वे सपने पूरी तरह से टूटे नहीं हैं.

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आम आदमी पार्टी एक मक़सद से बनी थी, वो इसलिए नहीं बनी थी कि दूसरी पार्टियों की तरह सिर्फ चुनाव जीतकर सत्ता पा ले.
आम आदमी पार्टी एक वैकल्पिक राजनीति स्थापित करने के लिए, ऐसी राजनीति जिसमें पारदर्शिता हो, जवाबदेही हो और जो एक ईमानदार राजनीति स्थापित कर सके, उसके लिए बनाई गई थी.
हम लोगों ने देखा कि धीरे धीरे करके उन्हीं उसूलों से आम आदमी पार्टी बिछड़ती जा रही थी.
हमने उसको ठीक करने की मुहिम शुरू की तो हमें पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति, फिर नैशनल इग्ज़ेक्यटिव और शायद अब पार्टी से भी निकाल दिया जाएगा.
सपने तो वहीं चूर होने लगे जब अपने उसूलों से पार्टी बिछड़ने लगी.

आपने 2012 में पार्टी शुरू की और 2015 आते-आते पार्टी में इतनी उथल पुथल मच गई कि वो टूट के कगार पर है. क्या ये बहुत जल्दबाजी नहीं थी?
अगर ये दिखने लगे कि पार्टी में पारदर्शिता खत्म होती जा रही है, उसमें लोकतंत्र के बजाय एक आदमी की तानाशाही चल रही हो और अगर आप उससे जूझने की कोशिश करें और आपको निकाल दिया जाए तो उसके लिए आप कैसे जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं.
पार्टी के उसूलों का मतलब...भ्रष्टाचार खत्म हो, पारदर्शिता हो, लीडरशिप अलग अलग लोगों में बंटी हुई हो, इन उसूलों की बात आप कर रहे हैं.
एक उसूल था जिस पर पार्टी खड़ी की गई है, वो स्वराज है. इस नाम से एक किताब अरविंद ने ही लिखी है.
इसमें लिखा था कि लोकतंत्र विकेंद्रीकृत होना चाहिए लेकिन पार्टी में न तो राज्य की इकाई को स्वायत्ता दी जा रही थी और वॉलेंटियर्स को तो बिलकुल इन्वॉल्व किया ही नहीं जा रहा था.

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पार्टी के आंतरिक संघर्ष को लेकर अरविंद केजरीवाल के करीबी कहे जाने वाले आशुतोष ने एक ट्वीट किया था कि पार्टी में अतिवामपंथी ताकतों और विकासवादी शक्तियों के बीच है. उनका इशारा आपकी और योगेंद्र यादव की तरफ़ था.
इसके बारे में पार्टी में कभी चर्चा ही नहीं हुई बल्कि पार्टी बनाते वक्त तय किया गया कि हमें अपनी नीतियां बनानी होंगी.
इसके लिए 34 कमेटियां बनी थीं जिनकी रिपोर्टें दो साल से पार्टी दफ्तर की धूल खा रही हैं.
सवालः- क्या आप मानते हैं कि आप अतिवामपंथी हैं और अरविंद केजरीवाल, आशुतोष और कुमार विश्वास वगैरह विकासवादी लोग हैं.
आशुतोष, आशीष खेतान, अरविंद केजरीवाल की कोई विचारधारा है या नहीं, मैं ये नहीं जानता.
जहां तक मेरी बात है मैं लेफ्ट ऑफ़ सेंटर हूं, मैं अपने आप को अतिवामपंथी बिलकुल नहीं मानता.

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शांतिभूषण ने कहा था कि अजय माकन और किरण बेदी मुख्यमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल से बेहतर उम्मीदवार हैं. ये अरविंद के आरोप हैं.
उनके इस बयान के एक घंटे के भीतर ही मैंने कहा था कि मैं इससे सहमत नहीं हूं.
लेकिन बाद में जिस तरह से चीजें आई हैं, पार्टी के उसूलों का हनन होता रहा और उसे ठीक करने की कोशिश नहीं की गई.
आज ये सवाल जरूर उठता है कि शांतिभूषण जी ने जो कहा क्या वह सही है.
क्योंकि इतना मैं कह सकता हूं कि किरण बेदी और अजय माकन इस तरह का 'लफंगापन' और इस तरह की 'गुंडागर्दी' को इनकरेज नहीं करते जो नैशनल काउंसिल की मीटिंग में हुई थी.
तो क्या अब एक नया रास्ता, एक नई पार्टी? आप, और योगेंद्र यादव और शांतिभूषण मिलकर एक नई पार्टी बनाएंगे.
मेरे लिए और मेरे पिता जी के लिए और योगेंद्र यादव के लिए भी सबसे आसान तरीका तो ये है कि हम लोग जो काम पहले करते थे, वो करते रहें.
लेकिन हिंदुस्तान के हज़ारों लोगों के खून पसीने से एक आदर्श के साथ इस पार्टी का गठन किया गया था. वो लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
मेरी राय में नई राजनीतिक पार्टी के गठन का ये समय नहीं है.

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अरविंद पार्टी का चेहरा हैं, उनका जनाधार ज्यादा है. ये आप भी जानते हैं और अरविंद भी जानते हैं.
आम आदमी पार्टी का गठन इसलिए नहीं किया गया था कि आप एक तानाशाह को ऊपर बिठाकर, पारदर्शिता, स्वराज और जवाबदेही को ताक पर रखकर सिर्फ राजनीति करते रहें.
अरविंद केजरीवाल से संवाद की किसी तरह की कोई गुंजाइश.
अब संवाद की गुंजाइश करीब करीब खत्म हो चुकी है.
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