केजरी को अपना 'आपा' खोने की छूट..?

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- Author, श्रवण गर्ग
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
अरविंद केजरीवाल अगर 'तानाशाहों' की तरह से काम करते हुए 'आम आदमी पार्टी' को चलाना चाहते हैं... और अपने विरोधियों के साथ उसी तरह का व्यवहार करना चाहते हैं जैसा कि शनिवार को नई दिल्ली में पार्टी के कतिपय प्रमुख संस्थापक सदस्यों के साथ किया गया तो उन्हें ऐसा करने की छूट मिलनी चाहिए.
अरविंद केजरीवाल को अपने काम करने का तरीक़ा प्रजातांत्रिक रखना चाहिए या नहीं इसका फ़ैसला अब दिल्ली की जनता पर छोड़ देना चाहिए.
प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और अजीत झा को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया और दिल्ली की जनता ने इसका कोई विरोध नहीं किया, सड़कों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं हुई.
मान लिया जाना चाहिए कि अरविंद जो कुछ भी कर रहे हैं उसे दिल्ली के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है.
आंतरिक प्रजातंत्र कहीं नहीं
सिद्ध हो रहा है कि जनता की नब्ज़ पर अरविंद की पकड़ प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के मुक़ाबले ज़्यादा मज़बूत है. अरविंद जो कुछ भी कर रहे हैं उसे उनकी तत्कालिक मजबूरी भी माना जा सकता है.
उन्हें पार्टी भी चलानी है और जनता से किए गए वायदों को पूरा करके भी दिखाना है. और फिर आंतरिक प्रजातंत्र और पारदर्शिता आज किसी और पार्टी में भी तो नहीं है.

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आज की तिकड़मा राजनीति में बने रहने के लिए अरविंद केजरीवाल अगर दूसरी पार्टियों की तरह के ही हथकंडे अपनाना चाहते हैं तो समझ लिया जाना चाहिए कि उनके निशाने पर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव नहीं बल्कि वो ताक़तें हैं जो आम आदमी पार्टी को सत्ता से हिलाना चाह रही हैं.
केजरीवाल की 'दाद' दी जा सकती है कि वो सोनिया गाँधी, नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह, मायावती, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी आदि की तरह ही ताक़तवर बनकर उभरना चाह रहे हैं.
प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव आदि के ख़िलाफ़ हुई कार्रवाई को लेकर अरविंद केजरीवाल के प्रति मीडिया के एकतरफ़ा आक्रमण के पीछे छुपे संदर्भों को भी पढ़ा और समझा जा सकता है.
अहंकारी बहुमत

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जो कुछ भी चल रहा है वह भारतीय राजनीति के वर्तमान चरित्र के अनुकूल ही है. थोड़े वक़्त के बाद सबकुछ ठंडा पड़ जाएगा.
आगे चलकर इस तरह के आरोप भी लगाए जा सकते हैं कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव विपक्षी दलों के इशारों पर आम आदमी पार्टी को कमज़ोर करने में लगे हुए हैं.
कारण यह कि लड़ाई के मुद्दे को लेकर इन संस्थापक सदस्यों ने आवाज़ उठाने में थोड़ी जल्दबाज़ी कर दी. पार्टी और सरकार को थोड़ा जमने और अरविंद केजरीवाल को आगे बढ़कर ग़लतियाँ करने का वक़्त दिया जा सकता था.
जिस तरह के 'अहंकारी' बहुमत के बाद अरविंद केजरीवाल सत्ता में काबिज़ हुए हैं, उसे उन मुद्दों के दम पर निश्चित ही चुनौती नहीं दी सकती है जिनकी कि दिल्ली की 'आत्म केंद्रित' जनता में कतई रूचि नहीं है.
आम आदमी पार्टी का प्रयोग अगर किसी भी कारणों से कमज़ोर या विफल होता है तो विपक्षी दलों के एक होने की संभावनाओं पर भी पाला पड़ जाएगा.

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समझदार अन्ना
अन्य दलों की तानाशाही व्यवस्थाओं के साथ बराबरी का मुक़ाबला करने के लिए अरविंद केजरीवाल अगर अपनी प्रतिष्ठा और आम आदमी पार्टी की भविष्य की संभावनाओं को दांव पर लगा रहे हैं.
उन्हें इस तरह की 'हाराकीरी' की स्वीकृति दी जानी चाहिए. प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और अजीत झा आदि केजरीवाल के अपना 'आपा' खोकर असंयत शब्दों का इस्तेमाल करने की वजह बन सकते हैं, लेकिन केजरीवाल के विकल्प बनने के रूप में स्वीकार नहीं किए जा सकते.
इन अरविंद विरोधी नेताओं को स्वीकार कर लेना चाहिए कि आम आदमी पार्टी के संदर्भ में उनसे जितनी भूमिका की अपेक्षा थी वह अब पूरी हो चुकी है.
अन्ना हज़ारे इनसे ज़्यादा बुद्धिमान साबित हुए हैं. अरविंद केजरीवाल आगे किस दिशा में बढ़ना चाहते हैं इसका उन्हें पहले ही अनुमान और भान हो गया था और वक़्त रहते उन्होंने अपने आप को अलग भी कर लिया.
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