छत्तीसगढ़ः मछली तालाब कंपनियों के हवाले?

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
छत्तीसगढ़ में मछली उत्पादन करने वाले सरकार के उस फैसले से नाराज़ हैं, जिसमें सरकार ने तालाबों में मछली पालन का काम निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया है.
मछुवारों का मानना है कि यह मछलीपालन के निजीकरण की शुरुआत है. छत्तीसगढ़ में तालाबों की लंबी परंपरा रही है.
आज भी छत्तीसगढ़ के कई गांवों में 200-300 छोटे-बड़े तालाब हैं. राज्य में ऐसे तालाबों की संख्या 54 हजार के आसपास है.
मछुआरों की परेशानी

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राज्य में पिछले एक दशक में मछली उत्पादन में 130 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और लगभग तीन लाख टन मछली उत्पादन करने वाला छत्तीसगढ़ मछली उत्पादन के मामले में देश के छह शीर्ष राज्यों में शामिल है.
लेकिन जबसे सरकार ने तालाबों को निजी कंपनियों को सौंपने का फ़ैसला किया है, राज्य के हज़ारों मछुआरे परेशान हैं.
बरसों से मछली पालन से जुड़े शिवकुमार निषाद कहते हैं, "सरकार ने इस फ़ैसले में अभी तो केवल बड़े जलाशयों को शामिल किया है लेकिन हम जानते हैं कि एक-एक कर सारे तालाबों पर बड़ी कंपनियों का कब्जा हो जाएगा. हम बड़ी कंपनियों की पूंजी, ताक़त और तकनीक के आगे कहां टिक पाएंगे?"
मछली उत्पादन

छत्तीसगढ़ कृषक बिरादरी के प्रदीप शर्मा इस पूरे मामले को जैव विविधता से जोड़ते हैं.
उनका मानना है कि बड़ी कंपनियां जिस तरह की बड़ी और ख़तरनाक मछलियों का पालन-उत्पादन करती हैं, उससे छत्तीसगढ़ की छोटी मछलियां खत्म हो जाएंगी.
हालांकि तालाबों में मछली पालन का काम निजी कंपनियों को सौंपने के मामले पर राज्य के कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का तर्क है कि इससे राज्य में मछली उत्पादन और बढ़ेगा.
निजीकरण

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बृजमोहन अग्रवाल इसे तालाबों में मछली पालन का निजीकरण मानने से भी इनकार करते हैं, "अभी यह शुरुआती योजना है और चुनिंदा बड़े तालाबों को निजी कंपनी को देने की योजना है. इसमें स्थानीय मछुआरों की समिति भी भाग ले सकती है."
राज्य में लगभग सभी 26 नदियों पर चेक डैम बना कर उनका पानी पहले से ही निजी कंपनियां इस्तेमाल कर रही हैं.

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यहां तक कि राज्य की शिवनाथ नदी का 26 किलोमीटर का हिस्सा पिछले कई सालों से एक निजी कंपनी के कब्जे में है.
ऐसे में तालाबों में मछली पालन का काम निजी कंपनियों को सौंपे जाने को नदी घाटी मोर्चा के गौतम बंदोपाध्याय, सामुदायिक अधिकार पर हमला मानते हैं.
उनका कहना है कि यह एक खतरनाक शुरुआत है और समुदाय को किनारे कर के बड़ी कंपनियों को तालाब दिया जाना समाज को उसके अधिकार से बेदखल करने वाला क़दम है.
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