कारोबारी घरानों का 'फ़ायदा' राष्ट्रहित कैसे?

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
छत्तीसगढ़ में जांजगीर चांपा के विष्णु बघेल आज तक समझ नहीं पाए कि जिस ज़मीन पर एक निजी कंपनी को अपना उद्योग लगा कर मुनाफा कमाना था, वह राष्ट्रहित कैसे हो सकता है?
एक दोपहर डाकिये ने उन्हें कलेक्टर का एक नोटिस थमाया जिसके बाद उनका सब कुछ उजड़ गया.
उनका घर, खेत और दूसरी सारी ज़मीन पर एक कंपनी ने कब्ज़ा कर लिया, उनसे पूछा तक नहीं गया कि वे अपने पुरखों की ज़मीन देना चाहते हैं या नहीं.
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छत्तीसगढ़ राज्य में विष्णु जैसे किसानों की संख्या हज़ारों में है, जिन्हें एक सरकारी नोटिस ने उनकी खेती, घर, ज़मीन सबसे बेदखल कर दिया और अब उन पर औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा है.
अंग्रेज़ों के ज़माने में बना 1894 का भूमि अधिग्रहण क़ानून सरकारी उपयोग के अलावा किसी को ज़मीन अधिग्रहण की इजाज़त नहीं देता था.
लेकिन 90 साल बाद 1984 में इस क़ानून में संशोधन करके ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर निजी कंपनियों के लिए भी ज़मीन अधिग्रहण की छूट दे दी गई.
इसे कुछ इस तरह समझें कि किसी औद्योगिक घराने को अगर आपकी ज़मीन, घर पसंद आ जाए तो केवल एक नोटिस जारी करके वह औद्योगिक घराना ‘सार्वजनिक इस्तेमाल’ के लिए आपकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता है, आप इसके लिए तैयार हों या न हों.
गोलमोल परिभाषा

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अधिवक्ता महेंद्र दुबे ‘सार्वजनिक इस्तेमाल’ को एक गोल-मोल शब्द मानते हैं.
वे कहते हैं- "भूमि अधिग्रहण क़ानून की अलग-अलग धाराओं में नोटिस जारी करके किसी की भी ज़मीन ली जा सकती है. देश में आज़ादी के बाद से जितनी ज़मीन ली गई है वह बांग्लादेश के क्षेत्रफल के बराबर है."
राज्य में सार्वजनिक प्रयोजन और विकास के नाम पर रायगढ़, जांजगीर-चांपा और कोरबा में सरकार ने ज़मीनें ली और हज़ारों की संख्या में उद्योग खड़े कर दिए गए.

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रायगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी मानते हैं कि तालाब, नहरें, सड़क या इस तरह के उपक्रम तो सार्वजनिक हित माने जा सकते हैं, लेकिन औद्योगिक घरानों का मुनाफा भला कैसे सार्वजनिक हित हो सकता है.
राजेश कहते हैं- "पिछले 10 सालों में अकेले रायगढ़ में 26 हज़ार हेक्टेयर से अधिक खेती की ज़मीन छीनी गई है और उन पर स्पंज आयरन, पावर प्लांट जैसे उद्योग लगा दिए गए हैं.
राजेश गहरी पीड़ा के साथ बताते हैं कि ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर जिनकी ज़मीनें गईं, वो तो गई ही, जिनकी ज़मीन बची रह गई, उन्हें हर घड़ी धुल-धुआं झेलना पड़ता है.
इन ‘सार्वजनिक हित’ वाली फैक्ट्रियों के कारण आसपास के गांवों में जहाँ पानी 100 मीटर की गहराई पर मिलता था, वह अब 700 मीटर तक चला गया है. खेतों की ज़मीन बंजर हो गई है.
ज़मीन हो रही है बंजर

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राज्य में उद्योगों की स्थिति को लेकर गठित एक उच्च अधिकारियों वाली सरकार की रिपोर्ट कहती है- देश में विकास किस तरह नहीं होना चाहिए, रायगढ़ उसका श्रेष्ठ उदाहरण है.
अधिवक्ता किशोर नारायण का कहना है कि छत्तीसगढ़ में भूमि अधिग्रहण क़ानून का जिस मनमाने तरीके से दुरुपयोग हुआ है, उसका दूसरा उदाहरण देश में शायद ही कहीं मिले. मिसाल के तौर पर कोरबा ज़िले के वंदना पावर प्लांट को ही लें.
भूमि अधिग्रहण क़ानून में जो बाध्यकारी नियम हैं, उनके अनुसार ज़िले का कलेक्टर सारी प्रक्रिया का संचालन करता है.

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कोरबा पावर प्लांट के मामले में कंपनी को ही सारे अधिकार दे दिए गए, यानी वही कंपनी ज़मीन पर कब्जा करेगी, और वही किसानों की फ़रियाद पर फैसला भी सुनाएगी.
हालांकि राज्य के राजस्व और आपदा प्रबंधन सचिव केआर पिस्दा ‘सार्वजनिक इस्तेमाल’ के नाम पर निजी कंपनियों को ज़मीन दिए जाने में कुछ भी ग़लत नहीं देखते.
पिस्दा कहते हैं, "राज्य सरकार की अलग-अलग नीतियां होती हैं और उसके तहत सरकार नियम के मुताबिक़ कार्यवाही करती है. सार्वजनिक इस्तेमाल भी उसी का हिस्सा है. राज्य में कहीं भी ग़ैरक़ानूनी तरीके से ज़मीन लिए जाने का कोई भी मामला हमारे सामने नहीं है."
सरकारी नोटिस का नमूना
राज्य सरकार आम तौर पर जो नोटिस जारी करती है, उसकी भाषा सारी कहानी कह देती है. इस नोटिस को देखें-
"चूंकि राज्य शासन को इस बात का समाधान हो गया है कि नीचे दी गई अनुसूची के पद 1 में वर्णित भूमि की अनुसूची के, पद 2 में उल्लेखित सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आवश्यकता है, अतः भू-अर्जन अधिनियम 1894 (क्रमांक-1 सन 1894) की धारा 6 के अंतर्गत इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि उक्त भूमि की उक्त सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आवश्यकता है."
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