मोदी से क्यों नाराज़ हैं किसान

भूमि अधिग्रहण

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    • Author, संदीप राय
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

यूपीए सरकार के कार्यकाल में क़ानून बने <link type="page"><caption> भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013</caption><url href="http://www.thehindu.com/multimedia/archive/02261/Land_Acquisition___2261879a.pdf" platform="highweb"/></link> में मोदी सरकार ने कुछ अहम बदलाव किए हैं.

संसद की मुहर लगाए बिना मोदी सरकार ने इसे अध्यादेश के रूप में लागू भी कर दिया है.

अब इस संशोधित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का किसान संगठन पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं.

क़ानून में मुआवजे की ऊंची दर तो बरक़रार रखी गई है, लेकिन अनिवार्य सहमति हटाए जाने, बहु-फसली भूमि के अधिग्रहण और सोशल इम्पैक्ट एसेसमेंट सर्वे को हटाने जैसे अहम बदलाव किए गए हैं.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी अपनी नई टीम के साथ केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.

पढ़ें, पूरी रिपोर्ट

भूमि अधिग्रहण

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े किसान संगठन भारतीय किसान संघ ने भी <link type="page"><caption> इन बदलावों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/12/141230_land_aquisition_bill_old_new_diff_fma.shtml" platform="highweb"/></link> को ‘क़ानून की आत्मा को निकाल’ लेना क़रार दिया है.

भारतीय किसान संघ के जनरल सेक्रेटरी प्रभाकर केलकर का कहना है कि, "देश में क़रीब 20 प्रतिशत खाली बंजर भूमि है और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए पहले ली गई ज़मीन भी भारी मात्रा में खाली है, लगभग 50 हज़ार एकड़ से भी ज़्यादा."

केलकर कहते हैं, "इन खाली जमीनों पर सरकार जो चाहे करे, उद्योग लगाए, स्मार्ट सिटी बनाए. लेकिन किसान की जमीन उसकी सहमति से ही ली जानी चाहिए."

असल में भूमि अधिग्रहण क़ानून देश में बढ़ते विवादों के दबाव का नतीजा था.

वरिष्ठ पत्रकार <link type="page"><caption> अजित साही के अनुसार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/01/150108_land_acquisition_problems_rd.shtml" platform="highweb"/></link>, आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल में भारत में उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले झगड़ों में तीस फ़ीसदी की वृद्धि हुई है.

'भाजपा भी सहमत थी'

सिंगूर

अब नए अध्यादेश से उसी तरह के असंतोष उभरने की आशंका पैदा हो गई है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े संगठन अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष आमरा राम कहते हैं, “जब यह क़ानून पास हुआ तो भाजपा की सहमति थी, लेकिन अब अध्यादेश लाकर उसी क़ानून को वो पलट रही है.”

आमरा राम कहते हैं, “देश में क़रीब नौ करोड़ आदिवासी जनता है. छठी अनुसूची में आने वाले इलाक़ों को भी इस क़ानून से अलग कर दिया गया है. जबकि इसमें साफ है कि ग्राम सभा की अनुमति के बगैर अधिग्रहण नहीं हो सकता.”

नियमगिरी

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इन बदलावों के अलावा पारिभाषिक शब्दावली में भी बदलाव किया गया है- जैसे 'प्राइवेट कंपनी' की जगह 'प्राइवेट एंटिटी' कर दिया गया है.

क़ानून को लागू करने के लिए सरकार को किसी भी तरह की कार्रवाई करने के लिए दो साल का वक़्त दिया गया था, जबकि अध्यादेश में इस समय सीमा को बढ़ाकर पांच साल कर दिया गया है.

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