कोयला खनन पर गहराता विरोध

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में कोयला खदानों के कथित निजीकरण के विरोध में हड़ताल ख़त्म होने के बाद अब छत्तीसगढ़ के ग्रामीण लोगों ने खनन के विरोध में स्वर तेज़ कर दिया है.
छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र की 16 ग्राम सभाओं और धरमजयगढ़ क्षेत्र की चार ग्राम सभाओं ने पारित किए गए अपने प्रस्ताव में किसी भी प्रकार के खनन का विरोध किया है और कोयला मंत्री पीयूष गोयल को एक ज्ञापन भी दिया है.
छत्तीसगढ़ के घने जंगलों वाले इन इलाक़ों में लगभग 20,000 ग्रामीण रहते हैं जिनकी आजीविका और जीवन-शैली प्रमुख रूप से जंगल और खेती पर निर्भर रही है.
अध्यादेश
सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ महीने पहले कोयला खदानों के आवंटन रद्द किए जाने के बाद, एनडीए सरकार ने अध्यादेश के ज़रिए निजी कंपनियों को खदान हासिल करने की अनुमति दी थी.

लेकिन छत्तीसगढ़ के इन ग्रामीणों का कहना है कि जैव विविधता से भरे उनके जंगलों में खनन नहीं होना चाहिए.
हरिहरपुर ग्राम से दिल्ली तक विरोध करने के लिए पहुंचे मंगल साय ने कहा, "अगर खनन हुआ तो हमारे जंगल का विनाश हो जाएगा, पर्यावरण दूषित होगा और अगर जंगल ही नहीं रहे तो हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां कहाँ जाएंगी".
'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' के अंतर्गत विरोध कर रहे इन ग्राम सभा प्रतिनिधियों ने पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से भी अपनी गुहार लगाई है.
आवंटन
हसदेव-अरण्य क्षेत्र में कोयले की खदानें लगभग 1,600 वर्ग किलोमीटर तक फैली हैं जिनके अंतर्गत उत्तरी छत्तीसगढ़ के कोरबा, सुरगुजा और सूरजपुर ज़िले आते हैं.

इमेज स्रोत, ALOK PRAKASH PUTUL
ख़बरों के अनुसार इस इलाक़े में क़रीब 30 कोयले के ब्लाक छांटें गए थे जिनमें से 16 को कई निजी और सरकारी कंपनियों को आवंटित किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने जब इन आवंटनों को रद्द कर दिया, तब नई सरकार ने एक अध्यादेश के ज़रिए इनके ई-ऑक्शन का फ़ैसला लिया.
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