एडिटर जिसने पत्रकारिता को नया ‘आउटलुक’ दिया

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- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
उन दिनों यानी 1995 में मैं जनसत्ता अख़बार में रिपोर्टर था, ये वो दौर था जब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और उनके नज़दीक़ी होने के कारण तांत्रिक चंद्रास्वामी की सत्ता के गलियारों में बहुत चलती थी.
उसी दौर में मेरी एक ख़बर से शुरू हुए विवाद के कारण चंद्रास्वामी जेल पहुँच गए. तभी मुझे 'आउटलुक' से विनोद मेहता का बुलावा आया.
तब मैंने कभी-कभार इंडियन एक्सप्रेस में भी ख़बरें या लेख लिखना शुरू कर दिया था लेकिन मेरे दिमाग़ में दूर दूर तक भी ये ख़याल नहीं था कि विनोद मेहता मुझे आउटलुक की टीम में लेना चाहेंगे क्योंकि नब्बे के दशक तक हिंदी और अंग्रेज़ी पत्रकारिता एक दूसरे से जुदा दो अलग-अलग दुनिया थीं और इनको आपस में जोड़ने वाले पुल बहुत कम और बेहद सँकरे थे.
यही वजह थी कि बहुत कम लोग चाहने के बावजूद हिंदी से अँग्रेज़ी पत्रकारिता में क़दम रख पाते थे.
भरोसेमंद साया

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1995 के नवंबर महीने में हिंदी भाषी पृष्ठभूमि के किसी रिपोर्टर का अँगरेज़ी पत्रकारिता में जाना लगभग असामान्य सी बात थी, पर अगर विनोद मेहता सामान्य रास्ते पर चलने वाले संपादक होते तो फिर वो विनोद मेहता नहीं होते.
"हाउ कान्फिडेंट आर यू अबाउट युअर इंग्लिश?", उन्होंने मुझसे पहला सवाल किया. मैंने इंडियन एक्सप्रेस और फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस में छपे अपने लेखों की कतरनें आगे बढ़ा दीं, फिर आगे और कोई सवाल नहीं पूछा गया.
अगले छह साल तक मैंने आउटलुक में काम करते हुए माओवादियों के साथ बस्तर के जंगलों की ख़ाक छानी, बिहार में जातीय नरसंहार की ख़बरें कीं, रणबीर सेना के हथियारबंद दस्तों को ढूँढ निकाला, कारगिल युद्ध कवर किया, राजीव गाँधी की हत्या की छानबीन कर रहे जैन आयोग और मुंबई अंडरवर्ल्ड से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक की ख़बरें कीं.
इस पूरे दौर में विनोद मेहता एक भरोसेमंद साए की तरह हमारे आसपास रहे - कभी बेसब्री से रिपोर्टरों की कॉपी के इंतज़ार में कुढ़ते हुए, कभी एडिट मीटिंग के बेहद गंभीर माहौल को अचानक और गंभीर बनाते हुए, कभी हमारी सीट के पीछे चुपचाप खड़े होकर कंप्यूटर की स्क्रीन पर हमारी अधूरी और पकी-अधपकी ख़बरों को पढ़ते हुए तो कभी भरे-पूरे न्यूज़रूम के बीच ठेठ अलंकारपूर्ण हिंदी में अपनी उपस्थिति का एहसास कराते हुए. और कभी दफ़्तर की पार्टियों में ठहाके लगाते और सभी से खुलकर मिलते-जुलते.
शानदार शख्सियत

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विनोद मेहता ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरूआत सीधे संपादक के तौर पर की और आख़िर तक संपादक ही रहे, वे साफ़गो और खरे आदमी के तौर पर जाने जाते थे. लेकिन उनके व्यक्तित्व को समझना आसान नहीं था. मसलन, वे अपने कुत्ते को एडिटर क्यों बुलाते थे?
अधनंगी औरतों की तस्वीरें छापने वाली पत्रिका डेबोनेयर में वे नेताओं के बड़े इंटरव्यू भी छापते थे, जिनकी ख़ासी चर्चा होती थी. वे कभी भी संपादक के परंपरागत खांचे में फिट नहीं हुए.
विनोद मेहता सामान्य पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी रहे थे, थर्ड डिवीज़न बीए पास करने वाले मेहता ने संपादक के तौर पर अपनी बारीक़ समझ का लोहा मनवाया. वे थोड़े पंजाबी थे, थोड़े लखनवी भी, उनके मिजाज़ में अंग्रेज़ियत भी थी और यूपी वाला भदेसपन भी.
खुद पर हंसते थे विनोद मेहता

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दफ़्तर के अंदर विनोद मेहता को आम तौर पर कभी किसी के साथ हँसी-ठिठोली करते नहीं देखा जाता था. इसके बावजूद वो ख़ुद पर हँसना जानते थे.
वो दिल्ली के सफ़दरजंग एनक्लेव की एक इमारत की पहली मंज़िल पर अपने कमरे में बैठते थे और हर आधे-एक घंटे में सीढ़ियां चढ़कर तीसरी मंज़िल के न्यूज़रूम में पहुँचकर आदतन इधर-उधर टहलने लगते. कुछ देर बाद बिना किसी से बात किए वो फिर नीचे अपने कमरे में लौट जाते. ये उनका रोज़ाना का काम था.
द घोस्ट हू वॉक्स
तरुण तेजपाल उस समय आउटलुक में फीचर सेक्शन के संपादक थे और न्यूज़रूम में इधर से उधर निरुद्देश्य चहलक़दमी करने की विनोद मेहता की आदत के कारण ही एक बार उन्होंने आउटलुक के अंतिम पन्ने पर छपने वाली डायरी में लिखा था- द घोस्ट हू वॉक्स (चलने फिरने वाला वैताल)!
मैंने उन्हीं दिनों विनोद मेहता का एक छोटा सा कार्टून बनाकर अपने सामने वाली दीवार पर चिपका दिया था. एक दिन मेहता साहब की नज़र उस पर पड़ गई और उन्होंने झुककर बड़ी देर तक ग़ौर से उसे देखा और त्यौरियां चढ़ाते हुए पूछा - किसने बनाया है? मैं पकड़ा गया था इसलिए कुछ बहाने करना बेकार था. इसलिए कह दिया कि मैंने बनाया है, मगर आप कहें तो मैं इसे हटा देता हूँ. उन्होंने दो पल के लिए सोचा और बोले - नहीं, ठीक है. लगे रहने दो.
अपना ही कैरीकेचर लगाया एडीटर ने

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विनोद मेहता ने अपने कमरे की दीवारों पर देश-विदेश के नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें फ़्रेम करवा कर टंगवाई थीं. इन्हीं के बीच ख़ुद अपने कई कैरीकेचर भी लगाए थे.
बहुत से लोगों को शायद ये नहीं मालूम होगा कि विनोद मेहता मीठा खाने के बहुत शौक़ीन थे. उनकी मेज़ पर काँच का एक मर्तबान रखा रहता था जिसमें टाफ़ियाँ और चॉकलेट भरी रहती थीं. कभी कभी वो बाहर से आइसक्रीम मँगाकर अपने कमरे में अकेले बैठकर खाया करते थे.
क़ीमती सिगार का मज़ा

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विनोद मेहता को हालांकि दिल के आपरेशन के बाद बहुत परहेज़ से रहना पड़ता था, फिर भी कई बार वो अपनी क़मीज़ की बांहें चढ़ाए क़ीमती सिगार का मज़ा लेते नज़र आते थे.
जितनी बेबाकी से विनोद मेहता ने अपने बारे में लिखा है शायद कोई और संपादक वैसे न लिख पाए - अपनी युवावस्था के खिलंदड़ेपन का ज़िक्र उन्होंने अपनी किताब 'लखनऊ ब्वाय' में काफ़ी दिलचस्प तरीक़े से किया है. यहाँ तक कि उन्होंने इस किताब में बिना शादी के पैदा हुई अपनी बेटी का भी ज़िक्र किया है, जिसके बारे में सिवा उनकी पत्नी के किसी को पता नहीं था.
विनोद मेहता ने संजय गांधी और अभिनेत्री मीना कुमारी पर भी किताबें लिखीं, जो लोकप्रिय हुईं.
'लखनऊ ब्वाय' का खिलंदड़पन

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इसी खिलंदड़ेपन का गवाह एक बार मैं भी रहा. एक दिन किसी ख़बर पर बातचीत करने के लिए उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया कि तभी एक फ़ोन आ गया. विनोद मेहता ने शुद्ध लखनवी अंदाज़ की हिंदी में बात की. वो बीच बीच में कहते जाते थे - हां जित्ती भाई, हां जित्ती भाई.
फ़ोन रखने के बाद मेरी ओर पलटे और हँसते हुए (याद रहे, वो दफ़्तर में बहुत कम हँसते और मज़ाक़ करते थे) कहा - ये जित्ती भाई थे. (अब दिवंगत हो चुके काँग्रेस नेता) जितेंद्र प्रसाद. कल तक हमारे साथ लखनऊ में लड़कियों का पीछा (उन्होंने एक भदेस मुहावरे का इस्तेमाल किया जिसे छापा नहीं जा सकता) करते थे और आज देखो!
मेरे लिए ये एक नई अकल्पनीय दुनिया थी. यह मेरे अपनी हिंदी वाली दुनिया से क़तई अलग थी, जहाँ प्रभाष जोशी भाषा से लेकर साधनों की शुचिता पर ज़ोर देते थे, उनकी बातों में गाँधी, लोहिया और विनोबा होते थे.
मेरी नज़र में प्रभाष जोशी और विनोद मेहता की पत्रकारिता अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के विरोध में नहीं थी बल्कि एक दूसरे को जैसे सहारा देती हुई चल रही थी.
दोस्तों की परवाह नहीं, पत्रकारिता

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प्रभाष जोशी ने अपनी क़लम से चंद्रशेखर जैसे अपने मित्र राजनेताओं की ख़बर लेने में कभी कसर नहीं छोड़ी तो विनोद मेहता ने ख़बर के मामले में कभी भी शरद पवार से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे मित्रों की परवाह नहीं की.
जब आउटलुक ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर उनके दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य के असर पर कवर स्टोरी की तो सरकार ने आउटलुक के मालिकों पर इनकम टैक्स के छापे मारकर मानो इसका जवाब दिया. पर विनोद मेहता ने समझौता नहीं किया.

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इसी तरह राडिया टेप्स के मामले में पत्रकार बरखा दत्त और रतन टाटा का नाम छापने में उन्होंने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई.
आज जबकि न प्रभाष जोशी हैं और न विनोद मेहता - पत्रकारों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. अब बहुमत की ताक़त पर सवार होकर सत्ता तक पहुँचे नेताओं के सामने छोटा सी क़लम लेकर कौन खड़ा होगा? कौन है जो उनसे पूछेगा - एक डाक्यूमेंट्री को बैन करके कैसे बचाओगे राष्ट्र की इज़्ज़त?
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