क्या चुगलियां होती हैं लेडीज़ कोच में?

- Author, शालू यादव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
लंदन में ट्यूब (लोकल ट्रेन) में सफ़र करने वाले लोग आपस में ज़्यादा बातें नहीं करते. ज़्यादातर यात्री या तो अख़बार पढ़ने में मशगूल होते हैं, या फिर अपने फ़ोन पर बिज़ी दिखते हैं.
लंदन में एक साल काम करने के बाद जब से मैं दिल्ली लौटी हूं, मुझे अपने शहर का शोर बहुत लुभावना सा लगने लगा है. ख़ासतौर पर काम पर जाते वक्त दिल्ली मेट्रो में महिलाओं की बातों का शोर.
अब आप सोचेंगें कि महिलाओं का ही क्यों?
वो इसलिए क्योंकि मैं दिल्ली मेट्रो के लेडीज़ कोच में सफ़र करती हूं. जो दिल्ली में रहते हैं और मेट्रो में सफ़र करते हैं उन्हें तो मालूम ही होगा कि हर मेट्रो ट्रेन में पहला डब्बा महिलाओं के लिए आरक्षित होता है.
प्लेटफ़ॉर्म पर जिस जगह गुलाबी पट्टियां लगी दिखें, तो समझ जाइए कि उस तरफ़ पुरुषों का जाना मना है. और अगर कोई पुरुष लेडीज़ कोच में ग़लती से भी घुस जाए, तो उसे महिलाएं बाहर का रास्ता दिखा देती हैं...कभी प्यार से तो कभी फटकार लगाते हुए.
ब्यूटी बॉक्स

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बहरहाल लेडीज़ कोच के भीतर का समां किसी ब्यूटी पार्लर से कम नहीं है. रोज़ के सफ़र में महिलाएं और लड़कियां कभी मेकअप करती दिखती हैं, कभी अपने बाल संवारते हुए तो कभी नाखून पर नेलपॉलिश लगाते हुए.
इस कोच में महिलाएं इतना सहज और आज़ाद महसूस करती हैं कि वे बिना किसी की परवाह किए बिना अपनी ज़िंदगी से जुड़ी बातें आपस में शेयर करती हैं.
वे इस बात की परवाह भी नहीं करती कि उनकी बातें कोच मे सफ़र करने वाली दूसरी महिलाएं सुन तो नहीं रहीं.
मैं लेडीज़ कोच में अकेले ही रोज़ ऑफ़िस तक का सफ़र तय करती हूं, और मुझसे तो इन महिलाओं की दिलचस्प बातें सुने बिना रहा नहीं जाता.
पिछले चार महीनों में मैंने लेडीज़ कोच में कुछ ऐसी बातें सुनी हैं जो कि एक तरह से दिल्ली में हुए बदलाव का एक प्रतिबिंब है.
खोई बिल्ली और सुहावने मौसम में क्लास बंक – युवतियों की बातें

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नवंबर का महीना है और दिल्ली का मौसम बेहद सुहावना है.
लेडीज़ कोच में विश्विद्यालय की दो छात्राओं ने आपस में कुछ यूं बात छेड़ी –
‘मेरी प्रोफ़ेसर की बिल्ली मर गई. वो इतनी दुखी थी कि क्लास की कैंसल कर दी!’
तो दूसरी ओर छात्राओं की एक टोली मेट्रो में अपने पाठ्यक्रम की चर्चा करते हुए चढ़ता है.
उनमें से एक छात्रा को शायद ये बातें बोर कर रही हैं. वो बीच में उनकी बात काट कर अपने क्लास के लड़कों के बारे में बात छेड़ देती है. उसकी बातें सुनकर नाराज़ सहेली ने ग़ुस्से में कहा – '‘देख बहन, या तो कॉलेज में पढ़ाई हो सकती है या लड़काबाज़ी. दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते’'.
कुछ छात्राएं अपनी क्लास में पढ़ने वाली एक लड़की की चुगली कर रही हैं. एक ने कहा – ‘'बड़ी झूठी लड़की है यार. एक बार उसने हमसे कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है. और जैसे ही लंच का टाइम हुआ तो मैंने उसे चावल का एक पूरा डब्बा गटकते हुए देखा.’'
और फिर कुछ पल स्वाभाविक भी होते हैं.
कुछ छात्राओं को एक बार मैंने अपनी क्लास के लड़कों के बारे में बात करते हुए सुना. वे अपनी क्लास के ‘फ़्लर्ट टाइप’ लड़कों और ‘शरीफ़ लड़कों’ के बारे में बहस कर रही थीं. औऱ जैसे ही उनका स्टेशन आया तो सबके बीच सहमति बनी कि आज की क्लास सब एक साथ बंक करेंगीं.
गद्दे के नीचे खज़ाना!

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ये न समझिए कि ये मुद्दा गंभीर नहीं है. लेकिन जिस तरह से इसे पेश किया गया वो गुदगुदाने वाला था.
एक जवान कामकाजी महिला अपनी सहेली को आंखें फाड़ते हुए बताती है, ‘'मेरे पापा अपनी सारी कमाई घर के अलग-अलग कोनों में हम सबसे छिपा कर रखते हैं. हाल ही में मुझे उनके बेड के गद्दे के नीचे नोटों की गड्डी मिली. मैंने चुपचाप उस पैसे से किराने वाली दुकान से लेकर मोबाइल रिचार्ज की दुकान के सारे क़र्ज़ उतार दिए! जब उन्होंने हमसे उस पैसे के बारे में पूछा, तो हमने कुछ न मालूम होने का नाटक कर दिया!’'
नए साल की मुबारकबाद
नए साल की सुबह जब मैंने ट्रेन पकड़ी और लेडीज़ कोच में बैठी, तो मानो पूरा कोच नए साल की मुबारकबाद से गूंज रहा था. फ़ोन पर सभी महिलाएं अपने परिवारजनों और दोस्तों को बधाई दे रही थीं.
लेकिन एक बधाई भरा डायलॉग सुन कर मैं खुद को हंसने से रोक नहीं सकी. ‘नया साल मुबारक हो. भगवान करे तुम्हारे घर के संकट तुम्हारे पड़ोसियों के घर गिर जाएं!’
और कुछ जवान महिलाएं उन लड़कों के बारे में बात कर रही थी, जिन्हें वो नापसंद करती हैं.
एक ने कहा –'‘उसे लगा कि नया साल एक अच्छा मौका है मुझसे बात करने का. क्या उसे समझ नहीं आता कि मैं उसे रत्ती भर भी पसंद नहीं करती?!’'
जहां मॉडर्न और परंपरागत मूल्यों का होता है मिश्रण

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एक बार सुबह-सुबह मैंने दो बुजुर्ग महिलाओं को उस लड़की के बारे में बात करते हुए सुना जिसके मां-बाप ने कथित तौर पर उसकी इसलिए हत्या कर दी थी क्योंकि उसने दूसरी जाति के लड़के से शादी की. इस हत्या की ख़बर उस दिन दिल्ली अख़बारों में छाई हुई थी.
एक महिला ने दूसरी से कहा – '‘यही होता है जब लड़कियों को बहुत ज़्यादा पढ़ाया जाता है. कॉलेज जा कर वे बहुत मॉडर्न हो जाती हैं और अपने मां-बाप के हाथ से निकल जाती हैं. ’'
एक बार मुझे उन दो जवान महिलाओं की बात सुनाई दी, जो एक ही मोबाइल से ईयरफ़ोन शेयर कर गाने सुन रही थीं. साथ-साथ अपनी होने वाली भाभी के बारे में भी बात कर रही थी. एक ने दूसरी से कहा – ‘लड़की इतनी बुरी नहीं है. वो जींस भी पहनती है और सलवार-कमीज़ भी. वो इतनी भी मॉडर्न नहीं है.’
ऑफ़िस पॉलिटिक्स
दो कामकाजी महिलाएं अपने ऑफ़िस के बारे में गप्पे लड़ाते हुए सफ़र कर रही थीं. एक ने दूसरी को बताया, '‘उस मैनेजर ने मेरी नाक में दम कर रखा है! मैंने ओवरटाइम रुक कर उसके लैपटॉप पर पूरी प्रेज़ेन्टेशन बनाई औऱ अगले दिन उसने मुझे कहा कि वो गुम हो गई है. भाड़ में जाए वो, मैं वो प्रेज़ेन्टेशन दोबारा तो नहीं बनाने वाली. हुंह!’'
वो सुगंध और वो नज़ारा

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एक बार मैंने वो नज़ारा देखा जो मैं हमेशा याद रहेगा. अपना स्टेशन आने से पहले एक महिला ने फ़टाफ़ट से अपनी ड्रेस के ऊपर बुर्का डाल लिया.
इन रोचक नज़ारों के अलावा लेडीज़ कोच में सफ़र करने का एक फ़ायदा ये भी है कि ये इसके अंदर की महक बहुत खूब होती है.
जो भी बातें मैं अपने सफ़र में सुनती हूं – वो तनाव, वो मज़ाक, चुटकुले, ताने-बाने और कुछ दर्द भरी दास्तान – ये सभी एक क़ीमती झरोखा है. वो झरोखा जिसमें से इस शहर में हो रहा सांस्कृतिक बदलाव साफ़ दिखाई देता है.
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