अन्ना को ग़ुस्सा क्यों आता है

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भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर संसद से लेकर सड़क तक सियासी हलचल है. संसद में कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल यूपीए सरकार में बने क़ानून में संशोधन का विरोध कर रहे हैं.
साथ ही समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने भी बाहें चढ़ा ली हैं और इस क़ानून को किसान विरोधी बताते हुए आंदोलन का ऐलान कर दिया है.
इस क़ानून के ऐसे वे प्रावधान जिन पर है विरोध.
1. ज़मीन लेने पर सहमति
2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून के मुताब़िक रक्षा, सस्ते घर और औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं के लिए प्रभावित होने वाले 80 प्रतिशत लोगों की सहमति ज़रूरी.
संशोधन: सहमति ज़रूरी नहीं, मुआवजे का प्रावधान बरकरार.
2- सर्वे अनिवार्य

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2013 के क़ानून में अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन का सर्वे अनिवार्य था.
संशोधन: राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा, ग्रामीण आधारभूत संरचना, औद्योगिक कॉरिडोर और सार्वजनिक आधारभूत संरचनाओं के लिए सर्वे ज़रूरी नहीं.
3- ज़मीन वापसी
2013 के क़ानून के अनुसार पांच साल में इस्तेमाल न होने पर भूमि को वापस कर दिया जाएगा.
संशोधन: भूमि लौटाने की सीमा पांच साल से बढ़ाकर परियोजना के बनने तक की गई.
4-सिर्फ़ बंज़र ज़मीन

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2013 के क़ानून के मुताबिक सिर्फ़ बंजर ज़मीन का ही अधिग्रहण किया जा सकता है, सिंचित भूमि का नहीं.
संशोधन: सिंचित ज़मीन का भी अधिग्रहण किया जा सकता है.
5- कोर्ट
क़ानून के उल्लंघन पर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है.
संशोधन: क़ानून के उल्लंघन के अपराध में कोई अदालत संज्ञान नहीं लेगी.
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