गैस संकट: क्या ईरान युद्ध के चलते भारत में पीएनजी की सप्लाई पर भी असर होगा

यह हवाई तस्वीर 16 अक्तूबर, 2024 को ओडिशा के भद्रक जिले में धामरा बंदरगाह के पास स्थित धामरा एलएनजी टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड (डीएलटीपीएल) के जेटी को दिखा रही है.

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इमेज कैप्शन, भारत दुनिया के बड़े गैस आयातकों में शामिल है. 16 अक्तूबर, 2024 को ली गई यह तस्वीर ओडिशा के भद्रक ज़िले में धामरा बंदरगाह के पास स्थित धामरा एलएनजी टर्मिनल प्राइवेट लिमिटेड (डीएलटीपीएल) के टर्मिनल की है
    • Author, सौतिक विश्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

ईरान युद्ध ने भारत के लिक्विफ़ाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) बाज़ार को पहले ही हिलाकर रख दिया है.

अब ऊर्जा ज़रूरत की एक और महत्वपूर्ण कड़ी इसके दायरे में आती नज़र आ रही है: देश का तेज़ी से विस्तार करता प्राकृतिक गैस (पीएनजी) का पाइपलाइन नेटवर्क, यानी पाइपलाइन के ज़रिये घरों और व्यवसायों तक पहुंचाई जाने वाली गैस.

इस प्राकृतिक गैस की मांग उर्वरक संयंत्रों, उद्योगों और गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों के साथ-साथ शहरी गैस नेटवर्क से आती है, जो घरों को पीएनजी और वाहनों को सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) की आपूर्ति करते हैं.

इनमें से, घरों तक शहरी गैस की आपूर्ति सबसे तेज़ी से बढ़ रही है, और शहरी भारत में नेटवर्क के विस्तार के साथ इसमें लगातार वृद्धि हो रही है.

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इस प्रयास का असर ज़मीनी स्तर पर भी दिखाई देता है: भारत में अब 1.5 करोड़ से अधिक पीएनजी कनेक्शन हैं, और यह संख्या तेज़ी से बढ़ रही है क्योंकि सरकार परिवारों को सिलेंडर के बजाय पाइप से आने वाली गैस का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.

ईरान के साथ युद्ध के कारण भारत में खाना पकाने की गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है. इसी के साथ-साथ, सीएनजी वाहनों की मांग में भी लगातार वृद्धि हुई है, और अब सीएनजी भारत में पेट्रोल के बाद दूसरा सबसे बड़ा ऑटो ईंधन बन गया है.

अगर एलपीजी ले जाने वाले टैंकरों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने में कठिनाई हो रही है, तो कई शहरी भारतीय घरों में यह सवाल भी पूछा जाने लगा है, क्या उनकी रसोई की पाइपलाइनों में गैस की आपूर्ति भी इसी तरह प्रभावित हो सकती है?

क्या पाइप्ड गैस पर पडे़गा असर?

पेट्रोल के बाद अब सीएनजी भारत में वाहनों का दूसरा सबसे बड़ा ईंधन बन चुका है.

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भारत की पाइपलाइन के ज़रिए गैस की सप्लाई घरेलू उत्पादन और लिक्विफ़ाइड प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के आयात का मिश्रण है.

भारत को मिलने वाली पीएनजी गैस की लगभग आधी आपूर्ति घरेलू स्रोतों से होती है, जिन्हें तटवर्ती और गहरे समुद्री इलाक़ों से निकाला जाता है, उदाहरण के लिए ओएनजीसी और रिलायंस जैसी कंपनियों द्वारा. बाकी सप्लाई एलएनजी आयात के माध्यम से पूरी की जाती है.

हरियाणा सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक राहुल चोपड़ा कहते हैं, "पाइप से गैस का उपयोग करने वाले घरों और वाहनों के लिए किसी प्रकार की बाधा की आशंका नहीं है. सरकार ने इन दोनों क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है."

हरियाणा सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड एक देशव्यापी गैस कंपनी है, जिसके लगभग एक लाख घरेलू उपभोक्ता और 195 सीएनजी ईंधन स्टेशन हैं.

हालांकि, इस कंपनी के लगभग 2,200 औद्योगिक और वाणिज्यिक ग्राहकों को सरकार द्वारा अनिवार्य 20% आपूर्ति कटौती का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि गैस को घरों और वाहनों की ओर मोड़ा जा रहा है.

वीडियो कैप्शन, भारत में एलपीजी संकट: देश के अलग-अलग हिस्सों में कैसे हालात हैं? ग्राउंड रिपोर्ट

भारत को कहां से मिलती है गैस?

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आपूर्ति में कमी आने पर सरकार विशेष रूप से उर्वरक संयंत्रों और पाइपलाइन से गैस कनेक्शन वाले घरों को प्राथमिकता देने की कोशिश करती है. इसका मतलब यह है कि सबसे पहले प्रभावित होने वाले क्षेत्र आमतौर पर उद्योग और बिजली उत्पादक होते हैं.

जब एलएनजी की कीमतें बढ़ जाती हैं या सप्लाई कम हो जाती है, तो फैक्ट्रियां अक्सर अपना ईंधन बदल लेती हैं और फ्यूल ऑयल, एलपीजी या यहां तक कि कोयले का इस्तेमाल करती हैं. गैस से चलने वाले पावर प्लांट सीधे अपना बिजली उत्पादन कम कर देते हैं.

घरेलू स्तर पर मज़बूत आधार होने के बावजूद भारत की पाइपलाइन वाली गैस प्रणाली, इसके एलपीजी बाज़ार की तरह ही, वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशील है.

हाल के वर्षों में, एलएनजी ने देश की कुल गैस उपलब्धता का लगभग आधा हिस्सा पूरा किया है. 2025 में आयात लगभग 24-25 मिलियन टन रहा, जिससे भारत दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी ख़रीदारों में से एक बन गया.

और इसका एक बड़ा हिस्सा एक ही जगह कतर से आता है.

भारत के एलएनजी आयात का आधे से अधिक हिस्सा क़तर के आपूर्तिकर्ताओं के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों में बंधा हुआ है. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस और अफ्रीका के कुछ हिस्सों से भी एलएनजी का आयात होता है, लेकिन कम मात्रा में.

क़तर और संयुक्त अरब अमीरात से आने वाले एलएनजी कार्गो को होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रना पड़ता है, जो एक संकरा समुद्री मार्ग है और अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद मध्य पूर्व युद्ध का केंद्र बन गया है. भारत के एलएनजी आयात का लगभग 50-55% हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुज़रता है.

दिल्ली एनसीआर में लाखों घरेलू उपभोक्ता पीएनजी का इस्तेमाल करते हैं

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अभी तक माल का प्रवाह पूरी तरह से रुका नहीं है. संघर्ष बढ़ने से पहले माल से भरे टैंकर अभी भी चल रहे हैं.

कमोडिटी इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म केप्लर इनसाइट में एलएनजी और प्राकृतिक गैस के प्रमुख विश्लेषक गो कातायामा कहते हैं, "आपूर्ति अभी तक पूरी तरह से बाधित नहीं हुई है. संघर्ष बढ़ने से पहले क़तर में लोड किए गए कार्गो अभी भी एशिया पहुंच रहे हैं."

केप्लर के शिपिंग डेटा से पता चलता है कि 10-26 फ़रवरी के बीच लोड किए गए 13 एलएनजी कार्गो वर्तमान में भारत के रास्ते में हैं, और डिलीवरी मार्च तक जारी रहेगी.

कातायामा के मुताबिक़, लेकिन क़तर के विशाल रास लाफ़ान एलएनजी कॉम्प्लेक्स (प्रति वर्ष 77 मिलियन टन) से निर्यात 2 मार्च से रुका हुआ है, जिसका मतलब है कि होर्मुज़ के माध्यम से सुरक्षित मार्ग फिर से शुरू होने तक ये जहाज़ अंतिम शिपमेंट में से हो सकते हैं.

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में रातों-रात गैस ख़त्म हो जाएगी. लेकिन यह स्ट्रक्चरल कमज़ोरी को तो उजागर करता ही है.

कच्चे तेल के विपरीत, भारत एलएनजी के रणनीतिक भंडार नहीं रखता है.

गैस को मुख्य रूप से दाहेज, हजीरा, कोच्चि और एनोर जैसी टर्मिनल फ़ैसिलिटीज़ में स्टोर किया जाता है. ये फ़ैसिलिटीज़ बाद में आयातित एलएनजी को वापस गैस में परिवर्तित करती हैं.

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कातायामा के अनुसार, टर्मिनल संचालन और कार्गो शेड्यूल के आधार पर, ये व्यवस्था अधिकतम एक से दो सप्ताह के आयात को ही कवर कर पाती है. यह प्रणाली इसलिए काम करती है क्योंकि जहाज़ आमतौर पर एक नियमित गति से आते हैं. अगर यह गति बाधित होती है, तो बाज़ार को तुरंत समायोजित होना पड़ता है.

भारत के वो शहरी उपभोक्ता जो पाइपलाइन के ज़रिए गैस का इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए तात्कालिक ख़तरा इसकी कमी के बजाय क़ीमत का है.

अगर होर्मुज़ में व्यवधान जारी रहता है, तो भारत का गैस बाज़ार हमेशा की तरह ऊंची क़ीमतों और कमज़ोर औद्योगिक मांग के ज़रिए एडजस्ट हो जाएगा.

घरों में लोग अपनी रसोई की गैस तो चलाते रहेंगे, लेकिन यह सस्ता नहीं होगा. चोपड़ा कहते हैं, "कीमतों में कुछ बढ़ोतरी की उम्मीद है."

आख़िरकार घरों और कारखानों दोनों को अधिक भुगतान करना पड़ेगा. उद्योगों को ही सबसे अधिक कटौती का सामना करना पड़ेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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