चंदे के बारे में क्यों साफ नहीं रहते राजनीतिक दल

अरविंद केजरीवाल

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    • Author, प्रोफ़ेसर जगदीप छोकर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता या उसकी कमी, एक बार फिर से सुर्खियों में है.

क्योंकि पारदर्शिता के नाम की कसमें खाने वाली एक पार्टी के बारे में कुछ सनसनीख़ेज़ बातें सार्वजनिक हुई हैं.

कहा जा रहा है कि इस राजनीतिक पार्टी ने कुछ फर्जी कंपनियों से पैसा लिया है. हालांकि ये चंदा चेक के जरिए लिया गया है.

ये भी हो सकता है कि सारी कवायद कीचड़ उछालने के खेल का हिस्सा हो और चुनावी इंजीनियरिंग में इसकी ज़रूरत पड़ती हो.

लेकिन इसने राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे के सवाल को एक बार फिर से उभार दिया है.

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भाजपा समर्थक

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देश की राजनीतिक पार्टियों ने अपने चंदों से जुड़ी किसी भी जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने की तमाम कोशिशों का अब तक पुरजोर विरोध किया है.

सूचना के अधिकार कानून के तहत राजनीतिक दलों के इनकम टैक्स रिटर्न के बारे में जानकारी जुटाने के प्रयास पर भी सियासी जमातों ने जोरदार एतराज़ जताया था.

तीन सालों के संघर्ष के बाद केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने राजनीतिक दलों के इनकम टैक्स रिटर्न को आम लोगों की पहुंच के भीतर ला दिया.

निर्वाचन आयोग

मुख्य चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा.

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इनकम टैक्स रिटर्न से पता चला कि राजनीतिक पार्टियों को सैंकड़ों और हज़ारों करोड़ रुपये की आमदनी होती है.

उन्हें कोई आयकर नहीं देना पड़ता, क्योंकि इनकम टैक्स एक्ट की धारा 13 के तहत राजनीतिक दलों को इससे छूट मिली हुई है.

लेकिन क़ानूनन राजनीतिक दलों को 20 हज़ार रुपये से ज़्यादा के चंदे के बारे में निर्वाचन आयोग को जानकारी देनी होगी.

निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराई गई सूचना और इनकम टैक्स रिटर्न की पड़ताल से पता चला कि राजनीतिक पार्टियों की कुल आमदनी का 20 से 25 फीसदी ही ज्ञात स्रोतों से आता है, जबकि 75 से 80 फ़ीसदी आमदनी के स्रोत के बारे में कुछ नहीं कहा गया है.

सूचना क़ानून

आरटीआई कानून

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एक ऐसी भी राजनीतिक पार्टी थी, जिसकी सैंकड़ों करोड़ रुपये की आमदनी थी, लेकिन पार्टी ने कहा कि उसे एक भी चंदा 20 हज़ार रुपये से अधिक का नहीं मिला है.

जब राजनीतिक दलों से आरटीआई एक्ट के तहत उनके 75 से 80 फीसदी चंदे के स्रोतों के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि वे इस कानून के अंतर्गत लोक प्राधिकार नहीं हैं.

यह मुद्दा सीआईसी के सामने लाया गया और कई सुनवाईयों के बाद तीन जून 2013 को केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा कि छह राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस, बीजेपी, एनसीपी, बसपा, सीपीएम और सीपीआई आरटीआई कानून के तहत लोक प्राधिकार की परिभाषा पर खरी उतरती हैं और इसलिए ये लोक प्राधिकार हैं.

राजनीतिक चंदा

कांग्रेस पार्टी के समर्थक

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इस फैसले को आए 18 महीने हो चुके हैं, लेकिन छह पार्टियों में से किसी ने भी सीआईसी के आदेश को लागू नहीं किया है.

उन्होंने न केवल इस आदेश को नज़रअंदाज़ किया बल्कि किसी क़ानूनी मंच पर इसका विरोध भी नहीं किया.

और जब सीआईसी ने राजनीतिक पार्टियों के अध्यक्षों और महासचिवों से आदेश की तामील न करने के कारणों के बारे में जानना चाहा, उन्हें कई नोटिस भेजे, हाज़िर होकर सफाई देने के लिए कहा तो राजनीतिक दलों की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया.

नीतिगत फैसला

भारत, चुनाव, मतदान, लोकतंत्र

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राजनीतिक दल अपने चंदे के स्रोतों को ज़ाहिर करने के पक्ष में नहीं हैं और इसके कई कराण भी हैं. इसकी एक वजह तो ये भी है कि ये चंदे एक दूसरे को फायदा पहुंचाने के लिए दिए जाते हैं.

एक कंपनी अगर किसी राजनीतिक दल को चंदा देती है तो उससे बदले में किसी फायदे की उम्मीद रखेगी. उदाहरण के लिए ये फायदा कोई नीतिगत फैसला हो सकता है जिससे कंपनी को फायदा पहुंचता हो.

अगर चंदे का स्रोत ज्ञात हो तो सरकारी फैसलों का औचित्य राजनीतिक चंदे से जोड़ा जा सकता है और इसके मक़सद पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं.

विपक्षी पार्टियां

मुलायम सिंह यादव, मायावती, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी

एक बेहद दिलचस्प चलन और देखने में आ रहा है. कंपनियों का कहना है कि वे चंदा चेक के जरिए देना चाहते हैं, लेकिन सियासी जमातें ही ऐसा नहीं चाहतीं.

राजनीतिक दल कहते हैं कि वे चेक के जरिए पैसा लेने की इच्छुक हैं, लेकिन कंपनियां इससे इनकार करती हैं क्योंकि उन्हें डर है कि अगर विपक्षी पार्टियों को चंदे के बारे में पता चला तो वे भी ऐसी ही मांग करेंगी और चंदा न मिलने पर उनसे बदला लिया जा सकता है.

इसलिए राजनीतिक दलों का दावा है कि कंपनियां ही नकदी चंदे को तरजीह देती हैं.

दिलचस्प पहलू

छत्तीसगढ़ कोयला खनन
इमेज कैप्शन, कंपनियों और राजनीतिक पार्टियों की साठगांठ पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं.

नकदी चंदे के दूसरे पहलू भी हैं. राजनीतिक दल संदिग्ध गतिविधियों पर भी बहुत पैसा खर्च करते हैं.

इन खर्चों को न तो क़ानूनी तौर पर बताया जा सकता है और न ही किसी तरह इन्हें वाजिब ठहराया जा सकता है.

इस तरह के कामों में नक़द पैसा खर्च करने की ज़रूरत होती है. नक़द चंदे का एक और दिलचस्प पहलू है.

जब कोई चंदा नक़द दिया जाता है तो इसमें कोई शक़ नहीं है कि भुगतान की रसीद की भी कोई बात नहीं होती.

इससे ये संभावना भी बनी रहती है कि नक़द चंदे का एक हिस्सा निजी कामों के इस्तेमाल के लिए भी खर्च किया जा सकता है.

अनवरत दबाव

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चंदा देने वाले या लेने वाले की ओर से इसमें थोड़ी बहुत हेराफेरी भी की जा सकती है. चेक से दिए जाने वाले चंदों में ये नामुमकिन है.

विधि आयोग की रिपोर्ट में भी इस समाधान का सुझाव दिया गया था.

वर्ष 1999 में आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा था कि राजनीतिक पार्टियों के पैसे के हिसाब किताब को क़ानूनन पारदर्शी बना दिया जाना चाहिए.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या राजनीतिक पार्टियां कभी इस तरह का कानून बनाएंगी? आम लोगों का अनवरत दबाव रहा तो ये हो सकता है.

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