लोगों की बेचैनी का इलाज 'इमरजेंसी' होगी?

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- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नई दिल्ली में पिछले डेढ़ महीने में ईसाइयों के चार गिरिजाघरों पर हमलों के बाद उनके एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात की है.
उन्होंने राष्ट्रपति से अपने पूजा स्थलों, स्कूलों और अन्य संस्थानों पर होने वाले हमलों के ख़िलाफ़ सुरक्षा मुहैया कराने की अपील है.
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भाजपा के कुछ सांसद और नेता हिंदुओं की आबादी बढ़ाने के लिए कम से कम चार बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं.
क्योंकि उन्हें आशंका है कि मुसलमानों की जन्म दर अधिक होने के कारण आने वाले सालों में भारत में मुसलमानों की तादाद हिन्दुओं से अधिक हो सकती है.
सिर्फ़ यही नहीं भाजपा के कुछ सांसद और आरएसएस से जुड़े कुछ संगठन देश के कई इलाक़ों में अपने दावे के अनुसार मुसलमानों और ईसाइयों को वापस हिंदू बनाने में प्रयासरत हैं.
विकास का नारा

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ऐसे ही हालात हैं जिनके मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने आशंका जताई है कि भारत में जिस तरह के हालात पैदा किए जा रहे हैं, अगर यही सूरतेहाल क़ायम रही तो देश एक बार फिर साल 1975 जैसी इमरजेंसी की ओर बढ़ रहा है.
जस्टिस काटजू का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार विकास के नारे पर सत्ता में आई.
भाजपा की सत्ता को सात महीने हो चुके हैं लेकिन बक़ौल उनके विकास का कोई संकेत नज़र नहीं आता.
हिंदुत्व का एजेंडा

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काटजू का मानना है कि सरकार ने जिस तरह की आर्थिक नीतियां अपनाई है उनसे आने वाले दिनों में देश की आर्थिक स्थिति और भी जटिल हो सकती है.
जस्टिस काटजू के मुताबिक़ इस सूरत में भारत के युवा नई सरकार से बेज़ार होने लगेंगे और सरकार को जनांदोलनों को दबाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर वाली इमरजेंसी का सहारा लेना पड़ेगा.
प्रधानमंत्री मोदी चुनाव के समय से ही विकास और बेहतर सरकार की बात करते रहे हैं लेकिन वो जब से सत्ता में आए हैं हिन्दुत्व का पूरा एजेंडा भारत की राजनीति की धुरी बना हुआ है.
दक्षिणपंथी राजनीति

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प्रसिद्ध बुद्धिजीवी कांति बाजपेयी ने लिखा है, "धार्मिक दंगे, हिंदू धर्म के अन्य धर्मों विशेषकर इस्लाम से संबंध के बारे में भड़काऊ भाषण, राम जन्मभूमि के नाम पर जनमत प्रशस्त करना, धर्म परिवर्तन और शिक्षा प्रणाली को बदलकर एक नया सिस्टम लागू करना ही हिंदुत्व के एजेंडे के मुख्य पहलू हैं."
भारत एर्दोगान के तुर्की या व्लादिमीर पुतिन के रूस की तरह नज़र आता है जहां जनता आत्मसम्मान और विकास की तीव्र इच्छा लिए दक्षिणपंथी राजनीति और बहुसंख्यक समुदाय के लोकप्रिय नेताओं की ओर आकर्षित हो रही है.
बड़े परिवर्तन

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भारत में मनमोहन सिंह की दस साल की 'सुस्त' और 'निष्क्रिय' सरकार ने एक ऐसा राजनीतिक ख़ालीपन पैदा कर दिया है कि लोग अब मोदी से किसी चमत्कार की ही उम्मीद कर रहे हैं.
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने सात महीने की अवधि में महज़ कुछ नारों के अलावा किसी बड़े परिवर्तन के संकेत नहीं दिए हैं.
मोदी सरकार के भविष्य का सबसे स्पष्ट अनुमान अगले महीने के बजट में सामने आएगा.
दिल्ली चुनाव

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अगले महीने ही मोदी की राजनीतिक लोकप्रियता का अंदाज़ा हो सकेगा जब दिल्ली का विधानसभा चुनाव होगा, जहां भाजपा का मुक़ाबला अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से है.
दिल्ली के चुनाव मोदी की निजी लोकप्रियता के अनुमान के लिहाज़ से ही नहीं बल्कि भविष्य की राजनीति की दृष्टि से भी ख़ासे महत्वपूर्ण हैं.
अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी जीतती है तो यह मोदी की लिए महज़ चुनावी हार ही नहीं, भविष्य की सबसे बड़ा राजनीतिक चुनौती होगी.
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