आदिवासी और बंगाली मुसलमान ही क्यों?

- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
इस बार यहां कोई क्रिसमस नहीं मना सका. हालाँकि क्रिसमस से पहले ही पाखरीगुड़ी गांव के लोगों ने घरों पर मिट्टी का ताज़ा लेप लगाया था.
असम-पश्चिम बंगाल सीमा पर स्थित बारोबीशा में राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे मैंने ऐसे सैकड़ों घरों और स्कूलों को देखा.
वो क्रिसमस मनाते भी कैसे? 13 साल का सोमाइ मुर्मु और उसकी 18 साल की भाभी के ख़ून के धब्बे उनके घर के बाहर अब भी ताज़ा हैं. ये जगह बांस के उस खंबे से बस दो मीटर दूर है, जो क्रिसमस स्टार के लिए लगाया गया था.
हिंसा के निशान

इमेज स्रोत, Reuters
चार्ल्स मूर्मू के घर पर मैंने गोलियों के अनगिनत निशान देखे. उनकी बहू एनिस्थिया और उसका तीन साल का बेटा बुनिपास गोलियों से घायल हो गए थे और अब भी मौत से जंग लड़ रहे हैं.
चार्ल्स के घर के ठीक सामने सोम हंसदा का मकान है. हंसदा चरमपंथी हमले में मारे गए अपने परिजनों के लिए चावल से भरी थाली किचन में रखते हैं और फिर कुछ कपड़े समेटकर फटाफट राहत शिविर की तरफ़ भागते हैं.
हंसदा के बेटे स्टीफ़न चरमपंथियों की गोलियों से बचने के लिए किचन की तरफ़ भागे थे, लेकिन स्टीफ़न और उनकी मां की गोलियां लगने से मौत हो गई. हंसदा ने गड्ढे में कूदकर किसी तरह अपनी जान बचाई.

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ़ बोडोलैंड के संदिग्ध चरमपंथियों ने 23 दिसंबर को कोकराझार और सोनितपुर ज़िलों में कई गांवों में हमले किए थे और लगभग 70 आदिवासियों की हत्या कर दी थी. जवाबी कार्रवाई में 16 बोडो चरमपंथी भी मारे गए थे.
वर्चस्व की लड़ाई
कोकराझार ज़िला बोडोलैंड स्वायत्तशासी क्षेत्र में पड़ता है. इस इलाक़े को बोडो आदिवासी प्रशासित करते हैं.

ख़़ास बात यह है कि इस क्षेत्र में 70 प्रतिशत आबादी ग़ैर-बोडो लोगों की है, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी और बंगाली बोलने वाले मुसलमान भी शामिल हैं.
ब्रितानी शासन में संथाल विद्रोह के बाद आदिवासियों को यहां मध्य भारत से लाया गया था. वे अधिकतर ईसाई थे.
रोचक तथ्य यह है कि असम के आदिवासी 'अनुसूचित जनजाति' में शामिल नहीं हैं, जबकि मध्य भारत में रह रहे उनके परिवार अनुसूचित जनजाति में शामिल हैं.
दंगे रुकते क्यों नहीं?

असम में दंगों की रिपोर्टिंग करते हुए मैं लोगों से पूछता रहता था कि ये दंगे आख़िर रुकते क्यों नहीं? क्यों कभी मरने वाले बंगाली मुसलमान होते हैं तो कभी आदिवासी?
जिस किसी से भी मैंने ये सवाल पूछे, एक बोडो नेता को छोड़, लगभग सभी का जवाब था कि अल्पसंख्यक होने के बावजूद बोडो अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं.
इस क्षेत्र में आतंकवाद रोकने के लिए जब बोडोलैंड समझौता हुआ था, तो परिषद का गठन इस तरह किया गया कि बोडो लोगों का वर्चस्व बना रहे.

कई सांसदों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस समझौते पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.
फ़िलहाल तत्काल शांति के लिए लोग चाहते हैं कि बोडो नेताओं समेत जिन चरमपंथियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, उनके हथियार ज़ब्त किए जाने चाहिए.
शायद यही हमें असम में हिंसा से जुड़ी ख़बरों को कवर करने के लिए आने से रोक सकता है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












