तस्वीरेंः हिंसा के निशां और राहत के मकां

- Author, अमिताभ भट्टासाली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, असम से
असम में बोडो चरमपंथियों के आदिवासियों पर किए गए हमलों के बाद बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हुआ.
कोकराझार ज़िले में 36 राहत शिविर बनाए गए हैं. यहां 40,000 से भी ज़्यादा लोगों ने शरण ले रखी है.
पिछले कुछ दिनों में हिंसा प्रभावित इलाक़ों के तक़रीबन 70,000 लोगों ने अपना घर छोड़ दिया है.

जब संदिग्ध बोडो चरमपंथियों ने हमला किया तब चार्ल्स मुर्मु का 13 साल का बेटा शायद पढ़ाई कर रहा था.
दीवारों पर गोलियों के निशां हैं. चबूतरे पर एक किताब अब तक खुली पड़ी है.

कोकराझार के पखरीगुड़ी गांव में अपने घर के ख़ून से सने आंगन में बैठे हुए सोम हंसदा. उनकी पत्नी मरियम मुर्मु की मौत यहीं हुई थी.
सोम के बेटे स्टीफ़न हंसदा को रसोईघर के भीतर गोली लगी. सोम ने एक नाली में कूद कर अपनी जान बचाई.
उनके कानों में पत्नी और बेटे के चीख़ने-चिल्लाने की आवाज़ आती रही मगर वह उन्हें बचाने के लिए बाहर नहीं निकल सके.

जब अलगाववादी हमले हुए तब पखरीगुड़ी गांव में लोग क्रिसमस का जश्न मना रहे थे.

13 साल के सोमई मुर्मु और उसकी 18 साल की भाभी सुमिता इसी आंगन में हंसदा चरमपंथियों की गोली का शिकार हुए.
सोमई की बड़ी भाभी अनिसथिया टुडु और उनके 3 साल के बेटे बुनीपस को गोली लगी है. उनका अस्पताल में इलाज चल रहा है.

पखुरीगुड़ी स्कूल का राहत शिविर. यहां आस-पास के हिंसा प्रभावित गांवों से 1,812 लोगों ने शरण ले रखी है. इमारत की टिन की छत भी टूटी पड़ी है.

असम पुलिस कर्मचारी राहत शिविर के सामने गश्त लगाते हुए.

एक आदिवासी अपने धनुष-तीर के साथ राहत शिविर की रखवाली कर रहा है.

हमले में बच गए लोगों ने बताया कि उनके घरों के दरवाज़ों को ज़बरदस्ती खोलकर गोलियां चलाई गईं. कुछ गांववालों को घरों से बाहर निकालकर गोली मारी गई.
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