क्या अटल 'भारत रत्न' के हक़दार हैं?

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- Author, आकार पटेल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
ऐसे सम्मान को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा सकता जो नेल्सन मंडेला और सचिन तेंदुलकर दोनों को दिया गया हो.
जिसे पाने वालों में जवाहरलाल नेहरू और गुलज़ारी लाल नंदा दोनों का ही नाम हो.
'भारत रत्न' देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है लेकिन इससे नवाज़े गए ज़्यादातर लोग राजनेता हैं.
जिन 45 लोगों को अब तक 'भारत रत्न' दिया गया है, उनमें से 25 राजनीति की दुनिया के लोग हैं.
इसे राजनीति की दुनिया के 'लाइफ़टाइम अचीवमेंट' अवार्ड के तौर पर देखा जाता है और इसे पाने वाले लोगों की सूची देखकर यह बात एकदम साफ़ हो जाती है.
राजीव और इंदिरा

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जो लोग सत्ता में होते हैं, वे अक्सर ख़ुद को सम्मानित करते हैं और 'भारत रत्न' भी अपवाद नहीं है.
राजीव गांधी के नाम महान उपलब्धियां नहीं हैं लेकिन उन्हें यह सम्मान दिया गया जैसे कोई पारिवारिक चीज़ हो.
क्योंकि उनकी मां इंदिरा गांधी को भी 'भारत रत्न' दिया गया था.
<link type="page"><caption> भारतीय लोग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/11/111108_advani_vajpayee_skj" platform="highweb"/></link> महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार न दिए जाने की शिकायत करते हैं पर बहुत कम विचार किया जाता है कि आख़िर क्यों उन्हें 'भारत रत्न' नहीं दिया गया.
अभी तक जिन्हें यह सम्मान दिया गया है, ताज़ा मामला भी इसी की एक कड़ी भर है.
सर्वोच्च सम्मान

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इसी सूची में जुड़े नए नामों में एक अटल बिहारी वाजपेयी ख़ुद भी इन बातों को <link type="page"><caption> बहुत गंभीरता</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/01/120109_vajpayee_compaign_pp" platform="highweb"/></link> से नहीं लेते थे.
उन्होंने अपने घुटने का इलाज करने वाले डॉक्टर चितरंजन राणावत को भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण दे दिया.
एक राष्ट्र के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि हम सम्मानों को गंभीरता से नहीं लेते हैं. यही भावना सशस्त्र बलों के साथ भी लागू होती है.
साल 1999 में सेना ने 19 वर्षीय योगेंद्र यादव को अपना सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र 'मरणोपरांत' दिया.
बाद में पता चला कि हवलदार यादव शहीद नहीं हुए हैं बल्कि अस्पताल में गोलियों से मिले उन ज़ख्मों का इलाज करा रहे हैं जिनके लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया.
कड़वी सच्चाई

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वाजपेयी अच्छे व्यक्ति हैं, जिनके प्रति लोग सदिच्छा रखते हैं और वह ऐसी पार्टी के सबसे पसंदीदा नेताओं में हैं जिसमें नापसंद किए जाने वाले कई लोग हैं.
उनसे पहले 'भारत रत्न' पाने वाले राजनेताओं की फ़ेहरिस्त देखते हुए उन्हें सम्मान दिए जाने से मुझे कोई दिक़्क़त नहीं है.
बहरहाल मैं कुछ उन चीज़ों की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहूंगा जिन पर उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन करते समय रोशनी डाली जा सकती है.
हालांकि भारतीय जीवनी लिखने की कला में बहुत माहिर नहीं माने जाते लेकिन कुछ दशक बाद जब वाजपेयी की जीवनी लिखी जाएगी तो इसकी शुरुआत एक कड़वी सच्चाई से होगी.
पोखरन विस्फोट

वाजपेयी और उनके साथी लालकृष्ण आडवाणी ने एक ऐसे मुद्दे को हवा दी जिसने उनकी पार्टी को तो लोकप्रिय बनाया लेकिन तीन हज़ार लोगों की जान ली.
यह धारणा कि वाजपेयी एक भले आदमी थे और आडवाणी एक घाघ नेता, पूरी तरह कपोल कल्पित है.
यह बात इस तथ्य से साबित हो जाती है कि जब आडवाणी सत्ता की देहरी पर खड़े थे तो उन्हें अपने क़दम वापस खींचने पड़े थे.
और दूसरी चीज़ यह कि हाल के दशकों में वो वक़्त केवल एक बार आया जब भारत में कुल विदेशी निवेश ऋणात्मक रहा, वह वक़्त था 1998-99 का साल.
ऋणात्मक विदेशी निवेश से मतलब भारत से निवेश बाहर निकालने से है. और इसकी वजह पोखरन में वाजपेयी का कारनामा था.
ऋणात्मक विकास

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इससे देश का विकास प्रभावित हुआ, नौकरियां घटीं और ग़रीबी का दायरा बढ़ा जबकि इसका कोई रणनीतिक फ़ायदा होते नहीं दिखा.
सवाल लाज़िमी है कि 1997 की तुलना में भारत आज कितना सुरक्षित है.
वाजपेयी को इससे होने वाले नुक़सान का अंदाजा होना चाहिए था क्योंकि अनिश्चितता और हिंसा तथा विकास को एक दूसरे से जोड़ने वाले आंकड़े कभी बदलने वाले नहीं हैं.
भारत में पर्यटन क्षेत्र का विकास धीमा रहा है और जब-जब हमारी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा और कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ी घटना हुई, पर्यटन उद्योग को झटका लगा.
पर्यटन क्षेत्र में ऋणात्मक विकास के साल थे, 1984 (-8.5%), 1990 और 1991 (-1.7% दोनों बार) और 1993 (5.5%), 1998 (-0.7%), 2002 (-6%).
कविताएं

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ये वो साल थे जब दिल्ली में दंगे हुए, बाबरी मस्जिद आंदोलन और उसके परिणामस्वरूप हुए दंगे, पोखरन और फिर गुजरात दंगे हुए थे.
और वाजपेयी के व्यक्तित्व का आखिरी पहलू जिसे अमूमन नज़रअंदाज कर दिया जाता है, वह है उनकी कविताएं.
अगर आपको लगता है कि अटल जी का जोशीला अंदाज़ शायद और बेहतर हो सकता था, तो मुझे संदेह है.
कुछ साल पहले 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के क्रेस्ट एडीशन ने वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की कविताओं के बारे में मुझसे पूछा था.
'गहराई की कमी'

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ख़ुद को दोहराने के बजाय मैं उस रिपोर्ट का दोबारा ज़िक्र कर रहा हूं, "न तो मोदी और न ही वाजपेयी कविता में प्रवीण हैं. प्राकृतिक दुनिया के बारे में उनकी समझदारी बहुत कम है. उनकी कविताएं साधारण हैं और उनमें गहराई की कमी है."
"मोदी की कविताएं वाजपेयी से कुछ हद तक बेहतर कहीं जा सकती हैं क्योंकि वे अमूर्त विचारों को छूते हैं. वाजपेयी की कविताएं अकल्पनीय रूप से तुकबंदी वाली और बोझिल करने वाली हैं."
मुझे अब भी लगता है कि यह सच है.
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