अटल की राह पर चल पाएंगे मोदी?

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- Author, सुधींद्र कुलकर्णी
- पदनाम, पूर्व निदेशक, पीएमओ
"हर जन्मदिन आने पर मैं सोचने लगता हूं कि उम्र बढ़ रही है या घट रही है?"
यह वह सवाल था जो अटल बिहारी वाजपेयी अपनी अनोखी काव्यशैली में खुद से और 25 दिसंबर को उन्हें जन्मदिन की शुभकामना देने वालों के समूह से पूछा करते थे.
यह कुछ ऐसा था मानो कोई बौद्ध भिक्षु यह जानना चाहता हो कि सच के दो चेहरे होते हैं और कभी-कभी तो कई.
स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे महान वक्ता अब अपने जीवन के संध्याकाल में है. और इस स्थिति में भी नहीं हैं कि 25 दिसंबर को 90वें जन्मदिन की शुभकामना देने घर आए लोगों के जनसमूह से कुछ कह पाएं.
मनमोहन सहमत थे

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तक़रीबन पांच साल से वाजपेयी बहुत स्वस्थ नहीं रहे हैं. वे वाकई इस सम्मान के हक़दार हैं. उन्हें यह कई साल पहले ही दे दिया जाना चाहिए था.
पिछले साल रेसकोर्स रोड पर जब मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से उनके आवास पर मिला था तो मैंने उन्हें यह सुझाव दिया था.
मनमोहन सिंह सहमत थे कि वाजपेयी भारत रत्न के हक़दार हैं लेकिन वे फैसला नहीं ले सके.
सच के पहलू

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अटल जी से मुलाकातों में मैंने पाया कि उनकी एक ग़ज़ब की खासियत यह है कि वे किसी मुद्दे की सच्चाई के सभी पहलुओं को देखने के लिए तैयार रहते थे.
जब वे एक बड़े गठबंधन की अगुवाई करते हुए देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने छोटी पार्टियों को भी पूरा सम्मान दिया.
अटल जी हमेशा कहते रहे कि भारत बहुत बड़ा बहुलतावादी देश है, जहां धार्मिक, भाषाई, बौद्धिक और अन्य विविधताएं हैं और समानता और एकरूपता का संकीर्ण सिद्धांत राष्ट्रीय हितों को नुक़सान पहुंचा सकता है.
अटल की सोच

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इस विचारधारा से उनकी पार्टी और वृहत्तर संघ परिवार के कुछ लोग उनसे नाराज़ हो गए.
उन्हें लगता था कि अटल जी हिंदुत्व की विचाराधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं हैं.
भाजपा की विचारधारा को लेकर व्यापक समझदारी रखने वालों और संकीर्ण सोच वालों के बीच संघर्ष की स्थिति आज भी है.
उदाहरण के लिए अटल जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस विचार का कभी समर्थन नहीं किया कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है.
मेरा मानना है कि अगर भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत को एक स्थिर और कामयाब सरकार देना चाहती है तो उसे अटल जी की सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा अपनानी होगी.
सहयोग और सामंजस्य

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भले ही नरेंद्र मोदी को संसदीय चुनावों में 1996, 1998 या 1999 के चुनावों से ज़्यादा बड़ी कामयाबी मिली हो पर उन्हें वाजपेयी को अपने आदर्श की तरह अपनाना चाहिए.
वाजपेयी की तरह ही उन्हें पूरी राजनीतिक व्यवस्था के साथ सहयोग और सामंजस्य का संबंध स्थापित करना चाहिए.
उनकी तरह ही मोदी को अपने पड़ोसियों खासकर पाकिस्तान से चरमपंथ पर भारत के स्टैंड से समझौता किए बगैर संबंध सामान्य बनाने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए.
संवेदना और दूरदर्शिता

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अच्छी बात है कि चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाया कि वे 'कश्मीरियत, जम्हूरियत, इंसानियत' के सिद्धांतों पर चलेंगे.
दशक भर पहले अटल जी ने ही यह विचार दिया था.
राष्ट्रीय समस्याएं सुलझाने के लिए अटल जी की संवेदना और दूरदर्शिता कुछ ऐसी थी.
अटल जी अब बोल नहीं पाते पर अपने वैराग्य से ही उन्होंने देश के जनमानस पर अपना असर बना रखा है.
'इतनी ऊँचाई न देना'

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ऋषियों जैसा विवेक, महासागर जितना विशाल अनुभव, उनकी सहज सदाशयता, मंत्रमुग्ध करने वाली वाकपटुता वाजपेयी के पास ही है.
वे कहा करते थे, "हे प्रभु, मुझे इतनी ऊँचाई कभी न देना, अपने से दूर हो जाऊं, इतनी रुखाई कभी न देना."
जब अनगिनत लोग उन्हें बधाई दे रहे हैं, मैं भी उनमें हूं जिन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय में उनके साथ छह साल काम करने का मौका मिला और मुझे अंदाज़ा है कि भारत के लिए अटल जी के क्या मायने हैं.
(लेखक अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 1998 से 2004 के बीच प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े थे.)
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