जनता परिवार: इतिहास का मज़ाक़िया दोहराव?

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- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद बिखरे हुए जनता दल परिवार के नेता गुरुवार को दिल्ली में मिले.
सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के घर पर हुई बैठक के बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बताया कि जनता परिवार में एकता बनाने का प्रयास शुरू किया गया है. उनका कहना था कि यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा.
पत्रकार उर्मिलेश का विश्लेषण
एकता के प्रयास
कभी जनता दल में रहे सभी गुटों की एकता के नाम पर भारत की समकालीन राजनीति में एक बार फिर इतिहास को दोहराने की कोशिश हो रही है. अभी यह कहना कठिन है कि इस बार यह एक और त्रासदी साबित होगी या प्रहसन!
एकता-प्रयास की इस बैठक में गुरुवार को समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल(यू), जनता दल(एस) और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता शामिल हुए.

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भविष्य में कुछ और समूहों को भी इसमें शामिल करने की योजना है.
बैठक का एजेंडा पहले के एकता-प्रयासों से इस मायने में अलग था कि इस बार इन दलों के बीच सिर्फ़ एक - गठबंधन या मोर्चे के तहत काम करने तक ही सीमित नहीं रही, निकट भविष्य में सभी गुटों-दलों के विलय से किसी एक नए एकीकृत दल के गठन के प्रस्ताव पर भी व्यापक सहमति बनाई गई.
एकता या विलय
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल (एस) नेता एचडी देवगौड़ा और जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव व नीतीश कुमार विलय के पक्ष में बताए जा रहे हैं.

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उधर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद और इनेलो के दुष्यंत चौटाला ने एकता के प्रति अपनी वचनबद्धता तो दोहराई लेकिन ये दोनों नेता विलय के मामले में कुछ और वक़्त चाहते हैं.
शायद दोनों दल विलय के प्रस्ताव को हरी झंडी देने से पहले अपने संगठन के अंदर कुछ और चर्चा कर लेना चाहते हैं.
एकता बनाने के प्रयास में जुटे इन दलों के पास लोकसभा में कुल 15 सदस्य हैं. 2014 के संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने इन सबको उनके अपने-अपने सूबों में बुरी तरह पछाड़ा.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि मोदी के राजनीतिक अभ्युदय और केंद्र की भाजपा-नीत सरकार के कामकाज की नई शैली ने पुराने जनता दल के सभी नेताओं को अपने राजनीतिक वजूद और इन दलों के भविष्य पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया है.
मोदी के राजनीतिक प्रभामंडल का बढ़ता दबाव ही इन दलों की एकता या विलय-पहल के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति है. इसके अलावा इनके अपने बचे हुए जनाधार का भी दबाव होगा.
घटनाओं से सीख
एकता प्रयास की राजनीति को समझने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद के दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को भी देखा जाना चाहिए. इनका भी इन नेताओं पर असर पड़ा होगा.

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पहला घटनाक्रम है, बिहार और यूपी के उपचुनावों में भाजपा के दिग्विजय-रथ का बुरी तरह थम जाना. दूसरा है, महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस को शिकस्त देते हुए भाजपा का विजयी होना. मतलब साफ़ दिखा कि आमने-सामने की लड़ाई में जनता दल परिवार यूपी-बिहार में भाजपा को रोक सकता है.
बिहार के उपचुनावों नीतीश और लालू साथ मिलकर लड़े थे, जबकि लोकसभा चुनाव में वे अलग-अलग थे. यूपी में हुए उपचुनाव में बसपा ने प्रत्याशी नहीं दिए थे.
उपचुनावों के तत्काल बाद लालू ने पटना से बयान जारी किया कि यूपी में भी आगे से से मिलकर लड़ना चाहिए, जैसा बिहार में हमने किया. पर उस वक़्त मुलायम ने लालू के बयान को ख़ास तवज्जो नहीं दी. मायावती ने भी इसे व्यर्थ बताया.
इस सच को सभी मान चुके हैं कि सिर्फ़ कोई चमत्कार ही यूपी में मुलायम और माया को साथ ला सकता है!
फ़ायदे का गणित

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मुलायम को अपने पुराने जनतादल सहयोगियों से मिलकर एकीकृत दल बनाने के फ़ायदे का गणित फ़िलहाल अच्छा लगा. लेकिन राजनीति में अंकों का गणित हमेशा कारगर साबित नहीं होता. एकता के रसायनशास्त्र की भी ज़रूरत होती है. क्या वह मौजूदा एकता-प्रक्रिया में नज़र आ रही है?
अतीत को खंगालें तो जनता दली या दलीय कुनबे के एकता-प्रयासों में मुलायम की 'विश्वसनीयता' सबसे कमज़ोर कड़ी है. सन 2004 के बाद उन्होंने या अन्य राजनीतिक घटकों ने मुद्दा-आधारित गठबंधन या मोर्चे के जितने प्रयास किए, उन्हें ध्वस्त करने का सर्वाधिक श्रेय मुलायम को जाता है.
यूपीए-1 कार्यकाल में सपा, इनेलो, टीडीपी, नेशनल काफ्रेंस, एजीपी आदि ने मिलकर युनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (यूएनपीए) बनाया. कुछ ही महीने बाद 2008 में मुलायम ने यूपीए और न्यूक्लियर डील के समर्थन के सवाल पर उसे ध्वस्त कर दिया. वह अचानक यूपीए-डील के समर्थन में चले गए.
साल 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ममता बनर्जी और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ उनकी मोर्चेबंदी हुई पर वह भी कुछ घंटे से ज़्यादा नहीं टिकी. ममता ने उन्हें सर्वाधिक ग़ैरभरोसेमंद नेता बताया.
मोर्चे का भविष्य

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ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है, नई मोर्चेबंदी या एकीकृत दल अगर अस्तित्व में आते भी हैं तो उसका नेतृत्व कौन करेगा? अतीत के विघटन-तोड़फोड़ की जनता दल की आदतों से वह कितना बच सकेगा, उसका अपना एजेंडा क्या होगा?
आर्थिक नीति के स्तर पर कांग्रेस, भाजपा, सपा आदि के बीच ज़्यादा फ़र्क़ नहीं रह गए हैं. कमोबेश तीनों दल बड़े कारपोरेट और मध्यवर्ग के हितों पर ख़ास ध्यान देते हैं. ऐसे में क्या नया दल या गठबंधन नरेंद्र मोदी की सरकार और भाजपा की आर्थिक नीति का वैकल्पिक मॉडल सुझाए बग़ैर अपने जनाधार के बीच समर्थन जुटा सकेगा?
उल्लेखनीय है कि इन दलों का बड़ा जनाधार पिछड़े, अल्पसंख्यक और कुछेक दलित समुदायों में है. नेतृत्व और नीतिगत मसलों पर किसी नएपन के बग़ैर काठ की हांडी बार-बार चूल्हे पर कैसे चढ़ेगी?
नई राजनीतिक सोच और भरोसेमंद नेतृत्व के अभाव में इस तरह की जमावड़ेबंदी से सिर्फ़ इतिहास का एक मज़ाक़िया दोहराव होगा. नया करना है तो नई राजनीतिक अंतर्वस्तु भी चाहिए.
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