बिहार: 'ज़्यादा ख़ुश न हों लालू-नीतीश'

लालू, नीतीश

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    • Author, सिद्धार्थ वरदराजन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बिहार उपचुनाव के नतीजों से राजद और जनता दल यूनाइटेड में उत्साह हैं.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन मानते हैं कि ये नतीजे भाजपा को ध्रुवीकरण की ओर लौटने पर मजबूर कर सकते हैं.

इसकी भी कम ही संभावना है कि भाजपा विरोधी ऐसा महागठबंधन उत्तर प्रदेश में भी बनेगा.

पढ़ें पूरा विश्लेषण

नीतीश कुमार और लालू यादव के महागठबंधन के पीछे शुरुआती वजह थी भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए का जदयू, राजद और कांग्रेस के कुल वोटों के मुकाबले कम वोट पाने के बावजूद लोकसभा की 40 में से 31 सीटें जीतना.

अब उपचुनाव में एनडीए को चार और महागठबंधन को छह सीट मिलने से लगता है कि कम से कम सतही तौर पर ही सही, लेकिन नीतीश-लालू की रणनीति काम कर गई.

भाजपा को भी इससे राहत मिली होगी कि वो कम से कम चार सीट जीतने में कामयाब रही.

माया, मुलायम

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इमेज कैप्शन, बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह से गठबंधन की संभावनाओं को मायावती ख़ारिज कर चुकी हैं.

*आंकड़े राजनीतिक शोधकर्ता अभय कुमार ने संकलित किए हैं.

लेकिन भारत और बिहार के लिए इन नतीजों का विश्लेषण करते वक़्त ये चार बातें ध्यान में रखना ज़रूरी है.

  • पहली ये कि उपचुनावों में मतदान प्रतिशत क़रीब 44 फ़ीसदी रहा, जो कि लोकसभा चुनाव से काफ़ी कम है. ये सोचा जा सकता है कि ये नतीजे मोदी सरकार और उसकी नीतियों के ख़िलाफ़ हैं लेकिन इन चुनावों के स्थानीय कलेवर और कम मतदान को ध्यान में रखना होगा.
  • दूसरी बात ये कि नरेंद्र मोदी की छवि का इन चुनावों पर असर नहीं था और मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर वोट दिया होगा.
  • तीसरी और अहम बात ये कि इन 10 सीटों के नतीजे 2014 के लोकसभा चुनावों के आधार पर नहीं हैं. भाजपा ने नरकटियागंज, मोहनियां और बांका पर जीत हासिल की. इन सीटों पर भाजपा को राजद, जदयू और कांग्रेस के वोटों से कम वोट मिले थे. इससे पता चलता है कि राजद और जदयू के वोट एक दूसरे को आसानी से ट्रांसफ़र नहीं होते.
  • चौथी बात ये कि 2009 में जब भाजपा और जनता दल यूनाइटेड साथ थे तब ये दोनों दल मिलकर 18 सीटों पर हुए उपचुनाव में 12 की जगह सिर्फ़ पांच सीट जीतने में कामयाब रहे थे. लेकिन विधानसभा चुनाव में एनडीए जीता था.
नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, उपचुनाव में मोदी का उतना असर देखने को नहीं मिला

इसका मतलब ये हुआ कि कम से कम बिहार में तो उपचुनाव ये परखने का अच्छा ज़रिया नहीं है कि राजनीतिक हवा किस ओर बह रही है.

फिर ध्रुवीकरण?

हां, ये ज़रूर पूछने लायक है कि ये नतीजे भाजपा और इसके विरोधियों को राष्ट्रीय स्तर पर कैसे प्रभावित करेंगे.

अगर महागठबंधन को इन चुनावों में एकतरफ़ा जीत मिलती तो इससे भाजपा के दूसरे विरोधी एक महागठबंधन बनाने के बारे में सोच सकते थे. अब इसकी संभावना कम ही है.

लालू, नीतीश

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इमेज कैप्शन, दशकों की खटास को भुला कर लालू और नीतीश एक मंच पर आए हैं

इन चुनावों के नतीजों का सबसे बड़ा असर भाजपा पर होगा. उसे महसूस होगा कि मोदी और 'विकास' के उनके संदेश का राज्य स्तर पर वैसा असर नहीं हुआ जैसा लोकसभा चुनाव में हुआ था.

भाजपा ने नरकटियागंज और बांका जीती, जहां महागठबंधन ने मुसलमान उम्मीदवार खड़े किए थे. इससे लगता है कि यहां जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर भाजपा को हिंदू वोट मिले.

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