एक शहर कब हो जाता है 'स्मार्ट'

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- Author, तुषार बनर्जी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मोदी सरकार भारत के सौ शहरों को 'स्मार्ट' बनाना चाहती है.
लोगों में भी चाह है कि वे स्मार्ट शहरों के निवासी कहलाएं, लिहाज़ा इस परियोजना पर उनकी नज़र भी बनी हुई है.
लेकिन एक बड़ा सवाल सभी के सामने है और वो ये है कि एक शहर आखिर 'स्मार्ट' कब कहलाता है.
सरकार से लेकर इन योजनाओं पर काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों और आम लोग तक इसका अलग-अलग जवाब देते हैं.
ऐसा होना लाज़मी भी है क्योंकि 'स्मार्टनेस' की परिभाषा सभी के लिए अलग होती है.
हमने बात की निर्माण और वास्तुकला पर जाने-माने लेखक गौतम भाटिया से और जानने की कोशिश की कि आखिर एक स्मार्ट सिटी होती कैसी है? पढ़िए बातचीत के कुछ मुख्य अंश.

आपके लिए एक 'स्मार्ट सिटी' के क्या मायने हैं?
स्मार्ट सिटी मुझे 21वीं सदी का शब्द लगता है, जिसे किसी स्मार्टफ़ोन या स्मार्टहाउस की तर्ज पर सोचा गया हो. लेकिन किसी शहर को स्मार्ट कहना मेरे हिसाब से थोड़ा ज़्यादा हो जाएगा क्योंकि हर शहर की अपनी संस्कृति होती है, कैरेक्टर होता है. हर शहर अपने आप में काफ़ी जटिल होता है, इसलिए उसके लिए ‘स्मार्ट सिटी’ शब्द का प्रयोग सही नहीं लगता है.
‘स्मार्ट सिटी’ शब्द सुनते ही सबसे पहले किस तरह की तस्वीर आती है आपके ज़ेहन में?
एक ऐसा शहर जो काम करता हो, जहां लोग साइकिल चला पाते हों, सड़कों पर पैदल चलने की जगह हो, पार्क हो, यातायात सुलझा हुआ हो. सड़कें और इमारतें योजनाबद्ध तरीके से बनी हों, शहरी और सार्वजनिक यातायात सुलभ हो. बिजली, पानी, इंटरनेट जैसे आम सुविधाओं की अबाध्य आपूर्ति हो. बाकी, शहर का कैरेक्टर तो धीरे-धीरे ही तैयार होता है.
ये किसी नए बसे शहर पर शायद बेहतर फिट हो लेकिन पुराने शहर कैसे बनेंगे स्मार्ट?
भारतीय शहरों को ‘स्मार्ट सिटी’ बना पाना आसान काम तो बिल्कुल नहीं होगा. सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे ज्यादातर पुराने शहर अनियोजित हैं, उनकी सही मैपिंग उपलब्ध नहीं है. इन शहरों की 70 से 80 फ़ीसदी आबादी अनियोजित इलाकों में रहती है. इन इलाकों में लगातार आवाजाही होती रही है. ऐसे में आप काम की शुरूआत भी कैसे कर पाएंगे. इससे आसान तो होगा कि नए शहर ही बसाए जाएँ, जहां हर चीज़ कि प्लानिंग पहले से की गई हो.

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क्या आपको लगता है ‘स्मार्ट सिटी’ जैसे कॉन्सेप्ट से विदेश में भारत की छवि को फायदा होगा?
मुझे लगता है कि एक अंतरराष्ट्रीय छवि तैयार करने के उद्देश्य से ही सरकार स्मार्ट सिटी परियोजनाओं पर काम कर रही है लेकिन उन्हें मेरा सुझाव ये है कि वो काम करने वाले शहर बनाए, जहां काफ़ी कुछ हो सकता हो, इसके बजाय की उसे सिर्फ़ स्मार्ट साबित करने पर चिंता की जाए.
तो क्या पूरे देश में 100 शहर चुनकर उन्हें ‘स्मार्ट’ बनाने की बजाय बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए?
नहीं, मैं सिर्फ़ सड़कों और मूलभूत सुविधाओं की बात नहीं कर रहा हूं. हमारे शहरों की संरचना और लोगों के रहन-सहन में बड़ी जटिलता है.
शहर की एक बड़ी आबादी पक्के मकानों में रहती है, जबकि लगभग उतनी ही आबादी सड़कों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है. सरकार को ऐसे शहर बनाने चाहिए, जहां लोगों के रहन-सहन में थोड़ी समानता दिखे.
बाक़ी कंप्यूटर और इंटरनेट सेवाएं तो इसके बाद भी शुरू की जा सकती है.
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