राजस्थान: कैसे आई बीजेपी की लहर

राजस्थान में जिस तरह कमल खिला है, उसका अंदाजा खुद भाजपा के नेताओं को भी नहीं होगा.
राज्य में जिन 199 सीटों पर चुनाव हुए, उनमें भारतीय जनता पार्टी ने 162 सीटें जीती. एक सीट पर चुनाव टाल दिया गया था.
नरेंद्र मोदी के समर्थन में चली हवा ने कांग्रेस को बुरी तरह झुलसा दिया है. कांग्रेस ने पिछले चुनाव में 96 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वह मुश्किल से 21 सीटें हासिल कर पाई.
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, "भाजपा की नेता वसुंधरा राजे झूठ बोल-बोलकर सरकार की पहलों और अच्छी योजनाओं को भी दुष्प्रचारित करने में सफल हो गईं."
<link type="page"><caption> राजस्थान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131122_rajasthan_politics_gotra_division_dil.shtml" platform="highweb"/></link> में भाजपा की ऐतिहासिक जीत और कांग्रेस के करारी हार के कारणों को समझने की ज़रूरत है.
मोदी की लहर
राजस्थान में मोदी और हिंदुत्व का ये तीव्र उभार एकाएक नहीं हुआ. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेटवर्क के माध्यम से प्रदेश में हिंदुत्व की लहर भीतर ही भीतर चल रही थी.
भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने राज्य में 20 आक्रामक सभाएं करके भाजपा के पक्ष में बवंडर सा ला दिया था.
कांग्रेस के एक प्रमुख नेता कहते हैं, "थार के सूने विस्तार में मोदी के बारे में लोगों में चर्चा सुनी तो चौंक सा गया था, लेकिन तब यह कल्पना नहीं कर सकते थे कि परिणाम इतने चौंकाने वाले आ सकते हैं."
कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि मोदी की लहर का अहसास न होने से कांग्रेस रणनीति नहीं बना पाई और हार गई. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान में सिर्फ पांच सभाएं कीं और सोनिया ने तीन.
प्रधानमंत्री मनमोहन की जयपुर में हुई सभा में काफी कम भीड़ जुटी, जिसका भाजपा नेताओं ने जमकर प्रचार किया.
राज्य में चुनाव नतीजों को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि आम मतदाता ने राहुल गांधी को ख़ारिज कर दिया है. वे मतदाताओं को उस तरह रिझाने में सफल नहीं हुए, जैसा उनकी मां सोनिया गांधी लोगों को राजनीतिक तौर पर लुभाने में सफल रहती हैं.
वसुंधरा बनाम गहलोत

इस बार का विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के व्यक्तित्वों के बीच भी लड़ा गया.
वसुंधरा राजे के शासन काल पर गहलोत ने बार-बार सवाल उठाए हैं, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि वसुंधरा अपने कामों का सकारात्मक और कांग्रेस के अच्छे कामों के बारे में भी लोगों के बीच खराब छवि गढऩे में माहिर हैं.
गहलोत कहते हैं, "झूठे आरोप लगा लगाकर उन्होंने दवाइयों को ज़हर बताया, सोशल सिक्योरिटी की योजनाओं को रेवडिय़ां बताईं. केवल उन्हीं मु्द्दों को उन्होंने उठाया. हमने प्रयास किया कि विकास की बात करें. उसी को मुद्दा बनाकर चुनाव जीतें."
प्रदेश में आरटीआई, रोजगार, मनरेगा और पेंशन अभियान चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे कहते हैं, "पेंशन स्कीम, मुफ्त दवा स्कीम या दूसरी सामाजिक लाभ की योजनाओं को अच्छी तरह लागू करने के बावजूद गहलोत इनका राजनीतिक लाभ नहीं ले पाए."
महंगाई बड़ा सवाल बना
सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे के ही तर्क को लें तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार कामकाज तो अच्छा ही कर रही थी, लेकिन महंगाई ने लोगों को बहुत तकलीफ़ दी.
महंगाई के सवाल ने न केवल निचले वर्गों बल्कि मध्यम और उच्च वर्ग को भी गुस्से से भर दिया.
मतदान से ठीक पहले डीजल के दाम बढ़ाने की घोषणा की गई और अखबारों में भी केंद्रीय नेताओं के हवाले से बयान आया कि अप्रैल से घरेलू गैस के दाम बढ़ सकते हैं. खुद गहलोत ने भी माना कि महंगाई एक मुद्दा था.
इधर वसुंधरा राजे ने भी अपनी 'स्वराज संकल्प यात्रा' के दौरान महंगाई के मुद्दे को महिलाओं से जोड़ते हुए बार-बार सरकार को कठघरे में खड़ा किया. और वे उसमें सफल रहीं.

केंद्र सरकार का भ्रष्टाचार भी लोगों के लिए बड़ा मुद्दा रहा.
राजस्थान में हुए 75.20 प्रतिशत मतदान से जो नतीजे आए हैं, उनमें नए मतदाताओं का भी योगदान रहा. इस बार राजस्थान विधानसभा चुनाव में 45 लाख से ज़्यादा नए मतदाता जुड़े हैं.
मोदी ने जब राजस्थान में रैलियां कीं तो बहुत से युवा तंबुओं के लिए लगाए गए बांसों पर चढ़े दिखाई दिए.
इससे पूरा माहौल बदला और नतीजा ये निकला कि भाजपा के ऐसे उम्मीदवार भी जीत गए, जिनकी हार को लेकर भाजपा के नेता ख़ुद आश्वस्त थे.
चुनाव अभियान की शैलियां
अगर पूरे राज्य से मिली रिपोर्टों को देखें तो भाजपा ने बेहद <link type="page"><caption> कुशलता से चुनाव अभियान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131125_rajasthan_candidates_analysis_aa.shtml" platform="highweb"/></link> चलाया, जबकि कांग्रेस का चुनाव अभियान पूरी तरह बिखरा हुआ था.
भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी, वसुंधरा राजे और राजनाथ सिंह ने अलग-अलग सभाएं कीं.

कांग्रेस के सब नेता एक साथ रहे और जब-जब सोनिया गांधी, राहुल गांधी या मनमोहन सिंह आए तो उनके इर्द गिर्द ही चक्कर लगाते रहे.
प्रदेश में टिकट वितरण में भाजपा ने बार-बार सर्वे करवाए और हर दावेदार के बारे में लोगों का फीडबैक लिया, न कि अपने नेताओं की रिपोर्ट को माना.
कांग्रेस के नताओं की मानें तो पार्टी हाईकमान ने ऐसे फ़ार्मूले बनाकर उन लोगों के टिकट काटे, जो जीत सकते थे या एक ही आधार पर जीतते आ रहे हैं.
कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान कहते हैं कि टिकट वितरण तो ठीक ही हुआ था, लेकिन लोग ही एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा का मूड बनाए हुए थे.
टिकट वितरण में सीपी जोशी, शीशराम ओला और जितेंद्र सिंह जैसे नेताओं की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
इस पर गहलोत कहते हैं, "यह हमारी पार्टी का अंदरूनी मामला है. हर राजनीतिक दल में अपने-अपने तरीके से टिकट बांटे जाते है."
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