एफआईआर दर्ज करना अनिवार्यः सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर अपराध के मामले में प्राथमिक यानी एफ़आईआर दर्ज करने को अनिवार्य बनाते हुए कहा है कि ऐसा नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ कार्रवाई की जाएगी.
प्रधान न्यायाधीश पी. सतशिवम की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी है.
जिन अपराधों में तीन या उससे अधिक साल की सज़ा हो सकती हैं, उन्हें गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाता है. इसमें जांच अधिकारी बिना वारंट के अभियुक्त को गिरफ़्तार कर सकता है.
क़ानून के जानकारों ने शीर्ष अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है. आपराधिक मामलों के जाने-माने वकील मजीद मेमन ने बीबीसी से कहा कि इससे पुलिस अधिकारियों पर बिना देरी किए मामला दर्ज करने का दबाव बढ़ेगा.
प्राथमिक जांच
फ़ैसले के मुताबिक़ एफ़आईआर दर्ज किए जाने के एक सप्ताह के भीतर प्राथमिक जांच पूरी करनी होगी. इसका उद्देश्य केवल यह पता करना होगा कि क्या मामला, गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं. पीठ ने शिकायत की सच्चाई जांचने संबंधी जांच अधिकारियों के तर्क को खारिज़ कर दिया.
मेमन ने कहा कि अब पुलिस अधिकारी केवल इस आधार पर मामला दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकते कि उनको शिकायत की सच्चाई पर संदेह है.
उन्होंने कहा, ''अब एफ़आईआर दर्ज करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है.'' लेकिन उन्होंने माना कि इससे फ़र्ज़ी शिकायतों की बाढ़ आएगी और इसमें पुलिस अधिकारियों को संतुलन बनाना होगा.
हालांकि क़ानून के कुछ अन्य जानकार इस फ़ैसले से बहुत उत्साहित नहीं है.
आशंका
सर्वोच्च न्यायालय की वकील कामिनी जायसवाल ने बीबीसी से कहा कि यह फ़ैसला आईपीसी की धारा 154 का दोहराव है, जिसके तहत मामले को दर्ज करना अनिवार्य है.
उन्होंने कहा, ''यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यह प्रभावी होगा.''
लेकिन कई ऐसे मामले हैं जिन पर यह अनिवार्यता लागू नहीं होगी. ऐसे में जायसवाल के मुताबिक़ पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग करती रहेगी. शिकायतों पर पुलिस मामला दर्ज करने में देरी करती रहेगी. उदाहरण के तौर पर घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में रिश्वत के लिए वह दोनों पक्षों का उत्पीड़न करती रहेगी.
अदालत ने अपने फ़ैसले में पुलिस अधिकारियों को शादी से जुड़े विवाद, भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मामले दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच करने का अधिकार दिया है.
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