सॉफ़्ट ड्रिंक्स की समय-समय पर जांच हो: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, एफ़एसएसएआई को सभी कार्बन-युक्त पेय पदार्थों की समय-समय पर जांच करने का आदेश दिया है. न्यायालय ने ये आदेश इसलिए दिया है क्योंकि ये मुद्दा संविधान के तहत नागरिकों के जीने के मौलिक अधिकार से जुड़ा है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मंगलवार को केएस राधाकृष्णन और एके सीकरी की एक पीठ ने ये आदेश उस जनहित याचिका पर दिया जिसमें सॉफ्ट ड्रिंक्स के "हानिकारक प्रभावों" से नागरिकों की सुरक्षा के लिए इन पेय पदार्थों की निगरानी के लिए एक अलग पैनल बनाने की मांग की गई थी.
आदेश में पीठ ने कहा, "एफ़एसएसएआई समय-समय पर कार्बन-युक्त पेय पदार्थों की जांच करेगा."
उच्चतम न्यायालय ने 13 दिसंबर 2012 को साल 2004 में दायर की गई उस जनहित याचिका पर अपना आदेश रिज़र्व कर दिया था जिसमें लोगों की सेहत पर सॉफ़्ट ड्रिंक्स के कथित हानिकारक असर का मूल्यांकन करने के लिए एक अलग समिति बनाने की मांग की गई थी. साथ ही इस याचिका में पेय पदार्थों के लेबल पर उसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की विस्तृत जानकारी छापने की भी मांग की गई थी.
इस याचिका में दावा किया गया था कि कार्बन-युक्त पेय पदार्थों की सामग्री से "लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर हानिकारक असर" पड़ता है और इन पेय पदार्थों से होने वाले ख़तरों की जांच और निरीक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं.
लेकिन सॉफ़्ट ड्रिंक बनाने वाली बड़ी कंपनी पेप्सी ने इस जनहित याचिका का विरोध किया था. पेप्सी का कहना था कि खाद्य सुरक्षा और मानक क़ानून में पेय पदार्थों के लिए बनाए गए मानदण्ड "काफ़ी" थे.
'तयशुदा मात्रा से नुकसान नहीं'

इस याचिका को दायर करने वाली ग़ैर-सरकारी संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन, सीपीआईएल, ने अपनी 2004 की याचिका में कोला कंपनियों को लेबल पर सामग्री की जानकारी देने की मांग और बच्चों को निशाना बनाने वाले "भ्रामक" विज्ञापनों की निगरानी करने की भी मांग की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2011 को एफ़एसएसएआई को स्वतंत्र वैज्ञानिक समितियां फिर से गठित करने के लिए कहा था जो कार्बन-युक्त पेय पदार्थों में मौजूद रसायनों के हानिकारक प्रभावों की जांच करेंगी.
एफ़एसएसएआई ने पेय पदार्थों में मौजूद कृत्रिम स्वीटनर, फोस्फोरिक, मैलिक और सिट्रिक एसिड, कार्बन डाइऑक्साइड, रंग, बेन्ज़ोइक एसिड और कैफ़ीन जैसी सामग्री के निरीक्षण के बाद एक आदेश दिया था. संस्था की समिति ने कहा था कि तयशुदा मात्रा में इन सभी सामग्री से स्वास्थ्य को कोई ख़तरा नहीं है.
इससे पहले एफ़एसएसएआई के वकील ने कहा था कि मौजूदा जनहित याचिका में उठाए गए सभी मुद्दे साल 2006 में बने खाद्य सुरक्षा और मानक क़ानून के तहत आते हैं.
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर, ने भी कहा था कि उसके द्वारा किए गए अध्ययन में भी पाया गया कि तयशुदा मात्रा में सामग्री के इस्तेमाल से स्वास्थ्य को कोई नुक़सान नहीं होता.
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