'इनके पास न तो संगठन है, न अभिव्यक्ति'

- Author, रविकांत
- पदनाम, गैरसरकारी संगठन 'शक्तिवाहिनी' के कार्यकर्ता
सांसद के घर में काम करने वाली महिला की हत्या के बाद अब ये सवाल गंभीरता से उठ रहे हैं कि आखिर घरेलू कामगारों के साथ हो रही हिंसा पर रोक कैसे लगाई जाए.
भारत में <link type="page"><caption> घरेलू कामगारों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/01/130110_international_others_srilanka_maid_da.shtml" platform="highweb"/></link> को श्रम का बेहद सस्ता माध्यम माना जाता रहा है. इसके अलावा घरेलू श्रम करने वाले इस वर्ग के पास न तो ताकत है, न संगठन और न ही <link type="page"><caption> अभिव्यक्ति</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131001_domestic_help_rescued_sr.shtml" platform="highweb"/></link>. सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने कारण लोग इनका फायदा उठाते हैं.
घरेलू श्रम असंगठित क्षेत्र में आता है. असंगठित क्षेत्र होने के कारण इनकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है.
यदि घर में काम करने वाले किसी महिला के साथ <link type="page"><caption> मालिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/10/131023_maid_entrepreneur_brazil_an.shtml" platform="highweb"/></link> हिंसा करता है तो ऐसा कोई फोरम नहीं जहां जाकर वे अपनी बात कह सकें, शिकायत कर सकें.
'घरेलू कामगार बिल'

हालांकि घरेलू कामगारों के हितों की सुरक्षा के लिए कानून 'घरेलू कामगार बिल' तैयार है.
मगर यह बिल महिला आयोग के पास पड़ा हुआ है. इस बिल को 2004-2007 के बीच गैरसरकारी संगठनों ने मिलकर तैयार किया था.
राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसे स्वीकृति देकर सरकार के पास भेजा था. पर उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.
जहां तक प्लेसमेंट एजेंसी पर नियंत्रण रखने की बात थी, उसके लिए दिल्ली सरकार एक बिल लाई, 'प्लेसमेंट एजेंसी बिल'. मगर इस बिल का कोई फायदा नहीं है क्योंकि ये केंद्रीय कानून नहीं है.
यह बिल केवल दिल्ली के लिए होगा. जबकि घरेलू कामगारों की नियुक्ति बाहर से की जाती है. इसलिए इसमें ट्रैफिकिंग का भी काफी डर है.
राजनीतिक अड़चनें
'प्लेसमेंट एजेंसी बिल' के भी अब प्रभावहीन हो जाने का खतरा पैदा हो गया है क्योंकि नई सरकार इसमें अपने तरीके से बदलाव ला सकती है.
हालांकि कल श्रम विभाग ने हाईकोर्ट में कहा है कि चुनाव के बाद हम इस बिल को फिर से लाएंगे.
घरेलू कामगार बिल को कानून बनाने में सामाजिक सुरक्षा एक बड़ी समस्या के रूप में उभर कर आ रही है.
इसलिए कोशिश ये हो रही है कि घरेलू कामगारों के हितों के लिए अलग से कानून न बनाकर इसे सामाजिक सुरक्षा में शामिल कर लिया जाए.
इसका मतलब ये होगा कि घरों में काम करने वाले सामाजिक सुरक्षा के योग्य होगें. वे सरकारी बीमा के भी अधिकारी होंगे.
शोषण का आर्थिक पहलू

घरेलू कामगारों का क्षेत्र काफी बड़ा है. यह बहुत सारे कामगारों को रोजगार देता है. इसलिए इस सेक्टर को विशेष कानून की जरूरत है. मगर अफसोस ऐसा अभी तक नहीं हो पाया.
काफी बड़ा क्षेत्र होने के कारण शहरों, छोटे कस्बों में इस काम से जुड़ी महिलाओं और बच्चों से जुड़े कोई आंकड़े नहीं हैं.
जबकि हाल ये है कि हर घर में एक घरेलू कामगार मौजूद है.
इनके शोषण के पीछे एक खास तरह की अर्थव्यवस्था काम करती है. लोग 300-400 या 1000-1200 रुपए जितने मामूली रकम देकर महीने भर काम करवाते हैं.
कानून का डर नहीं

इनके लिए कानून बना तो न्यूनतम मजदूरी का सवाल उठेगा. इससे बचने के लिए सरकार इस ओर कोई तवज्जो नहीं दे रही.
घरेलू कामगारों के साथ हिंसा की खबरें लगातार सामने आ रही हैं. मगर इससे कई गुणा ज्यादा ऐसे मामले हैं जो दर्ज ही नहीं होते हैं.
एक तरफ तो हिंसा चारदीवारी के भीतर होने से पता नहीं चलता है. दूसरे लोगों में कानून का डर नहीं है.
'घरेलू कामगार बिल' में प्रावधान है इन कामगारों को 6 दिन के बाद हफ्ते की एक छुट्टी मिलनी चाहिए. मगर इन्हें महीने में मुश्किल से एक या दो छुट्टी ही मिलती है.
आखिर वे भी कामगार हैं. अपने कार्यक्षेत्र में जाते हैं. उन्हें भी अन्य कामगारों की तरह सम्मान मिलना चाहिए. मगर ये नहीं हो रहा.
घरों में काम करने वालों को हिंसा से बचाने का बस एक ही तरीका है कि एक विशेष कानून बने जो इनकी सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी को सुनिश्चित करे.
(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)
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