टूट जाएगा दिलों को जोड़ने वाला 'तार'

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इमेज कैप्शन, 162 साल पुरानी तार सेवा 15 जुलाई 2013 से बंद हो रही है. बीएसएनएल ने घाटे के चलते इसे बंद करने का फ़ैसला लिया.
    • Author, अजय शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

हिंदुस्तान में काफ़ी वक़्त तक टेलीग्राम का दूसरा नाम रहा है ख़ौफ़. इस ख़ौफ़ के बीच कई बार टेलीग्राम ख़ुशी की वजह बना, तो कई बार उदासी की. इसके बावजूद हिंदुस्तान को इस ख़ौफ़ से मोहब्बत रही है क्योंकि ये ज़िंदगी को आसान बनाने वाला ज़रिया था.

15 जुलाई 2013 वो तारीख़ है, जिस दिन 162 साल पुराना टेलीग्राम का ये ख़ौफ़ यादों से विदा हो जाएगा, मगर हिंदुस्तानी जनमानस की यादों से टेलीग्राम को इतनी आसानी से मिटाया नहीं जा सकेगा.

असल में यह तात्कालिकता और 'अर्जेंसी' जताने-बताने का वो मनोवैज्ञानिक तरीक़ा था, जिसकी जगह आज तक मेल और एसएमएस भी नहीं ले पाए हैं.

भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बीएसएनएल ने 12 जून को यह फ़ैसला लिया कि 14 जुलाई की रात 10 बजे के बाद तार सेवा बंद कर दी जाएगी.

इस ऐलान के साथ ही तार विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों को तीन विकल्प दिए गए कि वे 29 जून तक दूसरे विभागों में अपना स्थानांतरण करा लें.

ईस्टर्न कोर्ट से अब नहीं जाएंगे तार

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इमेज कैप्शन, बीएसएनएल ने 12 जून को यह फ़ैसला लिया कि 14 जुलाई की रात 10 बजे के बाद तार सेवा बंद कर दी जाएगी.

राजधानी दिल्ली में ईस्टर्न कोर्ट वो ऐतिहासिक इमारत है, जहाँ भारत संचार निगम लिमिटेड के तार विभाग का मुख्यालय रहा है. मगर अब यहाँ से तार नहीं किए जा सकेंगे.

मगर वो कौन सी वजहें थीं जिनकी वजह से टेलीग्राम को हिंदुस्तान अलविदा कह रहा है. बीबीसी ने बीएसएनएल के सीनियर जी एम शमीम अख़्तर से बात की.

उनका कहना था कि टेलीग्राम सेवा बंद करने के पीछे कई कारण रहे. पहला तो यह कि टेलीग्राम से बेहतर सेवाएं मौजूद हैं. जो ज़्यादा तेज़ रफ़्तार, किफ़ायती और भरोसेमंद हैं.

उन्होंने बताया, "इस वक्त बीएसएनएल टेलीग्राम की वजह से घाटा उठा रहा था. साल 2006 से अब तक बीएसएनएल को करीब 15 सौ करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है. इसमें से सिर्फ पिछले साल 135 करोड़ का घाटा हुआ. इसलिए टेलीग्राम बंद करने का फ़ैसला लिया गया."

शमीम अख़्तर के मुताबिक पहले बहुत से लोग टेलीग्राम करते थे. 1985 में रोज़ 6 करोड़ टेलीग्राम भेजे जाते थे, जो घटते-घटते 2008 में 22 हजार रोज़ से 2013 तक क़रीब 5000 टेलीग्राम रोज़ तक आ गए हैं.

हालांकि उन्होंने माना कि कुछ सरकारी विभागों जैसे सेना में आज भी तार की अहमियत उतनी ही है.

शमीम अख़्तर कहते हैं कि इसके बावजूद लोगों को तार की कमी नहीं खलेगी क्योंकि उसकी जगह उससे ज़्यादा ताकतवर संचार के साधन मौजूद हैं.

मगर अदालतों में तार एक सुबूत की तरह पेश होता रहा है. इस पर शमीम अख़्तर ने कहा, "हो सकता है कि कोर्ट नई चीजों को भी कॉग्नीजेंस दे. मैसेज को मंजूरी मिले शायद. अभी तक तो ये ऑन पेपर प्रूफ होता है. जैसे किसी की तबीयत खराब है."

अपने निजी अनुभवों का ज़िक्र करते हुए शमीम अख़्तर बताते हैं, "जब टेलीग्राम किसी जगह पहुंचता था, तो दो तरह के ख़तरे रहते थे. या तो वो खुशी देने वाला तार होगा या ग़मी का. लोग उत्सुक रहते थे."

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शमीम अख़्तर का कहना था, "हमारे समय में एक्ज़ाम की जानकारी देने के लिए भी तार भेजे जाते थे. खुशी का संदेश, किसी की शादी की मुबारकबाद जैसी सूचनाएं देने के लिए भी इसे भेजते थे."

‘नया काम सीखना पड़ेगा अब’

जिन लोगों ने अपना जीवन तार विभाग को समर्पित किया, उनके लिए तार सेवा बंद होने की ख़बर वज्रपात से कम नहीं. इससे उनकी खुशियां और दुख दोनों जुड़े थे.

बीबीसी ने तार विभाग में 1975 से काम कर रहे कर्मचारी आर के गोयल से बात की, जिनके रिटायरमेंट में क़रीब डेढ़ साल का वक़्त बचा है. उनका कहना है कि किसी नए विभाग में जाने पर उन्हें अब नया काम सीखना पड़ेगा.

गोयल के मुताबिक अब भी 400 से 500 तार रोज़ भेजे जाते हैं और ‘पहले इस विभाग में क़रीब ढाई तीन हज़ार कर्मचारी थे. अब सिर्फ़ 20-25 ही बचे हैं’.

हमने पूछा कि इंटरनेट, मोबाइल और मेल के ज़माने में लोग किस तरह के तार करते हैं. गोयल ने कहा, "कोर्ट केस का होता है, इसके लिए प्रूफ चाहिए, मिलिट्री वालों को छुट्टी है, उसके लिए यही सिस्टम था, जिससे वो इन्फॉर्म करते थे. ये बंद हो जाएगा तो उन्हें बड़ी मुश्किल हो जाएगी. एसएमएस वहां काम नहीं करता, किसी के पास मोबाइल है तो किसी के पास नहीं है."

‘हमने इन्सेंटिव कमाए हैं तार भेजकर’

1980 से तार विभाग में काम करने वाली उषा गौतम भी तार बंद होने से आहत दिखीं. वह बताती हैं कि पहले कई तरह के तार होते थे. "प्रेस के तार एक्सप्रेस कहलाते थे, इमरजेंसी के तार को ट्रिपल ओ कहते थे और इन्हें सबसे पहले भेजा जाता था. डबल एक्स का मतलब था डेथ मैसेज. इसके बाद ऑर्डिनरी तार आते थे. अब सभी तार एक्सप्रेस तार कहलाते हैं."

वो बताती हैं, "तार का ही प्रूफ चलता है, तार नहीं होगा तो मुसीबत झेलनी पड़ेगी. पूरा सिस्टम फेल हो जाए तो यही एक रास्ता है तार भेजना."

उषा बताती हैं कि पहले वो एक दिन में चार-पांच सौ तार भेजकर इन्सेंटिव भी कमा लेते थे. 200 से 300 तार भेजने के बाद हर तार पर 5 पैसे इन्सेंटिव मिलता था.

‘पुलिस से डरते थे, तार पर भरोसा था’

ईस्टर्न कोर्ट में ही काम करने वाले तारकर्मी किशन कुमार के मुताबिक अब ग़रीब आदमी के लिए काफ़ी मुश्किल हो जाएगी. वह अपनी बात अदालतों और अफ़सरों तक कैसे पहुंचाएगा.

"जहां पुलिस से ग़रीब आदमी डरता है, थाने तक नहीं जा सकता, वो अपना संदेश टेलीग्राम के जरिए ह्यूमन राइट्स के पास पहुंचाता है. ये ज़रिया बंद हुआ तो ग़रीब का हक़ छिन जाएगा."

‘भावनाओं पर काबू रखकर भेजे हैं तार’

सीनियर टेलीकॉम असिस्टेंट राजेंद्र बाबू ने तार से जुड़ी अपनी कुछ यादें साझा कीं. उन्होंने बताया, "एक बार लड़का-लड़की आए थे. यह ज्यादा पुरानी बात नहीं है, वे घर से निकले हुए थे. दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली थी. घर वालों ने लड़के के खिलाफ एफआईआर करवा दी थी. वे टेलीग्राम देने आए और यहां साफ़ लिखा कि हमारे पेरेंट्स जो एक्शन ले रहे हैं वो न किया जाए और अगर कोई दुर्घटना होती है, तो उसके लिए वे ज़िम्मेदार नहीं होंगे."

राजेंद्र बाबू ने बताया कि कई बार उन्होंने ऐसे तार भेजे हैं कि वो ख़ुद भावुक हो उठे. एक बार उन्होंने एक ऐसे पिता का तार भेजा था, जिनका बेटा हादसे में मर गया था.

करगिल युद्ध के दौरान भी उन्हें कई ऐसे तार भेजने पड़े, जिनमें सेना की तरफ़ से घर वालों को उनके बेटे की मौत की ख़बर दी गई थी. अपने जज़्बात और दुख पर काबू रखकर उन्हें यह काम करना होता था और वह भी सबसे पहले.

‘कबाड़ियों को बेच दीं मोर्स मशीनें’

अरविंद कुमार सिंह बताते हैं कि मोर्स कोड की मशीनों के ज़रिए 1985 तक तार भेजे जाते रहे. इसके बाद वो मशीनें विभाग ने कबाड़ में बेच दीं.

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उनका कहना है कि पहले जो तकनीक इस्तेमाल होती थी, वो काफ़ी भरोसेमंद थी. अब इंटरनेट आधारित तकनीक है. अगर सर्वर डाउन होता है तो कोई तार नहीं भेजा जा सकता. जबकि मोर्स तकनीक में बैकअप की सुविधा थी.

अगर किसी वजह से मशीन ठप हो जाती थी, तो भी उसमें दर्ज 100 टेलीग्राम तक बैकअप से निकल आते थे.

दिल्ली के ईस्टर्न कोर्ट में तार के लिए इस्तेमाल होने वाली मोर्स कोड मशीनें अब कहीं नहीं हैं. कुछ कर्मचारियों ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि ये मशीनें कई साल पहले कबाड़ियों को बेच दी गईं थीं. बीबीसी संवाददाता ने शिमला के तारघर में भी इन मशीनों की तलाश की, मगर वहां भी स्टोरकीपर ने यही जानकारी दी कि मशीनें कबाड़ियों को बेची जा चुकी हैं.

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