'नदी किनारे बसने वालों का परिवार नहीं बचता'

- Author, चंडी प्रसाद भट्ट
- पदनाम, पर्यावरणविद
अपना <link type="page"><caption> पर्यावरण</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130622_uttarakhand_rescue_operation_sp.shtml" platform="highweb"/></link> बचाने के लिए हिमालयी समाजों के अपने परंपरागत तौर-तरीक़े रहे हैं. विशेष रूप से उत्तराखंड में प्रकृति के संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है.
आप ऊपर के इलाक़ों में जाएँ तो पाएँगे कि वहाँ गाँवों के बुज़ुर्ग जंगलों और घाटियों में चलते हुए ऊँची आवाज़ों में बोलने से मना करते हैं. कहा जाता है कि इससे वन देवियाँ नाराज़ हो जाती हैं.
हम ऊँचाई में पड़ने वाले बुग्यालों में जूते पहनकर नहीं जाते थे. मौसम से पहले ब्रह्म कमल और फेन कमल जैसे सुंदर फूलों को नहीं तोड़ने की परंपरा रही है.
<link type="page"><caption> जल प्रलय की कहानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/uttarakhand_flood_special_ml.shtml" platform="highweb"/></link>
मनपाई बुग्याल से रुद्रनाथ के रास्ते पर एक बार हम पशुपालकों के छप्परों में उनके साथ रहे. ऐसी ऊंचाई वाली जगहों पर ब्रह्म कमल और फेन कमल पाया जाता है. इसका दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.
पूर्णमासी को नंदा देवा या वन देवी की पूजा की जाती है. उसके बाद सुबह ही कमल को तोड़ा जाता है. पशुपालकों के पास कोई दवा तो होती नहीं है. वे दर्द से राहत के लिए कमल की राख पेट पर मलते हैं.
लोक विश्वास

मैंने पूछा कि नंदाष्टमी के पहले आपने पुष्प को क्यों तोड़ा तो उन्होनें कहा कि हमने अपने हाथों से नहीं बल्कि अपने मुख से इन फूलों को तोड़ा है, जैसे पशु तोड़ते हैं.
जैसे प्रकृति पशुओं को किसी भी <link type="page"><caption> मौसम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130621_uttarakhand_flood_casualty_vr.shtml" platform="highweb"/></link> में घास चरने की अनुमति देती है. वैसे ही वन देवी से फूलों को तोड़ने की अनुमति ली जाती है.
गढ़वाल में एक पुरानी कहावत कही जाती है, "नदी तीर का रोखड़ा, जत कत सोरों पार यानी नदी के किनारे मकान बनाने वालों का परिवार नष्ट हो जाता है."
यही हाल आज भागीरथी, अलकनंदा और <link type="page"><caption> केदारनाथ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130621_uttarakhand_disaster_update_rd.shtml" platform="highweb"/></link> से निकलने वाली मंदाकिनी नदी के आसपास बसे क़स्बों-गांवों पर लागू हो रही है.
हिमालयी समाज पर्यावरण को बचाने के लिए इस तरह के लोकविश्वासों का सहारा लेता रहा है लेकिन अब गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक, पूरे पहाड़ में जगह-जगह पांच-छह मंज़िला इमारतों के निर्माण ने लोक विश्वासों की अनूठी परंपरा को बेमानी सा बना दिया है.
पहले लोग सावन के महीने में नींव डालते थे. जमीन बनाने के पहले मिट्टी सूंघी जाती थी ताकि उसकी भार सहने की क्षमता का अनुमान लगाया जा सके.
प्राकृतिक विपदा

अब पहाड़ और <link type="page"><caption> हिमालयी समाज</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130620_uttarakhand_flood_victims_relatives_vr.shtml" platform="highweb"/></link> के लोग भी विकास की इस दौ़ड़ में शामिल हैं. वे भी इससे फ़ायदा उठा रहे हैं. उनको नौकरियां मिल रही है.
उनको लगता है कि लोक परंपराओं को अपनाने से हम पीछे रह जाते हैं, लेकिन यह विकास टिकाऊ नहीं है.
परंपरा का निर्माण करने वालों को पता था कि राजा के आदेश या कानून का पालन लोग भले न करें लेकिन प्रकृति और धर्म से जुड़ी बातों को लोग अपनाने में संकोच नहीं करेंगे.
वनदेवी और वनदेवता की मान्यताओं के पालन के लिए किसी तरह के वाह्य दबाव की आवश्यकता नहीं होगी.
केदार घाटी, कर्ण प्रयाग और नंद प्रयाग में लोग पहले नदियों से दूर बसते थे. पर आज तो नदियों के किनारे भारी बसाहट हो गई है.
अगर नदी बौखलाती है तो आसपास की जगहों को बिना अमीर-गरीब का भेदभाव किए अपने साथ बहा ले जाती है.
हिमालय में प्राकृतिक विपदा तो पहले भी आती रही है, लेकिन अभी <link type="page"><caption> अनियोजित विकास</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130618_uttarakhand_flood_vr.shtml" platform="highweb"/></link> बाकी लोगों पर भी असर डाल रहा है.
भारी विनाश

बड़ी इमारतों की जगह छोटे-छोटे ढाबे से लोगों को रोज़गार मिल सकता है. लेकिन ज्यादा बड़े निर्माण से हमारे अस्तित्व पर सवाल उठ रहा है.
हमें टिकाऊ विकास वाली सोच पर ध्यान देना होगा ताकि स्थिरता बनी रहे.
अभी मैंने पांच जून को उत्तरकाशी में देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए चट्टानों को विस्फोट करके तोड़ा जा रहा था.
वे लोग विस्फोट का सहारा ले रहे थे लेकिन आज अगर मैं देहरादून में सरकार के लोगों को अपनी बात कहूं तो वे मानने के लिए तैयार नहीं होंगे.
पहले के लोग विवेकवान और विचारवान लोग थे. जैसे 1982 में विष्णु प्रयाग परियोजना में फूलों की घाटी से निकलने वाली नदी पुष्पावती को टनल के सहारे हनुमान घाट पहुंचाया जा रहा था.
उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पांच-छह पेज का पत्र लिखा था. उसकी प्रति हेमवंती नंदन बहुगुणा को भी दी थी. उनके अनुरोध पर इस परियोजना को रोक दिया गया था.
आज उत्तराखंड में इतना भारी विनाश हुआ है लेकिन लोग एक महीने बाद सब कुछ भूल जाएंगे. अभी की परिस्थिति को लेकर मन में गुस्सा है.
संवेदनशील क्षेत्र

उत्तराखंड में 1991 में आए भूकंप से कई पहाड़ों में दरार आ गई थी और फिर 1998 में भी कुछ पहाड़ टूट गए थे. जिसमें दो गांव दब गए थे.
मैंने तत्कालीन कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार से निवेदन किया था कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कमज़ोर इलाकों को चिह्नित किया जाए.
अगर बहुत संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित किया जाए तो कुछ मदद मिल सकती है.
इसरो और विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से कुछ इलाकों को चिह्नित करके ऋषिकेश से गंगोत्री, टनकपुर से मालपा, रुद्रप्रयाग से बद्रीनाथ के सर्वे करके (एनआरएसएस) हैदराबाद की नेशनल रिमोट सेंसिंग की मदद से एटलस बनाए गए थे.
उत्तरकाशी के ऊपर वर्णावत पहाड़ है. सन 2001 में पता चला कि उसमें दरार पड़ी हुई है. दो साल बाद ही वो ध्वस्त हो गया. ऐसे सक्रिय भूस्खलन और पुराने भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान करके नेशनल रिमोट सेंसिग(एनआरएसएस) ने एटलस बनाया है, लेकिन उस पर किसी का ध्यान नहीं गया.
इसके लिए चेतावनी का सिस्टम बनाने की बात भी उठाई थी. सूचना तंत्र के माध्यम से गांव के लोगों तक सूचना पहुंचानी चाहिए.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आकाशीय सर्वेक्षण के माध्यम से सूचना दे सकता है लेकिन पर्यावरण के लिए काम करने वाले विभिन्न विभाग आपस में मिलकर काम नहीं करते.
यूएनडीपी के तहत आपदा प्रबंधन के लिए काम करने वाले युवा लड़कों को तमाम आधारभूत चीज़ों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
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