असम में लगातार हिंसा क्यों?

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- Author, सुबीर भौमिक
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में फैली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही, लेकिन क्या वजह है कि असम में हिंसा और खून खराबे का दौर अक्सर विकराल रुप ले लेता है.
पिछले कुछ दिनों की हिंसा में कम से कम 40 लोग मारे जा चुके हैं और एक लाख से ज़्यादा लोग बेघर हुए हैं.
मामला इस हद तक बिगड़ चुका है कि हिंसा को रोकने के लिए सैन्यबलों को उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए गए हैं.
असम में फैली इस हिंसा की जड़ में राज्य में ‘बाहरी घुसपैठ’ भी है. इसी के चलते राज्य के मूल निवासियों और बंगाल से आए प्रवासियों के बीच नस्ली हिंसा भड़की है.
राज्य में जनसांख्यिकी का ढर्रा बदल रहा है, जमीन और रोजगार की उपलब्धता घट रही है और राजनीतिक रस्साकशी ने ‘असम पर अधिकार’ के मुद्दे को ज्वलंत बना दिया है.
कौन हैं असम के 'असली' निवासी?

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असम में मौजूद प्रवासियों का कहना है कि असम में खेती के विकास के लिए उनके पूर्वजों और खानदान के लोगों को अंग्रेज़ों के दौर में पूर्वी बंगाल से यहां लाया गया.
उनका कहना है कि असम के मूल निवासियों की तरह वो भी अब कई पीढ़ियों से असम का हिस्सा हैं.
हालांकि कई अन्य समुदायों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा ढीली होने का फायदा उठाते हुए बांग्लादेश के गरीब किसान बड़ी संख्या में असम में दाखिल हो रहे हैं.
सामुदायों के बीच भड़की नस्ली हिंसा का सबसे बुरा दौर 1983 में रहा, जब लगभग 3000 लोगों की मौत हुई थी.
प्रवासियों के मुद्दे पर असम के मूल निवासियों के साथ अब स्थानीय कबायली गुट भी आ गए हैं.
हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों का यह कहकर बहिष्कार किया गया कि चुनाव में ज़्यादातर प्रवासियों की भागीदारी है.
केन्द्र सरकार से नाराजगी
1983 में हुए चुनावों के बाद भारत सरकार ने 1985 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किए.
एएएसयू राज्य में चल रहे आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था और इस करार के तहत 1966 के बाद राज्य में आए प्रवासियों के चुनाव में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई थी.

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प्रवासी इसके दस साल बाद ही चुनावी प्रणाली का हिस्सा हो सकते थे.
असम के कट्टरपंथी नेताओं ने इस अपने साथ धोखा मानते हुए भारत सरकार के खिलाफ हिंसक संघर्ष छेड़ दिया.
बीस साल बाद अब उल्फा केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर रहा है और चाहता है कि असम के मूल निवासियों के हित सीमापार से हो रही अवैध घुसपैठ से सुरक्षित किए जाएं.
कोकराझाड़ पर निशाना क्यों?
असम में हाल ही में जारी हिंसा से पश्चिमी असम के चार जिले प्रभावित हुए हैं. ये वो जिले हैं जहां बांग्लादेश से आए लोग और बोडो, रभास और गारोस मूल के लोग आमने-सामने हैं.
बोडो आदिवासियों के गढ़, कोकराझाड़ में मुस्लिम प्रवासी लगातार बोडो अलगाववादी विद्रोहियों का शिकार होते रहे हैं. इसके चलते राज्य में अक्सर दंगे भड़क जाते हैं.
ऐसी ही एक हिंसा में वर्ष 1993 में बांसबाड़ी के एक विस्थापित शिविर में 100 से ज़्यादा मुसलमान मारे गए थे.
असम में हो रही हिंसा केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं. इस हिंसा के चलते भारत के कई पूर्वी-पश्चिमी राज्य प्रभावित हुए हैं. कोकराझाड़ का ये इलाका बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि ये वो इलाका है जो असम को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है.












