महँगाई की वजह सरकारी नीतियाँ?

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी मानते हैं कि खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी चिंता का विषय है.

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इमेज कैप्शन, वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी मानते हैं कि खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी चिंता का विषय है.
    • Author, प्रोफ़ेसर अरुण कुमार
    • पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिन्दी कॉम के लिए

नई आर्थिक नीतियों की वजह से ही सरकार महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है.

इनमें सब्सिडी को काटना, खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में हस्तक्षेप ना करना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत आने वाले लोगों की संख्या घटाना शामिल हैं.

इसी के साथ बाज़ार पर निर्भर करना यानि बाज़ार को खोल देना और पूंजीवादियों को उसमें दाखिल होने देना भी एक कारण है.

फिर बाज़ार खोले जाने की वजह से बाहर से आने वाली वस्तुओं से अलग दबाव बनता है और बाहरी निवेश से वायदा कारोबार को बढ़ावा मिलता है.

इन सबसे महंगाई बढ़ रही है क्योंकि नई आर्थिक नीतियों में पहले जैसे वो ज़रिए नहीं हैं जो महंगाई को ख़ुद-ब-ख़ुद रोक पाएं.

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ज़रूरत है कि सरकार कृषि क्षेत्र में शोध कर उत्पादन क्षमता बढ़ाए. इस समय तो कृषि क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों का कहना है कि उन्हें घाटा हो रहा है और वो इससे बाहर निकलना चाहते हैं.

'सरकार नीतियों को लकवा मारा'

ऐसा नहीं कि सरकार कुछ कर नहीं सकती लेकिन उसकी नीतियों को मानो लकवा मार गया है.

सरकार की नई आर्थिक नीतियों से लगता है कि वो अमीर तबके और कॉर्पोरेट जगत के हित को ज़्यादा महत्व देती है.

ध्यान दें कि दो साल पहले देश में बहुत ज़्यादा फ़सल हुई थी लेकिन सरकार के कुप्रबंधन की वजह से तब भी महंगाई बढ़ी.

यहां तक की कई इलाकों में सूखे के हालात थे लेकिन खाद्य पदार्थों की कमी वहां भी रही और उससे दाम बढ़े.

एक दलील ये भी दी जाती है कि मनरेगा जैसे कार्यक्रमों से ग्रामीण जनता की आय बढ़ी है और इससे मांग और आपूर्ति का अंतर बढ़ां है जो महंगाई बढ़ाता है.

लेकिन मेरे ख़्याल से महंगाई बढ़ने के बाद ऐसे कार्यक्रमों से ग्रामीण जनता को कुछ राहत मिली है, ना कि इसके उलट.

एक गौरतलब बात ये भी है कि सरकार का महंगाई का आंकड़ा भी सही नहीं है क्योंकि ये सेवा क्षेत्र को शामिल नहीं करता.

भारत में इस वक्त सेवा क्षेत्र लगभग 60 फ़ीसदी है और इसमें स्वास्थ्य, बैंकिंग, शिक्षा इत्यादि शामिल हैं.

इसीलिए सरकार के महंगाई कम होने के ऐलान के बाद भी जनता को लगता है कि उसे अब भी बढ़ती कीमतों से जूझना पड़ रहा है.