धमाका जो छोड़ गया भविष्य का सूनापन

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली के सराय रोहिल्ला स्टेशन के पास विनोद जायसवाल के घर के बाहर मातम के लिए लोग जमा हैं. बुधवार को उच्च न्यायालय के सामने हुए धमाके में मारे गए लोगों में विनोद भी शामिल थे. बाहर कुर्सी पर उनके 81-वर्षीय पिता शंभूनाथ रिश्तेदारों के साथ बैठे थे.
‘बहुत मुश्किल समय है हमारे लिए’ उन्होंने बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा.
दिल के मरीज़ शंभूनाथ को पहले ही दो बार दौरा पड़ चुका है और बाईपास सर्जरी भी हो चुकी है. घर की हालत इतनी जर्जर कि कभी भी गिर जाए. इसी घर के मुकदमे के लिए विनोद बुधवार को उच्च न्यायालय गए थे.
मुक़दमा पिछले 55 सालों से चल रहा है. पहले पिता ने लड़ा, अब विनोद लड़ रहे थे. भविष्य में कौन लड़ेगा पता नहीं. अंदर विनोद की पत्नी सरला देवी का रोते-रोते बुरा हाल था. दोनो बेटे माँ को संभालने की कोशिश कर रहे थे.
"आप तो आज हैं, कल भूल जाएँगे. जिसके घर का कोई आदमी ऐसे चला जाए, उसके यहाँ क्या हाल होता है, ये आप क्या जानें? 55 साल पुराने केस चलते रहते हैं. कम से कम इनका फ़ैसला तो होना चाहिए. केस ही इन्हें ले डूबा," एक रिश्तेदार ने कहा.
करीब 15 लोगों के इस घर की ज़िम्मेदारी विनोद पर थी. उनके सभी भाई भी उन पर निर्भर थे. आगे क्या होगा, किसे पता.
मुर्दाघर
लेडी हार्डिंग अस्पताल के मुर्दाघर से शवों को एक के बाद एक परिवार वाले घर ले जा रहे थे.

पास ही प्रमोद चौरसिया के कुछ दोस्त बैठे थे. प्रमोद उच्च न्यायालय अपने दोस्त अरविंद झा की ज़मानत करवाने गए थे. प्रमोद तो मारे गए, लेकिन बाकी दोस्त कुछ चोटों के साथ बच गए.
सुफ़ेर चौहान की आँख धुआँ और कुछ बाहरी सामग्री जाने से लाल हो गई है. अरविंद के भाई सुबोध के पाँव में छर्रे लगे हैं. लेकिन जब कल दोनों राम मनोहर लोहिया अस्पताल गए तो उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद जाने को कहा गया. उन्हें उपचार के बाद दवा भी ख़ुद ही ख़रीदनी पड़ी.
आगे की दवा-दारू की ज़िम्मेदारी भी उन्हें ही लेना होगी जिसमें एक्सरे और दूसरी जाँच शामिल हैं.
सुबोध ने कहा, "हमें उन्होंने कहा कि दवा ख़रीद लेना और खा लेना. जब ज़रूरत हो तो आ जाना जाँच करवाने."
दूसरे कुछ लोग अपने रिश्तेदार का शरीर मिलने में देरी होने से बेहद नाराज़ थे, खासकर दिल्ली पुलिस से. गेट के बाहर नारे लग रहे थे.
"सोनिया गाँधी हाय-हाय. मनमोहन सिंह हाय-हाय. राहुल गाँधी हाय-हाय."
राम मनोहर लोहिया अस्पताल
मारे गए लोगों में विजय कुमार के बेटे विनय भी शामिल थे. उनके जैसे कई लोगों की नाराज़गी अस्पताल में आने वाले वीआईपी लोगों से है.
"जब-जब वीआईपी आए हैं, तब-तब समस्या हुई है. मुझे लगता है कि एक-दो मरीज़ जिन्हें बचाया जा सकता था, वीआईपी लोगों के आने की वजह से उन्हें नहीं बचाया जा सका. अगर वो नहीं आते तो स्थिति बेहतर होती."
'लेकिन क्या आपने ऐसा कुछ आँखों से देखा?', मैंने विजय कुमार से पूछा.
उन्होंने कहा, "मैं अस्पताल के अंदर मौजूद था. जो मरीज़ टेस्ट करवाने जा रहे थे, वो सुरक्षा कारणों से कम से कम आधा घंटे बाद सुरक्षा घेरे के बाहर निकल पाए. उनके आने की वजह से जैसे काम बंद हो जाता था."
बुधवार को अस्पताल जाने वालों में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी, केंद्रीय मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लाल कृष्ण अडवाणी और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उप राज्यपाल तेजिंदर खन्ना शामिल थे.
हमने जब इस बारे में अस्पताल की अतिरिक्त चिकित्सा अधीक्षक डॉक्टर एमके गिल से बात करनी चाही तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया.












