प्रियदर्शिनी के हत्यारे को अब उम्रक़ैद

सुप्रीम कोर्ट ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड मामले में संतोष कुमार सिंह को मिली मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया है.
अक्तूबर, 2006 में दिल्ली हाई ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड में दोषी पाए गए संतोष कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी.
संतोष कुमार सिंह ने उन्हें मौत की सज़ा दिए जाने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
संतोष कुमार सिंह एक वकील हैं और भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र हैं.
प्रियदर्शिनी हत्याकांड मामले में संतोष कुमार सिंह को पहले 1999 में निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
संतोष कुमार सिंह ने प्रियदर्शिनी मट्टू की वर्ष 1996 में बलात्कार के बाद हत्या कर दी थी. उस समय प्रियदर्शिनी की उम्र 23 साल थी और वह कानून की पढ़ाई कर रही थीं.
14 साल लंबा मामला

वर्ष 1999 में सत्र न्यायालय के जज जीपी थरेजा ने अपने निर्णय में कहा था कि वह जानते हैं कि हत्या संतोष ने की है, लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें छोड़ा जा रहा है.
केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की थी और अभियुक्त को मृत्युदंड देने की माँग की थी.
यह मामला छह वर्षों तक न्यायालय में पड़ा रहा लेकिन बाद में विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इस मामले में जल्द न्याय के लिए मीडिया के सहयोग से जोरदार अभियान चलाया था.
इसके बाद उच्च न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई सप्ताह में तीन दिन करने का फ़ैसला किया था.
अक्तूबर, 2006 में हाईकोर्ट ने संतोष कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी. लेकिन लगभग चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को उम्रक़ैद में बदल दिया है.
प्रियदर्शिनी मट्टू के 75 वर्षीय पिता सीएल मट्टू ने कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से निराश हुए हैं क्योंकि वे उम्मीद कर रहे थे कि इस अपराध के लिए संतोष कुमार सिंह की मौत की सज़ा को बरकरार रखा जाएगा.
उन्होंने कहा कि 14 साल का समय बहुत अधिक होता है.












