उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के लिए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के क्या हैं मायने?

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- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र में पिछले साल उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच सियासी घमासान मचा था. लड़ाई थी कि बहुमत किसके पास है, असल शिवसेना कौन है और सत्ता संभालने का हक़ किेसे है. मामला कोर्ट में पहुंचा. कई याचिकाएं दाखिल हुईं.
इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई के बाद गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि तत्कालीन राज्यपाल ने विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट का जो आदेश दिया था वो नियमों के तहत नहीं था.
राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने 34 विधायकों की गुज़ारिश पर फ़्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को जो जानकारी मौजूद थी वो इतनी नहीं थी कि ये फ़ैसला लिया जाए कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे विश्वास मत खो चुके हैं.
हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा कि उद्धव ठाकरे ने फ़्लोर टेस्ट के बिना ही इस्तीफ़ा दे दिया था, इसलिए उन्हें फिर से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता है.
कोर्ट की संवैधानिक बेंच में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा एमआर शाह, कृष्ण मुरारी, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा शामिल थे.
उद्धव ठाकरे ने इस फ़ैसले के बाद एकनाथ शिंदे के इस्तीफ़े की मांग की है तो एकनाथ शिंदे ने इसे 'सच की जीत' क़रार दिया है.
लेकिन सवाल ये है कि सही मायनों में ये किसकी जीत है और इसके बाद उद्धव ठाकरे के लिए क्या रास्ते रह जाते हैं?
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा
- कोर्ट ने अपने 141 पन्नों के आदेश में कहा कि पार्टी के भीतर बग़ावत या मतभेद की स्थिति में पार्टी के संविधान के तहत निपटारा किया जाना चाहिए.
- पार्टी प्रमुख के साथ विधायकों के मतभेद हो सकते हैं, लेकिन फ़्लोर टेस्ट का इस्तेमाल राजनीतिक दल के आपसी कलह को सुलझाने के लिए नहीं किया जा सकता.
- तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट का आदेश नियम के तहत नहीं दिया था.
- उद्धव ठाकरे ने फ़्लोर टेस्ट के बिना ही इस्तीफ़ा दे दिया था, इसलिए उन्हें फिर से मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता है.
- अगर उद्धव ने इस्तीफ़ा नहीं दिया होता तो उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने पर विचार किया जा सकता था.
- शिवसेना के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने की याचिका पर विधानसभा अध्यक्ष फ़ैसला लें. व्हिप जारी होने बावजूद ये विधायक पार्टी बैठक में शामिल नहीं हुए थे.
- जुलाई 2022 में नए चुने गए स्पीकर राहुल नार्वेकर ने शिंदे को विधायक दल के नेता और गोगावले को चीफ़ व्हिप के रूप में मान्यता दी, जो ग़लत था.
उद्धव ठाकरे और शिंदे गुट के लिए क्या हैं मायने?
महाराष्ट्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स कहते हैं कि राजनीति में जिसके हाथ में सत्ता है, फ़ैसला उसी के लिए अच्छा है.
वो समझाते हैं कि '16 विधायकों की सदस्यता को अयोग्य ठहराने का फ़ैसला कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के पाले में डाल दिया है जो सही है.'
'कोर्ट ने ये भी कहा कि व्हिप कौन होगा इसका फ़ैसला राजनीतिक पार्टी करेगी, न कि विधायक दल.'
'लेकिन जो कुछ हुआ उसमें शिवसेना के व्हिप को दरकिनार किया गया था, इसे लेकर कोर्ट ने कुछ नहीं कहा.'
वो कहते हैं, "इसमें उद्धव ठाकरे को मिला क्या? इस फ़ैसले का पूरा राजनीतिक फायदा सीधे-सीधे एकनाथ शिंदे को होने वाला है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व में महाराष्ट्र टाइम्स से जुड़े रहे विजय चोरमारे भी इस बात से इत्तेफाक़ रखते हैं कि कोर्ट का ये फ़ैसला सीधा-सीधा एकनाथ शिंदे के पक्ष में दिखता है.
वो कहते हैं, "उनकी सरकार के सिर पर तलवार लटक रही थी कि वो रहेगी या नहीं, लेकिन कोर्ट के फ़ैसले से साफ़ हो गया है कि महाराष्ट्र में अगले विधानसभा चुनावों तक उनकी सरकार रहने वाली है."
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उद्धव के लिए आगे की राह क्या?
उद्धव ठाकरे के लिए अब आगे की राह क्या होगी, इस बारे में विजय चोरमारे कहते हैं, "उद्धव ठाकरे के लिए अब अगले चुनाव में जनता के सामने जाने का रास्ता बचा है. वो पहले ही एकनाथ शिंदे पर आरोप लगा रहे थे, कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद वो अब अपना ज़ोर जनता के बीच जाने में लगाएंगे."
विजय चोरमारे मानते हैं कि इस पूरी घटना के बाद उद्धव ठाकरे के पक्ष में जनता की सहानुभूति भी देखी जा रही है.
वो कहते हैं, "वो लगातार लोगों से मुलाक़ातें कर रहे हैं. उनकी बैठकों में बड़ी संख्या में लोग जुटते दिख रहे हैं. लेकिन अगले चुनावों में ही से साफ़ होगा कि ये सिम्पैथी, वोटों में तब्दील होगी या नहीं."
वहीं समर खड़स कहते हैं कि 'मुझे लगता है कि इस फ़ैसले के बाद जनता के मन में उद्धव ठाकरे के प्रति सहानुभूति बढ़ेगी.'
वो कहते हैं कि ये सहानुभूति थोड़ी-बहुत दिखने लगी है. मुंबई में अंधेरी का उपचुनाव, पुणे का कस्बापेट उपचुनाव बीजेपी हार गई. साथ ही स्थानीय स्तर पर होने वाले कुछ चुनावों में ये सिम्पैथी वोटों में तब्दील होती दिखी है.
अंधेरी ईस्ट सीट पर नवंबर 2022 में हुए चुनाव में उद्धव ठाकरे गुट की ऋतुजा लातके को जीत मिली थी. वहीं बीजेपी का गढ़ माने जाने वाले कस्बापेट से कांग्रेस के रवींद्र धंगेकर ने बीजेपी के हेमंत रासने को हराया था.
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विजय चोरमोरे कहते हैं कि अगले साल चुनाव दोनों गुटों के बीच का तनाव और बीजेपी और महा विकास अघाड़ी के बीच की लड़ाई खुलकर सामने आ जाएगी.
वो कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस और एनसीपी की अच्छी पहुंच है, वहीं शहरी इलाक़ों में शिवसेना की पैठ अच्छी है. मुझे लगता है कि आगामी चुनावों में महा विकास अघाड़ी को ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में अच्छी बढ़त मिल सकती है."
वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया है वो केवल इंटरवल है, इसके बाद फ़िल्म के अगले हिस्से में 16 बाग़ी विधायकों को लेकर विधानसभा अध्यक्ष का फ़ैसला और उस पर उद्धव ठाकरे गुट की प्रतिक्रिया होगी. असली खेल अगले चुनावों में दिखेगा जिसे इस फ़िल्म का सीक्वल कहा जा सकता है, क्योंकि वहां बीजेपी बनाम महा विकास अघाड़ी के बीच की लड़ाई देखने को मिलने वाली है."
वहीं समर खड़स कहते हैं, "मैं ये कह सकता हूं कि आज चुनाव होंगे तो बीजेपी के लिए निश्चित तौर पर मुश्किल होगी. लेकिन 2024 में प्रदेश में होने वाले चुनावों के बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल होगा, तब तक तो काफ़ी पानी बह चुका होगा."

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उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे ने क्या कहा?
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद एकनाथ शिंदे को 'नैतिक आधार' पर इस्तीफ़ा दे देना चाहिए.
उन्होंने कहा, "सत्ता हासिल करने के लिए उन्होंने लोकतंत्र की हत्या की है, जिस तरह मैंने नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा दे दिया था, उसी तरह उन्हें भी नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."
"अगर मैंने साल 2022 में ख़ुद से इस्तीफ़ा न दिया होता तो आज मैं फिर से महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री होता. मेरी लड़ाई लोकतंत्र, अपने राज्य और देश को बचाने की थी, इसलिए मैंने इस्तीफ़ा दिया. अब शिंदे को भी यही करना चाहिए."
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प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इसे 'सच की जीत' बताया है. शिंदे ने कहा कि उन्हें इसकी उम्मीद थी क्योंकि शिवसेना के अधिकतर विधायक उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ चुके हैं.
उद्धव ठाकरे की बात का जवाब देते हुए एकनाथ शिंदे ने कहा कि उन्हें नैतिक आधार की बात नहीं करना चाहिए क्योंकि बीजेपी के साथ मिलकर उन्होंने चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत के बाद सीएम के पद के लिए उन्होंने कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया.
उन्होंने कहा, "ये फ़ैसला उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जिन्होंने मौजूदा बीजेपी-शिवसेना (शिंदे गुट) सरकार को ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक कहा था."
कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद शिंदे गुट के समर्थक मुंबई में कई जगहों पर जश्न मनाते दिखे.
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वहीं बीजेपी नेता और उप-मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कोर्ट के फ़ैसले को "लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जीत" बताया.
एक साझा प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि "महा विकास अघाड़ी की साज़िश की आज हार हुई है. अब विपक्ष को ये संदेह फैलाना बंद कर देना चाहिए कि असली शिवसेना कौन-सी है."
उन्होंने महा विकास अघाड़ी की सरकार फिर से बहाल करने से इनकार करने की कोर्ट की बात का समर्थन किया.
उन्होंने कहा कि कोर्ट ने ये स्पष्ट कर दिया है कि उद्धव ठाकरे ने फ़्लोर टेस्ट से पहले ही पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, उन्हें फिर से बहाल नहीं किया जा सकता.

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क्या था मामला?
पिछले साल शिवसेना में आपसी कलह के चलते पार्टी दोफाड़ हो गई.
महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे के विधायकों ने बग़ावत कर दी. वो पहले सूरत गए और फिर वहां से गुवाहाटी पहुंचे जहां उन्होंने अपील की कि उद्धव ठाकरे महा विकास अघाड़ी से अलग हों.
इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार के लिए संकट पैदा हो गया और ठाकरे ने शिंदे समेत 16 विधायकों को पार्टी बैठक में शामिल नहीं होने पर अयोग्य ठहराए जाने का नोटिस दिया. लेकिन इसके बावजूद विधायक बैठक में शामिल नहीं हुए.
24 जून को शिवसेना ने इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग विधानसभा के तत्कालीन उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल से की थी.
जिरवाल ने उन विधायकों को नोटिस भेजा, लेकिन फिर फ़्लोर टेस्ट होने से पहले ही उद्धव ठाकरे ने इस्तीफ़ा दे दिया.
इसके बाद शिंदे गुट ने बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाने का दावा पेश किया और अपने गुट के ही असली शिवसेना होने का दावा किया.
इसके लिए चुनाव आयोग में पार्टी चुनाव चिन्ह को लेकर लंबी लड़ाई चली.
बीते फ़रवरी में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के धड़े वाली शिवसेना को असली शिवसेना माना और पार्टी का नाम और चिह्न 'धनुष तीर' शिंदे गुट के पास रहने की इजाज़त दे दी.
चुनाव आयोग के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
साल 2022 में 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे 5 सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया.
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