राजस्थानः दलित लड़कियों का घोड़ी पर बैठना दलितों को ही गवारा नहीं

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- Author, मोहर सिंह मीणा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
राजस्थान में लड़कियां आमतौर पर अपनी शादी में घोड़ी पर बैठती हैं. उनके परिवार ऐसा करके 'बेटा-बेटी एक समान' का संदेश देना चाहते हैं. लेकिन बात जब दलित लड़कियों के घोड़ी पर बैठने की आती है, तो समाज के भीतर से ही विरोध के स्वर उठने लगते हैं.
बाड़मेर ज़िले के मेली गांव में कुछ ऐसा ही हुआ. दो दलित बहनों को घोड़ी पर बैठा कर बिंदोली निकाली गई, लेकिन हाथों की मेहंदी का रंग जैसे ही हल्का पड़ा, वैसे ही घोड़ी पर बैठने का विवाद बढ़ने लगा. बिंदोली नाम की रस्म शादी के एक दिन पहले निभाई जाती है. इसमें लड़कियां अपनी कुलदेवी के पूजन के लिए जाती हैं.
दलित चिंतक भंवर मेघवंशी कहते हैं, "दलित महिलाएं दोहरे शोषण से गुज़रती हैं. बाहर जाति की वजह से सताई जाती हैं और ख़ुद के ही समाज में पितृ-सत्तात्मक सोच से सताई जाती हैं."
बाड़मेर में सिवाना-कल्याणपुर सड़क पर बसा है मेली गांव. क़रीब 4,000 आबादी वाले गांव में लगभग 300 परिवार दलित मेघवाल समाज के हैं. इस गांव में पहली बार शादी से पहले लड़कियों को घोड़ी पर बिठाया गया है.
यह शुरुआत एक दलित परिवार ने की है. गांव के सभी समाज ने इस पहल को सराहा है.

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घोड़ी पर बैठने की सज़ा- समाज से बहिष्कार
शंकर राम मेघवाल बीबीसी से बातचीत करते हुए कहते हैं, "इन बहनों की शादी के क़रीब दो महीने बाद मेघवाल समाज के 12 गांवों के पंचों की पंचायत हुई. वहां मुझे बुलाया गया और बहनों को घोड़ी पर बिठाने के लिए 50,000 रुपए जुर्माना लगाया. पैसा न देने पर समाज से उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया."
मुख्य सड़क से क़रीब 500 मीटर दूर गांव के भीतर शंकर राम मेघवाल का घर है. फ़िलहाल यहां गर्मी से ज़्यादा गर्माहट पंचायत के इस फ़ैसले की है. इसके कारण यहाँ खामोशी पसरी है.
शंकर लाल मेघवाल के घर में कई जगह डॉ भीमराव आंबेडकर की तस्वीर लगी हुई है. इस घर में पहले शादी की ख़ुशियां थीं, पर अब परिवार के लोग चिंतित हैं.
शंकर का उदास चेहरा उनकी चिंता की कहानी बयान कर रहा है. वो कहते हैं, "पंचायत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सिवाना थाने में शिकायत कर दी है, एसडीएम ऑफिस भी गया था."

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सिवाना थाना प्रभारी नाथू सिंह चारण बीबीसी से कहते हैं, "मेली गांव के शंकर राम ने लिखित शिकायत दी है. लेकिन, उन्होंने कोई वीडियो, ऑडियो, तस्वीरें या लिखित सबूत पेश नहीं किए. हमने परिवादी के बयान लिए हैं, जांच कर रहे हैं."
वहीं सिवाना एसडीएम दिनेश बिश्नोई बीबीसी से कहते हैं, "इस मामले में पुलिस जांच कर रही है." लेकिन, मेघवाल समाज के पंच और स्थानीय लोग इस बारे में बात करने से बच रहे हैं.
मेघवाल ने अपनी लिखित शिकायत में लिखा है, "बहनों को घोड़ी पर बिठाया, इसलिए मेरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया और 50,000 रुपए का जुर्माना लगाया है. इस दौरान पंचों ने समाज को धमकी दी कि जो भी हमारे परिवार से बोल-चाल करेगा या आना-जाना रखेगा उसे भी दंडित किया जाएगा."

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पंचायत ने क्यों दी सज़ा?
बीबीसी ने पंचायत से जुड़े लोगों से बात करने का प्रयास किया. पंचायत में मौजूद पोकर मेघवाल ने बीबीसी से कहा, "पंचायत में पंचों ने जुर्माना लगाया था. वह पंचों का फ़ैसला था. लेकिन, शंकर ने जुर्माना भरने से इंकार कर दिया है."
शंकर लाल मेघवाल ने पुलिस को दी शिकायत में पंच मोहन लाल और पंच भंजाराम का नाम भी लिखा है.
बीबीसी ने पंच मोहन लाल से जुर्माने को लेकर सवाल किया और पुलिस में उनके ख़िलाफ़ की गई शिकायत पर भी पूछा. इसके जवाब में मोहन लाल कहते हैं, "पंचायत में जुर्माना नहीं लगाया गया. हमारा तो आपस में कोई झगड़ा भी नहीं है. फिर पुलिस में शिकायत क्यों दी, मालूम नहीं."
वहीं बातचीत के लिए पंच भंजाराम से संपर्क नहीं हो सका. हालांकि, उनके भतीजे रमेश मेघवाल ने कहा कि वो इस मामले पर बुज़ुर्गों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं. रमेश मेघवाल दो साल सिवाना से भीम आर्मी के ब्लॉक अध्यक्ष रहे हैं और अभी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "मैं पंचायत में नहीं था, लेकिन पंचायत में जो हुआ, उसकी जानकारी मिली है. मैं जोधपुर में हूं और फ़ोन से लोगों को समझाने का प्रयास कर रहा हूं. हम बुज़ुर्गों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं. जुर्माना लगाना और समाज से बहिष्कृत करने का फ़ैसला ग़लत है."

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पहली बार कोई लड़की घोड़ी पर बैठी
शादी से लेकर पंचायत और फिर पुलिस शिकायत में दो महीने गुज़र गए. दीपू और लक्ष्मी की शादी इस साल 6 फरवरी को हुई थी.
मांग में सिंदूर. नीले रंग की बिंदी. हाथ में चूड़ियां. गले में मंगलसूत्र और गुलाबी रंग के पारंपरिक कपड़े पहनी दीपू. दीपू और उनकी बड़ी बहन लक्ष्मी को घोड़ी पर बिठा कर बिंदोली निकाली गई थी. दीपू की ससुराल जोधपुर और लक्ष्मी की ससुराल पाली ज़िले में है.
जोधपुर में हमसे बातचीत करते हुए दीपू कहती हैं, "हमें बहुत ख़ुशी हुई घोड़ी पर बैठ कर. गांव में पहली बार लड़कियों की घोड़ी पर बिंदोली निकाली गई."
यह कहते हुए उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट थी. लेकिन, अचानक से उनके चेहरे के हाव-भाव बदले. इधर-उधर देखते और परेशान होते हुए वो कहती हैं, "बड़ी बहन लक्ष्मी से फ़ोन पर बात हुई. वह भी बहुत उदास है, दुखी है. हमने कोई गुनाह तो किया नहीं फिर भी जुर्माना लगा दिया."
फिर मुस्कुराकर वो कहती हैं, "उस दौरान सब साथ थे. सब ख़ुश थे और गांव वालों को बहुत अच्छा लगा था. लेकिन, दो महीने बाद न जाने उन्हें क्या हो गया."
दीपू घोड़ी पर बैठने के फ़ैसले को सही मानते हुए आत्मविश्वास के साथ कहती हैं, "ससुराल वाले कहते हैं कि ये अच्छी पहल थी और हम साथ हैं. बदलाव ज़रूरी है, पिछड़ी सोच के साथ कब तक रहेंगे."
दीपू के पति डॉ यशपाल दांतों के डॉक्टर हैं. जोधपुर में अपना क्लीनिक चलाते हैं और एक राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हुए हैं. वो इस फ़ैसले से परेशान होकर कहते हैं, "समाज को अच्छे के लिए संदेश दिया या बुरे के लिए, अब यही समझ नहीं आ रहा है."

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फ़ैसले से परिवार परेशान
दीपू को मिलाकर परिवार में आठ बहनें, एक भाई शंकर राम मेघवाल और बुज़ुर्ग मां हैं. पिता की साल 2010 में मृत्यु हो गई. पिता की जगह शंकर राम को राजस्थान शिक्षा विभाग में अनुकंपा पर नौकरी मिली है. 32 साल के शंकर राम मेघवाल ने पंचायत के फ़ैसले को चुनौती ज़रूर दी है. लेकिन, इस फ़ैसले के बाद से वो परेशान हैं.
वो कहते हैं, "मेरी बहनें ही मेरे भाई हैं. उनको पिता की कमी महसूस नहीं होने देना चाहता."
दीपू की भाभी रेखा मेघवाल कहती हैं, "अब समाज के काम या शादी में हमें बुलावा नहीं आ रहा है. यह सब ग़लत है."
वह इस पीड़ा को महसूस करते हुए कहती हैं, "आज कितनी आज़ादी है. लेकिन, हमारे साथ जो हो रहा है उससे लगता है कि महिलाओं को कोई आज़ादी नहीं है. वे दोनों बहनें बहुत ख़ुश थीं घोड़ी पर बैठ कर. समाज अगर पहले कहता, तो हम घोड़ी पर नहीं बैठते. भाई ने कह दिया है कि घोड़ी पर बिठाने के कारण मैं जुर्माना नहीं भरूंगा."

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क्या है बिंदोली प्रथा?
राजस्थान हाइकोर्ट में एडवोकेट और बिंदोली के रिवाज के जानकार सतीश कुमार कहते हैं कि अन्य राज्यों के मुक़ाबले राजस्थान में बिंदोली प्रथा ज़्यादा है.
वो कहते हैं, "घोड़ा हमेशा से आन-बान-शान, गौरव, शौर्य और सामंतवाद का प्रतीक है. दुल्हा पहले बग्गी पर जाता था. हाथी, घोड़े की सवारी स्टेटस को भी दिखाता है. बग्गियां ख़त्म हो गईं, क्योंकि उनकी साज सजावट और मेंटेनेंस मुश्किल था. तो फिर हम घोड़ी पर आ गए."
उनके अनुसार, "घोड़ी पर आने के बाद, पिछले क़रीब तीन दशक से दलितों में भी बिंदोली की शुरुआत देखने को मिलती है. फिर दलितों ने बिंदोली निकालनी शुरू की, तो विरोध भी हुआ."
दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के असिसटेंट प्रोफ़ेसर जितेंद्र मीणा कहते हैं, "कई जगह बिंदोली पैदल निकाली जाती है और घोड़ी, गाड़ी या ऊँट पर भी. शादी के एक दिन पहले कुलदेवी या कुलदेवता को पूजने जाते हैं. महिलाएं गीत गाते हुए चलती हैं. लड़कियों ने भी घोड़ी पर बैठ कर बिंदोली निकालना शुरू किया. यह स्वाभिमान और गरिमा का प्रतीक है."

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दलित महिलाओं का घोड़ी पर बैठना अहम
दलित चिंतक भंवर मेघवंशी बताते हैं, "यह स्वीकार्यता ज़रूरी है- आत्ममुक्ति के लिए. लड़कियों का घोड़ी पर बैठना बड़ा और बेहद सकारात्मक बदलाव है. लेकिन, समाज में महिला की ही स्वीकार्यता नहीं है. वो घोड़े पर बैठने लग जाए, तो लगता है कि अब पुरुषों का क्या ही बच गया!"
डॉ जितेंद्र मीणा कहते हैं, "पहले लड़कों की ही शादी में उन्हें घोड़े पर बैठाया जाता था. लेकिन, बीते कई सालों से लड़कियों की बिंदोली भी निकलने लगी हैं. पितृसत्तात्मक सोच नहीं चाहती कि महिलाएं आगे आएं और बराबर खड़ी हों. दलित समाज की लड़कियों का घोड़ी पर बैठना अच्छा संदेश है."
एडवोकेट सतीश कुमार बताते हैं, "सार्वजनिक जगहों पर दलितों की बिंदोली को रोका गया. शव तक नहीं जाने दिए. हमने 2015 में एक जनहित याचिका भी दायर की. उसके बाद सरकार को नोटिस जारी हुआ और इस मामले को गंभीर बताते हुए निर्देश दिए गए."
वो आगे कहते हैं, "एक दलित महिला का बिंदोली निकालने का संदेश दूर तक जाता है. ये बात स्वाभिमान से जुड़ी और पितृ-सत्तात्मकता को धत्ता बताते हुए महिलाओं के आगे आने की है."
राजस्थान से हुई इस शुरुआत का प्रभाव पड़ोसी सूबों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी देखने में आ रहा है.

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क्या है जाति पंचायत?
सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "हरियाणा में जो खाप पंचायतें हैं, राजस्थान में उन्हें हम जाति पंचायतें कहते हैं. जब भी शीर्ष पर बैठे लोगों को किसी क़िस्म की चुनौती मिलती हुई दिखती है, वो इन पंचायतों के ज़रिए फ़रमान सुनाते हैं. यह बिलकुल असंवैधानिक हैं."
वो कहती हैं, "जो लोग क़ानून हाथ में लेकर इस तरह के फ़रमान सुनाते हैं, उन लोगों पर मुक़दमा दर्ज कर कार्रवाई करनी चाहिए. राजनीतिक पार्टी इन्हें रोकती नहीं हैं, क्योंकि ये उनकी वोट बैंक पॉलिटिक्स का हिस्सा हैं."
मेली का मामला पुलिस-प्रशासन तक पहुंचने के बाद दलित मेघवाल समाज की पंचायत बैकफुट पर आ गई है.
शंकर राम मेघवाल कहते हैं, "पंचायत ने मुझे फिर बुलाया है और समझौता करने के लिए कह रहे हैं. लेकिन, मेरी मांग है कि वह स्टाम्प पेपर पर लिखकर अपनी ग़लती स्वीकर करें."
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