भीमा कोरेगांव- पांच साल बाद क्या है केस और इससे जुड़े लोगों के हालात?

- Author, मयूरेश कोन्नूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई
जैसे नए साल 2023 की ये पहली जनवरी है. वैसे ही पांच साल पहले भी कैलेंडर में एक तारीख़ और साल बदला था. 1 जनवरी 2018. लेकिन उस दिन भीमा कोरेगांव में कुछ ऐसा हुआ, कि तारीख को छोड़कर सबकुछ बदल गया. हमेशा के लिए.
5 साल पहले पुणे के पास भीमा कोरेगांव में जैसी हिंसा भड़की, वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ. दो शताब्दी पहले 1818 में एक लड़ाई ज़रूर लड़ी गई थी, मगर वो आत्मसम्मान और आज़ादी की लड़ाई थी. उसी लड़ाई की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए हज़ारों दलित जमा हुए थे. लेकिन उस सभा में जो हिंसा भड़की, उसकी आंच पूरे देश में महसूस की गई.
घटना को लेकर पूरे देश में गर्मागर्म बहस चल पड़ी. एल्गार परिषद केस में पुलिस की इन्क्वायरी और जांच 2018 से ही जारी है. जैसे जैसे जांच बढ़ी, इसके तहत कई वामपंथी और इस विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले कई लेखक, पत्रकार, शिक्षक और दूसरे पेशों के लोग पूरे देश से गिरफ्तार किए गए.
पुणे पुलिस ने ये दावा किया कि 'भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़की, उसके लिए एल्गार परिषद ज़िम्मेदार है. इसी संगठन ने हिंसा से एक दिन पहले पुणे के शनिवारवाड़ा में एक बैठक बुलाई थी. बैठक के अगले दिन जो हिंसा हुई उससे तार इस बैठक से जुड़ते हैं. इसके पीछे बड़ी नक्सल साज़िश थी.'

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हिंसा के मामले में जो आरोपी बनाए गए, उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया. UAPA जैसे सख़्त क़ानून के तहत आरोप तय किए गए. दो साल बाद जनवरी 2020 में पूरे मामले की जांच NIA को सौंप दी गई.
उस घटना के पांच साल बाद आज भी कई आरोपी जेल में बंद हैं. कुछ लोगों को लंबे कानूनी संघर्ष के बाद बेल मिल गई. लेकिन एक आरोपी आज भी नज़रबंद हैं, जबकि दूसरे की मौत हो गई. इस पूरे मामले में 16 लोगों को हिरासत में लिया गया था.
वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, सुधीर धवले, रोना विल्सन, शोमा सेन, महेश राउत, कवि वरवर राव, समाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, अरुण फेरेरा, वेर्नॉन गोनजालविस और पत्रकार गौतम नवलखा जैसे लोग घटना के साल जून से अगस्त के बीच गिरफ्तार किए गए थे.
इसके कुछ दिनों बाद पुलिस ने लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े, फादर स्टैन स्वामी, हैनी बाबू, सागर गोरखे, रमेश गैचोर और ज्योति जगताप को गिरफ्तार किया. लेकिन जिस तरह इनकी गिरफ्तारी सुर्खियों में रही, उतनी ही चर्चा इनकी तरफ से दायर की गई ज़मानत याचिकाओं की भी हुई.
मीडिया रिपोर्ट्स में ज़मानत को लेकर इनकी तरफ से दी गई वजहें लगातार चर्चा में रही, जैसे जेल में रहते हुए इनकी गिरती सेहत, जेल में हो रही असुविधा और सबसे दिलचस्प इनके खिलाफ लगाए के पुलिस के आरोपों पर बेहद बुनियादी सवाल.
इस रिपोर्ट में हम केस के पांच साल में अहम पड़ावों की चर्चा करेंगे. इसकी शुरुआत करते हैं 2022 में दिए गए कोर्ट के अहम फ़ैसलों से.

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आनंद तेलतुंबड़े को मिली ज़मानत
लेखक-प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े को ज़मानत उनकी गिरफ़्तारी के 2 साल बाद मिली. बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी ज़मानत 18 नवंबर को मंज़ूर की.
जांच एजेंसी NIA ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इसकी सुनवाई करते हुए चीफ़ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा. 18 नवंबर को ही NIA ने बॉम्बे हाई कोर्ट से प्रोफेसर आनंद की ज़मानत को स्थगित रखने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने मंज़ूर कर लिया था.
प्रो. आनंद को NIA ने 14 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया था. आरोप था भीमा कोरेगांव हिंसा में एल्गार परिषद की साज़िश में शामिल होने का. गिरफ्तारी के बाद उन्हें तलोजा जेल में बंद किया गया था. लेकिन 2 साल बाद एक लाख रुपये के बॉन्ड पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया.
प्रो. आनंद दलितों के मुद्दों पर बोलने वाले एक मशहूर शख्सियत हैं. बतौर इंजीनियर कुछ साल की नौकरी के बाद प्रो. आनंद ने अहमदाबाद के IIM में भी पढ़ाई की.
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पुलिस ने दावा किया था कि प्रो. आनंद ने अप्रैल 2018 में पेरिस के एक कॉन्फ्रेंस में जो इंटरव्यू दिया था, उसकी फंडिंग माओवादी संगठनों ने की थी. प्रो. आनंद ने इन आरोपों को खंडन किया था और गिरफ्तारी के बाद ही बॉम्बे हाई कोर्ट में इसके खिलाफ़ अपील की थी.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर NIA प्रो. आनंद के खिलाफ़ सिर्फ धारा-39 (उग्रवादी संगठनों से संबंध) के तहत आरोप लगा सकती है. इसके तहत आरोपी को 10 साल तक की जेल हो सकती है. प्रो. आनंद चुंकि 2 साल जेल में बिता चुके हैं, इसलिए उन्हें मामले में ज़मानत दी जा सकती है.
घर में नज़रबंद किए गए गौतम नवलखा
प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े की तरह दिल्ली के रहने वाले लेखक, पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट गौतम नवलखा भी ज़मानत के लिए कई याचिकाएं दे चुके हैं. हालांकि उनकी ज़मानत याचिकाएं खारिज होती रहीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2022 में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा- गौतम नवलखा को उनके घर में नज़रबंद रखा जाए
सुप्रीम कोर्ट ने घर में नज़रबंद रखने का फैसला 73 साल के गौतम नवलखा की बिगड़ती सेहत के मद्देनज़र किया था. लेकिन NIA ने इस फैसले का विरोध किया. लेकिन आगे की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को बरकरार रखा. आज गौतम नवलखा मुंबई के अपने घर में नज़रबंद हैं.
गौतम नवलखा ने 20 अप्रैल 2020 को सरेंडर किया था. इसके बाद एनआईए ने उन्हें गिरफ्तार किया और उन्हें न्यायिक हिरासत में तलोजा जेल भेज दिया गया.

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फादर स्टैन स्वामी की मौत
फादर स्टैन स्वामी रांची के एक पादरी थे. NIA ने उन्हें भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद केस में माओवादी संगठनों से संबंध रखने के आरोप में रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत गिरफ्तार किया था.
83 साल के स्टैन स्वामी को भी स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं थीं. जेल में रहते हुए उन्होंने कई बार बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं कराए जाने को लेकर शिकायत की.
एक याचिका में उन्होंने कहा था- उन्हें पानी पीने के लिए स्ट्रॉ तक नहीं दिया जाता. उनकी सेहत को देखते हुए कोर्ट ने मई 2021 में मुंबई के होली फैमिली हॉस्पिटल में उन्हें भर्ती करने का आदेश दिया. लेकिन यहां उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और 5 जुलाई 2021 को होली फैमिली हॉस्पिटल में ही उनका निधन हो गया.
स्टैन स्वामी ने लिखित रूप से उन आदिवासियों का समर्थन किया था, जिन्होंने अपने अधिकारों को लेकर 2018 में सरकार के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ा था.
उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उन 3000 आदिवासी पुरुषों-स्त्रियों को रिहा करने की अपील की थी, जिन्हें माओवादी करार देकर जेल में बंद किया गया था.
आदिवासियों की ज़मीन हड़पे जाने के मामले पर वो लगातार लिख रहे थे. अपने लेखों के ज़रिए वो बता रहे थे कि मल्टीनेशनल कंपनियां किस तरह सुनियोजित साज़िश के तहत अलग अलग प्रोजेक्ट्स के नाम पर आदिवासियों की ज़मीनें हथिया रही हैं.
सुधा भारद्वाज को ज़मानत
सुधा भारद्वाज उन गिने चुने आरोपियों में शामिल हैं जिन्हें इस केस में ज़मानत मिली हैं. सुधा भारद्वाज को ज़मानत बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिसंबर 2021 में दी थी.
NIA ने सुधा भारद्वाज की ज़मानत याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत पर बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखा. हालांकि कोर्ट ने ये ज़रूर कहा कि ज़मानत की अवधि के दौरान सुधा भारद्वाज मुंबई से बाहर नहीं जाएंगी.
सुधा भारद्वाज एक वकील और ट्रेड यूनियन लीडर हैं. इस रूप में वो बतौर मानवाधिकार कार्यकर्ता पिछले 30 साल से काम कर रही हैं. वो देश के दूर दराज़ के हिस्सों में आदिवासियों, शोषित जनजातियों और घुमंतु समुदायों के मुद्दों से जुड़ी रही हैं. सुधा भारद्वाज अमेरिका में जन्मी हैं. लेकिन भारत लौटने के बाद उन्होंने अमेरिकी पासपोर्ट त्याग दिया. तभी से वो गरीब और कमज़ोर तबकों के लिए काम कर रही हैं.
2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के दौरान पुलिस ने सुधा भारद्वाज को भी आरोपी बनाया. पुलिस ने उन पर माओवादी संगठनों से संबंध के साथ भीमा कोरेगांव हिंसा की साज़िश में शामिल होने का आरोप लगाया. इसके फौरन बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. सुधा को यरवदा जेल और उसके बाद तलोजा जेल में रखा गया.

लोक कवि वरवर राव को नियमित ज़मानत
भीमा कोरेगांव हिंसा केस में पुणे पुलिस ने हैदराबाद के कवि और लेखकर वरवर राव को भी गिरफ्तार किया था. दो साल जेल में रहने के बाद बिगड़ती सेहत की वजह से कोर्ट ने उन्हें नानावटी हॉस्पिटल में शिफ्ट करने का आदेश दिया.
वरवर राव का इलाज जारी रहे, इसके लिए कोर्ट उन्हें हॉस्पिटल में रखने की अवधि बार-बार बढ़ाती रही. इसी दौरान उनके इलाज के लिए नियमित ज़मानत की याचिका लगाई गई. आखिकार सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2022 में उनकी उम्र, लगातार गिरती सेहत को देखते हुए मेडिकल ग्राउंड पर स्थाई ज़मानत दे दी.
वरवर राव 'रिवोल्यूशनरी राइटर्स एसोशिएशन' से जुड़े हैं, जिसका जुड़ाव वाम आंदोलन से रहा है. उन्हें हैदराबाद से गिरफ्तार कर पुणे लाया गया था. इससे पहले भी उन्हें माओवादी संगठनों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है. वामपंथी आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि वरवर राव की गिरफ्तारी इसलिए की गई, ताकि ऐसे आधार पर देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा सके.

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भीमा कोरेगांव में आखिर हुआ क्या था?
भीमा कोरेगांव पुणे के पास स्थित है, जहां 1 जनवरी 2018 को हिंसा भड़की थी. यहां मराठा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध की 200वीं वर्षगांठ मनाने के लिए एक सामारोह आयोजित किया गया था. भीमा कोरेगांव इस युद्ध से जुड़ा एक विजय स्तंभ है, जहां हज़ारों की तादाद में लोग जमा हुए थे. लेकिन देखते ही देखते समारोह में पत्थरबाज़ी शुरू हो गई. कुछ गाड़ियों में आग लगा दी गई. इस दौरान एक शख्स की जान भी चली गई.
इस घटना से एक दिन पहले, यानी 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद ने पुणे के ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा में एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी. इसमें प्रकाश अंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद, सोनी सोरी और बी.जी खोसले पाटिल के साथ तमाम दूसरे एक्टिविस्ट शामिल हुए थे.
भीमा कोरेगांव में हिंसा के बाद पुणे पुलिस ने दो अलग-अलग मामले दर्ज किए थे. एक एफआईआर में शाम्भाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे जैसे हिंदूवादी नेताओं को नामजद बनाया था. ये मामला 2 जनवरी को पिंपरी पुलिस थाने में दर्ज कराया गया था.
इसके बाद 8 जनवरी को पुणे पुलिस ने तुषार दमगुड़े नाम के एक शख्स की शिकायत पर एल्गार परिषद से जुड़े लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया. इस एफआईआर में ये दावा किया गया कि भीमा कोरेगांव में हिंसा एल्गार परिषद के लोगों के भड़काऊ भाषण की वजह से भड़की. इसी के आधार पर पुलिस ने तमाम कवियों, लेखकों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया.
गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट भी दाखिल की. 17 मई को पुणे पुलिस ने चार्जशीट में UAPA एक्ट के तहत सेक्शन-13, 16, 18, 18-बी, 20, 39 और 40 के तहत नए आरोप जोड़े.
इस मामले में NIA ने भी 24 जनवरी 2020 को एक एफआईआर दर्ज की. इसमें आईपीसी के सेक्शन 153-A, 505 (1)B, 117 और 34 के साथ UAPA के सेक्शन 13, 16, 18, 18B, 20 और 39 के तहत आरोप जोड़े गए.
पुणे पुलिस की जांच पूरी होने के बाद केन्द्र सरकार ने मामले को NIA को सौंप दिया. NIA ने इस मामले में 10 हज़ार पेज की चार्जशीट स्पेशल कोर्ट में दाखिल की.

NIA की चार्जशीट में क्या था?
जांच एजेंसी की चार्जशीट के मुताबिक 'गौतम नवलखा कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में थे.' इस मामले में जेएनयू के प्रोफेसर हनी बाबू को भी गिरफ्तार किया गया था. चार्जशीट में NIA ने दावा किया था कि हनी बाबू माओवादी विचारधारा के साथ छात्रों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे.
चार्जशीट में ये भी लिखा गया कि गोर्खे, गैचोर और जगताप सीपीआई (M) के प्रशिक्षित कार्यकर्ता हैं और कबीर कला मंच के सदस्य हैं. इसमें इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि तेलतुम्बड़े भीमा कोरेगांव में शौर्य दिन प्रेरणा अभियान के आयोजकों में से एक थे और 31 दिसंबर को पुणे के शनिवारवाड़ा की कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे.
एनआईए के मुताबिक गिरफ्तार किए गए सभी लोग उस साज़िश का हिस्सा थे, जिसकी वजह से भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़की.
शरद पवार की गवाही और भीमा कोरेगांव न्यायिक आयोग
पुलिस की जांच के साथ तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच के लिए दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का भी गठन किया था. जस्टिस जे. एन पटेल की अध्यक्षता में आयोग ने पुणे और मुंबई में मामले की जांच की. आयोग की जांच अभी तक जारी है.
आयोग के सामने घटना से जुड़े कई लोग, संगठन और कई अधिकारी अपना बयान दर्ज करा चुके हैं. एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ऐसे ही लोगों में से एक हैं.
शरद पवार ने भीमा कोरेगांव हिंसा के बारे में बात करते हुए इसमें कुछ हिंदूवादी नेताओं के शामिल होने के आरोप लगाए. पवार के ऐसे बयानों का संज्ञान लेते हुए जांच आयोग ने उन्हें गवाही के लिए बुलाया. पवार ने मई 2022 में आयोग के सामने पेश होकर अपनी गवाही दर्ज कराई.
हिंदुत्व कार्यकर्ताओं की कितनी भूमिका?
एक तरफ पुणे पुलिस ने अपनी जांच में वामपंथी रुझान वाले कार्यकर्ताओं को हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया, तो पुणे की ग्रामीण पुलिस ने हिंसा का मास्टरमांड हिंदुत्व कार्यकर्ताओं को बताया. इस मामले में संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे के खिलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई और उन्हें पुलिस ने दो-दो बार हिरासत में लिया.
पुणे सेशंस कोर्ट ने मिलिंग एकबोटे को 19 अप्रैल को ज़मानत दे दी, जबकि दूसरे आरोपी संभाजी भिड़े को पुलिस ने कभी गिरफ्तार नहीं किया, जबकि उनके खिलाफ भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में लोगों को उकसाने और हिंसा भड़काने के आरोप दर्ज हैं.
इस बात को लेकर आज भी सवाल उठते हैं कि 1 जनवरी 2018 की हिंसा के मामले में संगीन आरोपों के बावजूद दक्षिण पंथी कार्यकर्ताओं को क्लीन चिट दे दी गई, जबकि वामपंथी रुझान वाले लोगों को गलत तरीके से फंसाया गया और उनके खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की गई.
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