विशाखापट्टनम या अमरावती: आंध्र प्रदेश की नई राजधानी को लेकर क्यों जारी है विवाद?

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    • Author, जी. रोहित
    • पदनाम, बीबीसी तेलुगू

इसी 31 जनवरी की बात है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी दिल्ली में थे. वहां उन्होंने ऐलान किया कि आंध्र प्रदेश की राजधानी विशाखापट्टनम होगी.

जगनमोहन दिल्ली में 'इंटरनेशनल डिप्लोमैटिक आलाएंस मीट' में निवेशकों को संबोधित कर रहे थे. इस मीटिंग में उन्होंने तमाम निवेशकों को 'विशाखापट्टनम ग्लोबल इन्वेस्टर समिट' में निमंत्रित भी किया. आंध्र प्रदेश सरकार की तरफ से ये समिट 3-4 मार्च को विशाखापट्टनम में आयोजित किया जाने वाला है.

मुख्यमंत्री ने आंध्र प्रदेश की राजधानी का ऐलान तो कर दिया, लेकिन ये ऐसा मसला रहा है, जिसे लेकर राज्य में लंबे समय से विवाद चलता आ रहा है. आखिर नई राजधानी को लेकर ऐसा क्या है, जिस पर सहमति नहीं बन पा रही?

2014 में आंध्र प्रदेश का बंटवारा दो हिस्सों में हुआ था. इससे बना दूसरा राज्य था तेलंगाना. 2014 के आंध्र प्रदेश पुनर्गनठन एक्ट के मुताबिक़ हैदराबाद ही इन दोनों राज्यों की राजधानी बनी रही. लेकिन एक्ट के मुताबिक़ हैदराबाद अधिकतम 10 साल तक ही आंध्र प्रदेश की राजधानी रहेगा. इसके बाद आंध्र को अपनी नई राजधानी बनानी पड़ेगी.

आंध्र के बंटवारे के साल यानी 2014 के विधानसभा चुनाव में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी विजयी हुई. उसे 175 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटों पर जीत मिली थी. जगनमोहन की पार्टी वाई.एस.आर कांग्रेस पार्टी 67 सीटों पर जीत के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी बनी थी.

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इमेज कैप्शन, आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (बाएं) और मौजूदा सीएम जगनमोहन रेड्डी

सरकार में आने के बाद सितंबर 2014 में टीडीपी ने राजधानी के लोकेशन के लिए अमरावती को चुना. सरकार ने इसके लिए एक कमेटी बनाई थी, जिसके मुखिया थे आंध्र के तत्कालीन नगर विकास मंत्री पी. नारायणा. इसी कमेटी ने अमरावती को आंध्र प्रदेश को राजधानी बनाने की सिफारिश की थी.

अमरावती को राजधानी बनाने पर मुहर के बाद सरकार ने तुरंत किसानों से ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरू कर दिया. इस दौरान 29 गांवों की 54 हज़ार एकड़ ज़मीन में से 38,851 एकड़ ज़मीन अधिग्रिहित करने का प्रस्ताव रखा गया.

किसानों की ज़मीन अधिग्रहण के लिए सरकार ने 1 जनवरी 2015 को एक नई योजना शुरू की- लैंड पूलिंग स्कीम (LPS). इसके तहत पहले दो महीने में ही सरकार ने किसानों की 30 हज़ार एकड़ से ज़्यादा ज़मीन हासिल कर ली.

आख़िरकार सरकार ने 38,851 एकड़ जमीन के लक्ष्य में से 32,637.48 एकड़ ज़मीन किसानों से अधिग्रिहित कर ली. तब आंध्र प्रदेश की सरकार हैदराबाद से ही चल रही थी. शासन, प्रशासन और न्यायालय तक अमरावती में आना बाकी था.

ऐसा नहीं था कि राजधानी बनाने के लिए किसानों से ज़मीन लेने की योजना का विरोध नहीं हुआ था. जिन 29 गांवों की ज़मीन पर राजधानी बनाई जानी थी, इनमें से तीन गावों के किसान सरकार की स्कीम से अलग रहे. इसके पीछे कई वजहें थी. एक वजह जो सबसे बड़ी थी वो थी जाति.

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क्या है जातिगत विवाद

आंध्र की मुख्य विपक्षी और जगनमोहन की पार्टी वाई.एस.आर कांग्रेस पार्टी के एक धड़े ने ये आरोप लगाया कि अमरावती को आंध्र प्रदेश की राजधानी 'काम्मा जाति' के लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया जा रहा है. तब के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इसी काम्मा जाति से ताल्लुक रखते हैं.

विजयवाड़ा को हमेशा से ही काम्मा जाति का गढ़ माना जाता रहा है. इसके साथ गुंटूर ज़िले का वो हिस्सा, जिसमें अमरावती स्थित है, उसे भी काम्मा के प्रभुत्व वाला इलाका माना जाता है.

हालांकि अमरावती के आंकड़ों के लिहाज़ से यहां आबादी और ज़मीनों पर मालिकाना हक, जाति के लिहाज़ से काफी विविधता से भरा है. यानी आबादी और ज़मीन में हिस्सेदारी के आधार पर इसे किसी जाति बहुल का इलाका नहीं कहा जा सकता. लेकिन विपक्षी दल का उठाया हुआ 'जाति आधारित विवाद' लंबे समय तक बना रहा.

जिन तीन गांवों ने सरकार को ज़मीन देने से मना किया, उन गांव में रेड्डी जाति के लोग बहुसंख्यक हैं. ये लोग जगनमोहन की पार्टी के कोर वोटर्स माने जाते हैं.

अमरावती को राजधानी बनाने का विरोध तमाम पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी किया. इनकी दलील थी इतने बड़े कृषि उत्पादन क्षेत्र को कंक्रीट का जंगल बनाना ठीक नहीं है. इन्होंने सरकार के फैसले को 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल' (NGT) में चुनौती तक दी थी. हालांकि ट्रिब्यूनल ने जनवरी 2019 में आंध्र सरकार के फ़ैसले को बरकरार रखा.

हालांकि जाति के नाम पर विरोध के बीच खुद जगनमोहन ने राजधानी के रूप में अमरावती का समर्थन किया था.

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अमरावती के नाम का ऐलान किए जाने के बाद जगनमोहन ने विधान सभा में अमरावती को 'दिल से समर्थन' देने की बात कही थी. जगन ने कहा कि 'वो नहीं चाहते कि राज्य के अलग-अलग इलाकों के बीच खाई बढ़े.'

इस तरह अमरावती के नाम पर सरकार और विपक्ष के साथ आ जाने के बाद किसानों से ज़मीन लेने का काम और सहजता से हुआ. लेकिन राज्य में सत्ताधारी पार्टी बदलते ही पूरे मामले ने उल्टा मोड़ ले लिया.

राजधानी को लेकर जिन किसानों ने चंद्रबाबू नायडू और जगनमोहन के बीच 'राजनीतिक समझौते' पर भरोसा किया था, उन्हें जगनमोहन के स्टैंड बदलते ही झटका लगा. ये लोग अब जगनमोहन की सरकार पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं.

जानकार भी मानते हैं किसानों के साथ 'भरोसे का टूटना' सरकार के लिए ठीक नहीं.

किसान ज़मीन देने को लेकर कैसे सहमत हुए?

इस सवाल पर आंध्र के एक राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं, "इसके पीछे इतिहास से लेकर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और राजनीति तक कई वजहें हैं. इसमें जातिगत आकांक्षाएं, कृषि पर आधारित खराब जीवशैली, आबादी के वितरण और राजनीतिक समीकरणों ने ज़मीन अधिग्रहण की सफलता में बड़ी भूमिका निभाई."

इस सबके बीच 2019 में सरकार, प्रशासन और न्यायालय को अमरावती में शिफ्ट करने के साथ विधानसभा और विधानमंडल के साथ हाई कोर्ट का अस्थाई निर्माण शुरू हो गया. कुछ शैक्षिक संस्थानों और व्यापारिक संस्थाओं के लिए भी ज़मीनें आवंटित कर दी गईं. इस आधार पर इसे 'स्टार्ट अप कैपिटल' की संज्ञा दी गई.

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अमरावती में बिज़नेस डेवलपमेंट के साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण का काम भी अच्छी ख़ासी रफ्तार से चल रहा था.

जून 2019 में जगन मोहन की पार्टी वाई.एस.आर कांग्रेस पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल की. इस चुनाव में उसे 175 में से 151 सीटों पर जीत के साथ प्रचंड बहुमत हासिल हुआ था. चंद्रबाबू नायडू की पार्टी सिर्फ 23 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. इस तरह आंध्र प्रदेश की राजधानी का भविष्य भी अधर में लटक गया.

सत्ता में आने के बाद जगनमोहन सरकार ने विश्व बैंक को ये बताया कि पिछली सरकार के दिए कर्ज़ के आवेदन में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं. ये कर्ज़ अमरावती को राजधानी बनाए जाने के लिए लिया जाना है. नई सरकार के रुख़ के बाद एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) ने कर्ज़ देने की प्रक्रिया रोक दी.

भ्रष्टाचार के लगे आरोप

इसके साथ अमरावती में निर्माण काम रुक गया. यही नहीं, सत्ताधारी पार्टी के कुछ नेताओं ने 'स्टार्ट अप कैपिटल' को लेकर जो बयान दिए, उसने भी आने वाले दिनों में एक 'खराब स्थिति' के संकेत दिए.

नई सरकार ने पिछली सरकार में ज़मीन अधिग्रहण और अंदरुनी ख़रीद फ़रोख़्त में अनियमितताओं की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन कर दिया.

आरोप ये लगाया गया कि पिछली सरकार में कई नेताओं और उनके क़रीबियों को राजधानी के लोकेशन का पहले से ही पता था. इसलिए उन्होंने पहले ही सस्ते दामों पर ज़मीनें ख़रीद लीं और फिर सरकार की कीमत पर उन्हें राजधानी के लिए दे दिया. इस तरह उन्हें अवैध तरीके़ से फ़ायदा पहुंचाया गया.

दूसरा गंभीर आरोप था आवंटित ज़मीनें ख़रीदे जाने को लेकर. इसमें कहा गया कि सरकार के क़रीबी लोगों ने आवंटित ज़मीनें ख़रीद लीं. क़ानूनी रूप से ये भी अवैध है, क्योंकि आवंटित ज़मीनें ख़रीदी नहीं जा सकतीं.

टीडीपी नेताओं पर ये आरोप लगा कि इन्होंने अनुसूचित जातियों को धमकी या दबाव देकर उनसे आवंटित ज़मीनें ख़रीदीं. इससे उन्होंने काफी ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया.

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आंध्र का 'थ्री कैपियल बिल'

इस आरोप में एसआईटी ने टीडीपी सरकार में शहरी विकास मंत्री पी. नारायणा को गिरफ्तार किया था. ऐसे आरोप एन.वी. रमना के सीजेआई बनने तक चौतरफा लगते रहे. हालांकि इसके बाद गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को ज़मानत मिल गई. हालांकि जांच की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

इसके बाद एक बड़ा बयान दिसंबर 2019 में आया. तब मुख्यमंत्री जगनमोहन ने ये ऐलान किया था कि 'एक जगह पर राजधानी बनाने से शासन-प्रशासन और विकास सबकुछ केन्द्रीकृत हो जाएगा. इसलिए ज़रूरी है राजधानी के साथ विकास को भी विकेन्द्रीकृत किया जाए.'

जगनमोहन के उस बयान के बाद 'आंध्र प्रदेश डिसेंट्रलाइजेशन एंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट ऑफ ऑल रीजन बिल' लाया गया और इसे विधानसभा से पारित भी कर दिया.

इसी बिल को आंध्र का 'थ्री कैपियल बिल' कहा जाता है. इसके तहत आंध्र प्रदेश की तीन राजधानियां बनेंगी. अमरावती- विधायी राजधानी (लेजिस्लेटिव कैपिटल) विशाखापट्टनम- कार्यकारी राजधानी (एग्ज़ीक्यूटिव कैपिटल) और कुरनूल न्यायिक राजधानी होगी.

इसके साथ सरकार ने एक और बिल पास कराया, जिसके ज़रिए पिछली सरकार की बनाई 'आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजन डेवेलपमेंट अथॉरिटी' को भंग कर दिया गया.

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ये सबकुछ जब चल रहा था तब सीएम जगनमोहन की नज़र एक और मसले पर थी. वो मसला था विधान परिषद में बहुमत का. जगन मोहन की पार्टी को विधानसभा में तो बहुमत हासिल था, लेकिन विधान परिषद में बहुमत नहीं था. इसलिए 'थ्री कैपिटल बिल' पारित नहीं हुआ.

थ्री कैपिटल और दूसरे बिल पारित कराने में नाकामी के बाद जगनमोहन सरकार ने जनवरी 2020 में एक वैधानिक प्रस्ताव (स्टैचुअरी रिजोल्यूशन) पास किया. संविधान के अनुच्छेद 169(1) के तहत पारित इस प्रस्ताव के ज़रिए विधान परिषद को भंग करने की सिफ़ारिश की गई.

आंध्र सरकार का ये प्रस्ताव अंतिम मुहर के लिए केन्द्र सरकार के पास गया. लेकिन केन्द्र ने विधान परिषद भंग करने की मंज़ूरी नहीं दी.

हालांकि जगनमोहन सरकार को नवंबर 2021 में विधान परिषद में भी बहुमत हासिल हो गया. इसके बाद विधान परिषद भंग करने का प्रस्ताव सरकार ने ख़ुद ही वापस ले लिया.

अमरावती के लोग पहुंचे कोर्ट

उधर तीन-तीन राजधानियों के ऐलान के साथ ही अमरावती में विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके थे. दिसंबर 2019 से शुरू हुआ वो प्रदर्शन 'सेव अमरावती' की मुहिम में बदल गया. हालांकि इसकी मौजूदगी अमरावती के बाहर कुछ ख़ास नहीं है, फिर भी ये मुहिम अब भी जारी है.

इसके अलावा अमरावती के गांव वालों ने तीन राजधानी बनाने के फ़ैसले पर सरकार को हाई कोर्ट में घसीटा. इस पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने मार्च 2022 में गांव वालों के हक में फ़ैसला सुनाया.

हाई कोर्ट ने कहा कि, 'सरकार सिर्फ अपनी इच्छा की वजह से तीन राजधानियां नहीं बना सकती.' इसके साथ कोर्ट ने सरकार को ये आदेश दिया कि अमरावती में चल रहा राजधानी का निर्माण कार्य अगले छः महीने में पूरा करे.

अदालत में ये मामला चल ही रहा था, तब तक सरकार ने 'थ्री कैपिटल बिल' को वापस ले लिया. साथ ही उस एक्ट को भी खारिज कर दिया, जिसके जरिए 'आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजन डेवेलपमेंट अथॉरिटी' को भंग किया गया था.

इसके बाद अमरावती राजधानी के तौर पर अकेला विकल्प बच गया. साथ ही इसके निर्णाण में मुख्य भूमिका निभाने वाली 'आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजन डेवेलपमेंट अथॉरिटी' भी सक्रिय हो गई.

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जगनमोहन आख़िर अमरावती के ख़िलाफ़ क्यों हुए?

इसकी एक वजह है अमरावती इलाके में काम्मा जाति का वर्चस्व. ये मुख्य तौर पर किसान होते हैं. अगर आप जगन सरकार के दूसरे फैसलों और पहल के लिहाज़ से देखें, तो ये कहा जा सकता है कि अमरावती को राजधानी नहीं बनाने के पीछे सरकार की मंशा काम्मा जाति को अस्थिर करने की हो सकती है.

दूसरी वजह ये हो सकती है कि जगनमोहन अमरावती को आंध्र प्रदेश की राजधानी बनाने का क्रेडिट चंद्रबाबू नायडू को नहीं लेने देना चाहते हों, जैसा कि चंद्रबाबू नायडू हैदराबाद के पुनर्विकास का श्रेय खुद को देते हैं.

दूसरा संभावित कारण रायलसीमा और उत्तरी आंध प्रदेश के क्षेत्रों की अनदेखी का हो सकता है. यहां के लोगों की शिकायत है कि अमरावती के नाम पर उनके क्षेत्रों को नकारा जा रहा है. यहां के लोग हैदराबाद को लेकर भी ऐसी शिकायतें दर्ज कराते रहे हैं.

नवंबर 2022 में जब एन.वी रमना भारत के मुख्य न्यायधीश के पद से रिटायर हुए, तब आंध्र सरकार ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि हाई कोर्ट के पूरे जजमेंट पर रोक नहीं लगाई. लेकिन फ़ैसले के उन हिस्सों को ज़रूर स्थगित कर दिया, जिसमें हाई कोर्ट ने आंध्र सरकार को अमरावती में निर्माण कार्य छः महीने में पूरा करने का आदेश दिया था.

इस केस की सुनवाई अब भी सुप्रीम कोर्ट में जारी है.

इस बीच सरकार ने अमरावती में निर्माण कार्य दोबारा शुरू करने को लेकर कुछ घोषणाएं भी कीं. लेकिन ज़मीन पर ऐसा होता नहीं दिख रहा.

अगर कानूनी तौर पर कहें तो अमरावती आज आंध्र प्रदेश की राजधानी है. लेकिन राज्य मानवाधिकार आयोग के दफ्तर समेत कई न्यायिक कार्यालय कुरनूल में शिफ़्ट कर दिए गए हैं.

इसके अलावा जगनमोहन की पार्टी के कई नेता आंध्र प्रदेश की तीन-तीन राजधानियों के पक्ष में बयान देते रहते हैं.

हालांकि 31 जनवरी को दिल्ली में दिए गए अपने बयान में मुख्यमंत्री जगनमोहन ने तीन राजधानियों का ज़िक्र नहीं किया. उन्होंने सिर्फ विशाखापट्टनम का नाम लिया. ये इस मामले में एक नया ट्विस्ट हो सकता है.

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