आरिफ़ मोहम्मद ख़ान बार-बार क्यों उलझ रहे हैं केरल की सरकार से?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बाढ़ से लेकर भूस्खलन और फिर महामार जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के बाद अब दक्षिण भारतीय राज्य केरल अलग तरह की लड़ाई का अखाड़ा बन रहा है.
और इस लड़ाई के केंद्र में हैं बहराइच से पूर्व सांसद रहे और अब केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान केरल में सत्ताधारी सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट के लिए ऐसा काँटा बन गए हैं कि सीपीएम ने तमिलनाडु में डीएमके की सरकार के साथ मिलकर रणनीति बनानी शुरू कर दी है.
तमिलनाडु में भी डीएमके सरकार गवर्नर आरएन रवि के साथ कई मुद्दों पर टकराव का सामना कर रही है.
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों की सबसे बड़ी चिंता ये है कि केरल सरकार जिस सुधार प्रक्रिया को लाने का प्रयास कर रही है, वह एलडीएफ़ सरकार और गवर्नर के बीच टकराव की भेंट चढ़ जाएगी. गवर्नर आरिफ़ मोहम्मद ख़ान केरल की सभी यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जो कर रहे हैं और जो कह रहे हैं, उसने केरल में सभी को हैरत में डाल दिया है. लेकिन जिन लोगों ने उन्हें 1980 के दशक से राजनीति में आगे बढ़ते देखा है, उनके लिए उनका ये क़दम कोई हैरानी की बात नहीं हैं.
टकराव हैरान नहीं करता है

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चर्चित राजनीतिक टिप्पणीकार शरत प्रधान कहते हैं, "अब वो हैरान नहीं करते हैं. उन दिनों कोई ये नहीं सोच सकता था कि कोई सत्ता के ख़िलाफ़ भी आ सकता है (तब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे). इसलिए आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने सभी को प्रभावित किया. शाहबानो केस के बाद उन्हें आपातकाल के बाद का युवा तुर्क समझा जाने लगा था. जिस तरह आपातकाल से पहले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, मोहन धारिया जैसे नेताओं को देखा जाता था, वैसी ही छवि उनकी भी बन गई थी."
चंद्रशेखर और मोहन धारिया जसे नेताओं को आपातकाल से पहले युवा तुर्क कहा जाता था, क्योंकि वो कांग्रेस पार्टी के भीतर एक ऐसे छोटे समूह का हिस्सा थे, जो पार्टी की नीतियों को ग़रीबों के हित में बदलने के लिए प्रयासरत थे. उन दिनों इंदिरा गांधी अपनी सत्ता के शिखर पर थीं और राजनीतिक रूप से बेहद मज़बूत थीं.
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित शाहबानो मामले में फ़ैसला दिया था कि तलाक़ लेने वाली मुसलमान महिलाओं को इद्दत का समय गुज़ारने के बाद भी गुज़ारा भत्ते का हक़ है.
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को पलटने के लिए संसद में विधेयक ले आई थी. उस समय राजीव गांधी के मंत्रमंडल का हिस्सा रहे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने सरकार के इस फ़ैसले के विरोध में मंत्रीमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उस दौर में नेतृत्व के ख़िलाफ़ ख़डा होना अपने आप में बहुत असमान्य बात थी. अपने इस फ़ैसले के बाद आरिफ़ मोहम्मद ख़ान मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गए थे और उनकी पहचान एक प्रगतिशील मुसलमान की बन गई थी, हालाँकि मुसलमानों के बड़े तबक़े की राय इससे अलग थी.
इसके बाद आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने अपना क़द कम कर लिया और वो बहराइच ज़िले में बुद्ध पब्लिक स्कूल के नाम से एक स्कूल चलाने लगे.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के हैं और यहीं से वो साल 1980 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए थे. लेकिन वो बहराइच को अपनी कर्मभूमि बताते हैं.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान बहराइच से साल 1984 में कांग्रेस के टिकट पर और फिर साल 1989 में जनता दल के टिकट पर सांसद रहे हैं.
1998 में वो यहाँ से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर सांसद रहे. बाद में आरिफ़ मोहम्मद ख़ान 2004 में बीजेपी में शामिल हो गए. बहराइच में ही उन्होंने राम रहीम धाम की स्थापना भी की है.
प्रधान कहते हैं, "जबसे वो बीजेपी में शामिल हुए हैं, कोई उनसे हैरान नहीं होता है."
केरल में क्या है मुद्दा

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने केरल में उस समय सभी को हैरान कर दिया, जब उन्होंने गवर्नर पद की अपनी शपथ हिंदी या अंग्रेज़ी में लेने के बजाए मलयालम में ली.
हालांकि केरल के सकारात्मक पक्षों की जो प्रशंसा उन्होंने की, वो बहुत ज़्यादा दिन नहीं टिकी.
ये तब पता चला जब उन्होंने नागरिकता (संशोधन) क़ानून 2019 का समर्थन किया. केरल में इस क़ानून के प्रति सख़्त विरोध था.
इस सबके बावजूद, उन्हें भारतीय इतिहास कांग्रेस में आमंत्रित किया गया, जहाँ उन्होंने दावा किया कि भारत के चर्चित इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने उन पर हमला करने की कोशिश की.
इसके बाद उन्होंने केरल यूनीवर्सिटी को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को डी. लिट की उपाधि से सम्मानित करने का प्रस्ताव भेजा, जिसे ठुकरा दिया गया.
इससे सरकार और गवर्नर का एक दूसरे के प्रति नज़रिया बदल गया. इसके बाद राज्य की विधानसभा में पारित दर्जनभर विधेयकों पर उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किए.
इनमें शामिल एक विधेयक गवर्नर की शक्तियों को कम करने के लिए लाया जा रहा था. अन्य विधेयक लोकायुक्त की शक्तियाँ कम करने के लिए था.
हालाँकि सितंबर में आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने पाँच विधेयकों पर हस्ताक्षर कर दिए. सिर्फ़ उन विधेयकों को उन्होंने रोक दिया, जो लोकायुक्त और गवर्नर की शक्तियाँ कम करने के लिए लाए जा रहे थे.
(भारत का संविधान गवर्नर को पारित विधेयक को रोकने, संशोधन प्रस्तावित करने और विधानसभा से दोबारा विधेयक पर विचार करने का अधिकार देता है.
लेकिन अगर विधानसभा विधेयक में बिना कोई बदलाव किए, उसे फिर से पारित करके गवर्नर के पास भेजती हैं तब गवर्नर के पास हस्ताक्षर करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है.
हालाँकि संविधान ने गवर्नर के हस्ताक्षर करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की है.)
एक अन्य मामले में यूनिवर्सिटी के कुलपति के एक जनसंपर्क अधिकारी को निलंबित करने के बाद गवर्नर ने उन्हें फिर से पद देने के निर्देश दे दिए थे. इन छोटी-छोटी घटनाएँ से हालात ऐसे हो गए कि सरकार और गवर्नर के बीच सहमत होने की गुंज़ाइश ही नहीं बची.
हाल के दिनों में, गवर्नर ने राज्य की 11 यूनिवर्सिटी के कुलपतियों को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा है. उनके ये निर्देश, सुप्रीम कोर्ट के एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनीवर्सिटी के कुलपति की नियुक्त से जुड़े फ़ैसले के आधार पर दिए गए हैं.
अदालत ने कहा था कि किसी यूनीवर्सिटी के कुलपति को सर्च कमेटी के सिर्फ़ एक नाम प्रस्तावित करने के आधार पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है.

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मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने, हालांकि, गवर्नर के आरोपों को ख़ारिज किया है और कहा है कि एक कुलपति के मामलों को सभी यूनिवर्सिटी पर लागू नहीं किया जा सकता है.
हालाँकि इसके बावजूद गवर्नर ने कुलपतियों से इस्तीफ़ा देने के लिए कह दिया. इसके बाद कुलपतियों ने गवर्नर के इस फ़ैसले को केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
इस टकराव का आधार ये है कि यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) और राज्य के यूनिवर्सिटी एक्ट में एक विसंगति है.
पूर्व कुलपति और राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. जे प्रभाष कहते हैं, "यूजीसी के नियमों के तहत, सर्च पैनल के लिए तीन नाम प्रस्तावित करना अनिवार्य है. नियम ये भी कहते हैं कि सर्च समिति को सिर्फ़ शिक्षाविदों के नाम पर ही विचार करना चाहिए. टेक्निकल यूनिवर्सिटी के संबंध में सर्च पैनल में दो शिक्षाविद और एक मुख्य सचिव, जो आईएएस अधिकारी होते हैं, को होना होता है. राज्य के यूनिवर्सिटी एक्ट के मुताबिक़, सर्च पैनल के पास सिर्फ़ एक नाम गवर्नर को प्रस्तावित करने का अधिकार है."
शिक्षा और राजनीति पर असर
डॉ. प्रभाष कहते हैं कि गवर्नर के आदेश की वजह से केरल की 17 में से 13 यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर नहीं है. नए वाइस चांसलर (कुलपति) की नियुक्ति की प्रक्रिया में समय लगता है.
वो इसे 'बाद में हुए टकराव (ऑफ़्टर कंफ्रंटेशन एसी) और पहले हुए टकराव (बिफोर कंफ्रंटेशन- बीसी)' कहते हैं.'
डॉ. प्रभाष कहते हैं, "इसे देखने के दो तरीक़े हैं. सरकार इस समय तीन पैनलों की रिपोर्ट का अध्ययन कर रही है- शिक्षा सुधार, यूनिवर्सिटी का ढाँचा, और पाठ्यक्रम में सुधार. अगर इस वक़्त विश्वविद्यालयों के कुलपति बदले जाते हैं, और ऐसे कुलपति लाए जाते हैं जिनका झुकाव बीजेपी की तरफ़ हो तो इसका असर शिक्षा व्यवस्था और केरल की संस्कृति पर भी होगा. अगर बीजेपी की तरफ़ झुकाव वाला व्यक्ति कुलपति होगा तो बहुत से शिक्षाविद पाला बदल सकते हैं और इससे एलडीएफ़ सरकार के लिए कई समस्याएं होंगी. आपको ये बात भी ध्यान में रखनी होगी कि अभी राज्य में बीजेपी ताक़तवर राजनीतिक शक्ति नहीं है."
डॉ. प्रभाष कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि एलडीएफ़ सरकार बेदाग़ है. वो कहते हैं, "जब ऐसा गवर्नर हो जो सत्ताधारी दल के राजनीतिक विचारों की वजह से विरोधी हो, तो स्थानीय सरकार के लिए ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि वो नैतिक रूप से और भी मज़बूत हो. पार्टी सदस्यों के रिश्तेदारों की नियुक्तियाँ करना एक बहुत ही गंभीर मामला है."
गवर्नर सभी विश्वविद्यालयों के चांसलर भी होते हैं. चांसलर की भूमिका में ख़ान ने मुख्यमंत्री के निजी सचिव की पत्नी की कन्नूर यूनीवर्सिटी में नियुक्ति को रोक दिया है.
हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि गवर्नर के आदेशों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. हालाँकि ये कहना मुश्किल होगा कि अदालत में क्या नतीजा निकल सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कालीस्वरम राज कहते हैं, "गवर्नर उन्हें हटाने का आदेश दे सकते हैं. लेकिन ऐसे आदेश को चुनौती दी जा सकती है. ऐसी कई पेचीदगियाँ हैं. कई मामलों में स्वयं गवर्नर ने उनकी नियुक्ति की है. इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले में फ़ैसला दिया है उसमें और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के मामले में कई क़ानूनी और तथ्यात्मक फ़र्क़ हैं."
राज ये कहते हैं कि ऐसा हो सकता है कि कुछ कुलपतियों की नियुक्तों में कुछ खामियां रही हों.
वो कहते हैं, "ऐसा लगता है कि यहाँ सरकार कमज़ोर विकेट पर खेल रही है. लेकिन जिस तरह से गवर्नर ने वित्त मंत्री केएन बालागोपाल के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, वो एक बड़ी मूर्खता है. मुझे नहीं लगता कि इस मौजूदा विवाद से गवर्नर के कार्यालय का रुतबा बढ़ेगा."

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बालागोपाल ने एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि जो लोग उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आए हैं, वो केरल के विश्वविद्यालयों के कामकाज को नहीं समझ सकते हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के सुरक्षा गार्डों ने पाँच छात्रों की गोली मारकर हत्या कर दी थी.
ख़ान ने मंत्री के इस बयान को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा और कहा कि अब इस मंत्री पर 'गवर्नर की कृपा नहीं रहेगी.'
ख़ान ने ये भी कहा कि मंत्री ने अपने पद की शपथ का भी उल्लंघन किया है, क्योंकि उन्होंने क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाला बयान दिया.
हालांकि पिनरई विजयन ने पलटवार करते हुए कहा कि संविधान इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है कि मंत्री को मंत्रालय छोड़ने के लिए सिर्फ़ मुख्यमंत्री कह सकते हैं और उनकी सलाह पर ही गवर्नर मंत्री को हटा सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कालीस्वरम राज ने कहा, "गवर्नर ने बहुत से काम ऐसे किए हैं जो संवैधानिक या प्रशासनिक होने के बजाए राजनीतिक अधिक हैं."
इससे कई विश्लेषक ये सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या आरिफ़ मोहम्मद ख़ान वामपंथी शासन वाले केरल में बीजेपी के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
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