केरल में राज्यपाल बनाम सरकार: क्या गवर्नर किसी मंत्री को हटा सकते हैं?

पिनाराई विजयन

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केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने ट्विटर पर लिखा है कि पिनाराई विजयन सरकार के कुछ मंत्रियों के बयानों से राज्यपाल के दफ़्तर की गरिमा को ठेस पहुंची है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है.

केरल में सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाली एलडीएफ़ सरकार और राज्यपाल दफ़्तर के बीच पिछले कुछ समय से तनातनी चली आ रही थी.

लेकिन इस ट्वीट के बाद ये संघर्ष सार्वजनिक हो गया है.

सीपीआई(एम) ने इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से दखल देने की मांग की है.

सीपीआई(एम) ने ट्वीट कर लिखा है, "राष्ट्रपति को इस मामले में तुरंत दखल देकर केरल के राज्यपाल को असंवैधानिक और ग़ैर-लोकतांत्रिक बयान देने से रोकना चाहिए."

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क्या है मामला?

केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान और एलडीएफ़ की पिनाराई विजयन सरकार के बीच पिछले कुछ समय से 'यूनिवर्सिटी लॉज़ संशोधन अधिनियम, 2022' को लेकर मतभेद जारी हैं.

इस अधिनियम पर राज्यपाल के दस्तख़त होते ही केरल के 13 विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर चुनने की प्रक्रिया में केरल सरकार को नए अधिकार मिल जाएंगे.

लेकिन राजभवन ने अब तक इस बिल को अपनी मंज़ूरी नहीं दी है.

इसी मुद्दे पर रह-रहकर होती बयानबाजी की वजह से राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने सोमवार को एक ट्वीट किया है. इस पर राज्य सरकार की ओर से कड़ी आपत्ति जताई जा रही है.

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान
Twitter/KeralaGovernor
मुख्यमंत्री और मंत्री परिषद को राज्यपाल को सलाह देने का अधिकार है. लेकिन कुछ मंत्रियों के बयानों से राज्यपाल पद की गरिमा को ठेस पहुंची है. और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई मुमकिन है.
आरिफ़ मोहम्मद ख़ान
राज्यपाल, केरल

राज्यपाल ने क्या लिखा है?

केरल के राज्यपाल के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से 17 अक्टूबर को किए गए ट्वीट में लिखा है, ''मुख्यमंत्री और मंत्री परिषद के पास गवर्नर को सलाह देने का पूरा अधिकार है. लेकिन गवर्नर के पद की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले मंत्रियों के बयानों पर, उन्हें पद से हटाए जाने जैसी सख़्त कार्रवाई की जा सकती है. ''

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सार्वजनिक रूप से मंत्रियों को पद से हटाने के ज़िक्र के बाद केरल की राजनीति में हलचल मच गयी है.

सीपीआई(एम) ने इस मामले में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से दखल देने की अपील की है.

इसके साथ ही पिनाराई विजयन ने कहा है कि राज्यपाल के पास सीमित शक्तियां होती हैं और वह मंत्रियों को बर्ख़ास्त नहीं कर सकते.

उन्होंने कहा कि 'मंत्रियों के बारे में फ़ैसला करने का अधिकार सिर्फ़ मुख्यमंत्री के पास होता है और मुख्यमंत्री के समक्ष ही उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए.'

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान

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क्या राज्यपाल मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर सकता है?

भारत के राजनीतिक इतिहास में अब तक संभवत: ऐसा मौका नहीं आया है जब किसी राज्यपाल ने एकतरफ़ा ढंग से किसी राज्य सरकार के मंत्री को बर्ख़ास्त किया हो.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या राज्यपाल अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके किसी मंत्री को बर्ख़ास्त कर सकते हैं.

संविधान में अनुच्छेद 153-161 के तहत राज्यपाल के पद और शक्तियों को बयां किया गया है.

इन नियमों के तहत भारत का राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर राज्यपाल की नियुक्ति करता है. इसे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक अहम कड़ी के रूप में देखा जाता है.

विधानसभाओं में पास होने वाले विधेयकों को क़ानून की शक्ल देने के लिए राजभवन की स्वीकृति मिलनी ज़रूरी होती है. इसके अतिरिक्त राज्यों में सरकार गठन के मौके पर राज्यपाल के पद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

इन तमाम वजहों से राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच तनाव की ख़बरें आती रही हैं.

केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान

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इमेज कैप्शन, केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के साथ पिनाराई विजयन

लेकिन केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने अपने ट्वीट में जिस शब्द का प्रयोग किया है, उसका ज़िक्र आर्टिकल 164(1) में किया गया है.

इस अनुच्छेद में लिखा है. - 'जब तक राज्यपाल की इच्छा हो, मंत्रीगण अपने पद पर बने रह सकते हैं.'

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी इस आर्टिकल को कुछ यूँ समझाते हैं.

अचारी कहते हैं, "अनुच्छेद 164(1) के तहत मुख्यमंत्री और मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है. हालांकि, राज्यपाल को मुख्यमंत्री की नियुक्ति करने के लिए किसी की सलाह की ज़रूरत नहीं होती है. लेकिन वह मंत्रियों की नियुक्ति सिर्फ़ मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर कर सकते हैं."

"राज्यपाल को किसी को भी मंत्री के रूप में नियुक्त करने की शक्ति नहीं है. वह सिर्फ़ मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर ही किसी को मंत्री बना सकते हैं."

पर क्या इसका ये मतलब है कि राज्यपाल मुख्यमंत्री या उसके मंत्रियों को अपनी मर्जी से पद से हटा सकता है.

अचारी कहते हैं, "जब तक सत्तारूढ़ दल को विधानसभा में बहुमत हासिल है तब तक राज्यपाल उस सरकार के प्रति अपना समर्थन जारी रख सकता है. राज्यपाल सिर्फ़ उस सूरत में अपना समर्थन वापस ले सकता है जब सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खोने के बावजूद सत्ता छोड़ने से इनकार कर दे. ऐसी स्थिति में राज्यपाल सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर उसे भंग कर सकता है."

इसके साथ ही उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री के सुझाव के बिना राज्यपाल न तो किसी मंत्री को नियुक्त कर सकता है और न ही उसे बर्ख़ास्त कर सकता है. ये संवैधानिक स्थिति है."

कॉपी - अनंत प्रकाश

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