राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' पर विदेशी मीडिया में ये बातें कही जा रहीं

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में 'भारत जोड़ो यात्रा' आज शुक्रवार छह जनवरी को हरियाणा में प्रवेश कर चुकी है.
आने वाले दिनों में ये यात्रा हरियाणा से होती हुई पंजाब और फिर आख़िर में जम्मू-कश्मीर पहुँचेगी.
अब से 120 दिन पहले शुरू हुई इस यात्रा के तहत अब तक सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हुजूम के साथ राहुल गांधी दस राज्यों के 52 ज़िलों से होकर गुज़र चुके हैं. कांग्रेस पार्टी ने ये जानकारी इस यात्रा की वेबसाइट पर जारी की है.
पिछले चार महीनों में राहुल गांधी की इस यात्रा की वजह से भारतीय मीडिया में उनकी पार्टी से जुड़ी ख़बरें सुर्खियों में रहीं.
भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की इस पद यात्रा में विदेशी मीडिया ने भी रुचि दिखाई है. आइए जानते हैं कि विदेशी मीडिया में राहुल की यात्रा को कैसे देखा जा रहा है.

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जर्मनी के प्रसारक डी डब्ल्यू ने क्या लिखा है?
जर्मनी के पब्लिक ब्रॉडकास्टर डी डब्ल्यू (डॉयचे वेले) ने बीते दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कांग्रेस पार्टी इस यात्रा के ज़रिए महंगाई, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे उठाकर न सिर्फ़ अपनी खोई राजनीतिक ताक़त फिर से हासिल करना चाहती है, बल्कि वह राहुल गांधी को एक जननेता के रूप में भी स्थापित करना चाहती है.
डी डब्ल्यू लिखता है, 'एक राजनीतिक पार्टी जिसने अपने 100 साल के लंबे इतिहास में से ज़्यादातर समय भारतीय राजनीति को दिशा दी है, वह अब 2024 के आम चुनाव से पहले किसी तरह ख़ुद में एक नई जान फूंकने के लिए छटपटा रही है.'
एक दौर में भारतीय राजनीति में प्रभुत्व रखने वाली कांग्रेस पार्टी इस समय भारत के 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ़ तीन राज्यों में सरकार चला रही है.
ये तीन राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश हैं, जहाँ कांग्रेस को बहुमत हासिल है. वहीं, तमिलनाडु, बिहार और झारखंड में वह क्षेत्रीय साझेदारों के साथ सत्ता में है.
इससे पहले भी जब कांग्रेस सत्ता से बाहर रही है, तब भी उसने विपक्ष की भूमिका निभाई थी. लेकिन ये पहला मौक़ा है, जब कांग्रेस के पास नेता प्रतिपक्ष बनने भर भी सांसद नहीं हैं.
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस के ढलान को बहुसंख्यकवाद के उभार और पार्टी की अंदरूनी कमियों को ध्यान में रखते हुए देखना चाहिए.
राजनीतिक विश्लेषक ज़ोया हसन ने डी डब्ल्यू से कहा , 'कांग्रेस इस समय जिस संकट का सामना कर रही है, उसकी वजह पार्टी की ओर से हिंदू राष्ट्रवाद का प्रभावशाली ढंग से सामना करने में विफल रहना है.
यही नहीं, इसके लिए धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण के चलते सिकुड़ते मध्य मार्ग के साथ-साथ व्यक्तिगत और सांगठनिक असफलताएं भी ज़िम्मेदार हैं.'
ज़ोया हसन अपनी हालिया प्रकाशित किताब 'भारतीय राजनीति में विचारधारा और संगठन' में पिछले एक दशक में कांग्रेस के पतन को भारतीय राजनीति में आए व्यापक परिवर्तन के साथ जोड़कर देखती हैं.
डी डब्ल्यू के साथ बातचीत में हसन कहती हैं, "हिंदू राष्ट्रवाद ने कांग्रेस पार्टी के भारत को लेकर विविधतावादी विचार के लिए अहम चुनौती पेश की है."
वह कहती हैं, "रणनीतिक और ज़मीनी सच्चाई के रूप में भी धार्मिकता और राजनीति का मेल कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक फ़ायदे की गारंटी नहीं देता. ऐसे में इस पार्टी को ध्रुवीकरण की राजनीति से इतर ऐसा राजनीतिक विकल्प तैयार करना होगा जो जोड़ने वाला हो."
न्यूयॉर्क टाइम्स ने क्या लिखा है?
भारत में इस साल एक के बाद एक कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, जिनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्य भी शामिल हैं.
कांग्रेस पार्टी ने पिछली बार इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी. लेकिन बीजेपी की कथित सियासी रणनीति और कांग्रेस की आंतरिक कलहों के चलते कांग्रेस इनमें से सिर्फ़ दो राज्यों में अपनी सरकार बचा सकी.
इन अहम चुनावों के कुछ महीनों बाद 2024 में भारत में आम चुनाव हैं. ऐसे में कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी किसी तरह आम मतदाताओं में अपनी पार्टी को लेकर उत्साह पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं.

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अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता समीर यासिर ने भारत जोड़ो यात्रा में चलकर आम लोगों में इसके असर को भांपने की कोशिश की है.
न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित ख़बर में समीर यासिर लिखते हैं, ''अब जब आम चुनाव होने में बस 16 महीने शेष हैं तो राहुल गांधी की यात्रा ये तय करती है कि भारत का बँटा हुआ विपक्ष पीएम मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के युग परिभाषित करने वाली महत्वाकांक्षाओं को विराम दे पाएगा.
भारत में बहुदलीय लोकतंत्र का भविष्य अधर में लटका हुआ है. भारत के सबसे ताक़तवर नेताओं में से एक नरेंद्र मोदी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष नींव को एक नया स्वरूप दिया है जो हिंदू समाज को तरजीह और मुस्लिमों समेत दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को हाशिए पर धकेलता है.
नरेंद्र मोदी की एक शख़्सियत के रूप में पहुंच इतनी गहरी और सफलताएं इतनी व्यापक हैं कि बीजेपी नेता मानते हैं कि उनकी पार्टी आने वाले कई दशकों तक भारत में राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखेगी.
विपक्षी दलों का कहना है कि बीजेपी भारत के अलग-अलग कोनों और इसके संस्थानों पर अपनी पकड़ मजबूत करती जा रही है और उन्हें उन मंचों से बाहर कर दिया गया है, जहां से वे आम लोगों तक अपनी आवाज़ पहुंचा सकते.
भारतीय संसद जहाँ कभी खुलकर बहसें हुआ करती थीं, वह अब मंत्रियों के भाषणों तक सीमित रह गया है और सत्तारूढ़ पार्टी अहम नीतिगत मुद्दों पर बहस करने से बचती नज़र आती है.
इसके साथ ही बीजेपी ने एक हद तक दबाव डालने के साथ ही सरकारी विज्ञापन रोकने की धमकियों से पारंपरिक मीडिया को एक हद तक अपने रुख़ को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लिया है.
कांग्रेस पार्टी ने भारत के 75 साल लंबे लोकतांत्रिक राजनीतिक सफ़र में से दो तिहाई हिस्से में भारत का नेतृत्व किया है.
गांधी-नेहरू परिवार ने इस देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं, जिन्होंने लगभग 40 सालों तक भारत पर शासन किया है. लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को विधानसभा चुनावों से लेकर आम चुनावों तक लगातार हार का सामना करना पड़ा है.
इस समय 543 सदस्यों वाली भारतीय संसद में कांग्रेस पार्टी के सांसदों की संख्या मात्र 53 है. वहीं, बीजेपी के सांसदों की संख्या 303 है.
हाल के समय में कांग्रेस पार्टी को इसकी विचारधारा से ज़्यादा गांधी परिवार के प्रति इसके समर्पण ने परिभाषित किया है जो कि पार्टी के इतिहास के केंद्र में रहा है. ऐसे में पार्टी के राजनीतिक पतन की वजह तलाशते हुए सरल ढंग से दो बातें कही जाती हैं- न गांधी परिवार के साथ रहते कुछ हो सकता है और न गांधी परिवार के बिना.
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यही नहीं, कांग्रेस पार्टी जिस तरह धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से कमज़ोर हुई है, उसके साथ ही उसके स्कैंडल और आंतरिक कलह सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं.
कांग्रेस नेता कहते हैं कि परिवार जिस तरह अलग-अलग गुटों को साथ लाने में विफल रहा है, उसके चलते स्थानीय स्तर पर ठहराव आने के साथ-साथ बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं.
इंडियाना यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर सुमित गांगुली ने एनवाईटी से कहा, "ये यात्रा राहुल गांधी की ओर से पार्टी की हालत सुधारने के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय छवि मज़बूत करने की दिशा में आख़िरी प्रयास है. लेकिन तमाम शोर-शराबे के बावजूद वह भारत को लेकर एक अलग और स्पष्ट विचार पेश करने में नाकाम रहे हैं."
हालांकि, पार्टी के शीर्ष नेता जयराम रमेश मानते हैं, "हम इस यात्रा में अपना सर्वस्व समर्पित कर रहे हैं. अगर हम इससे कोई बदलाव नहीं ला सके तो ये हमारे लिए पार्टी और विचारधारा के स्तर पर एक समस्या होगी."
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से यात्राएं निकालना भारतीय राजनीति का अहम स्वरूप रहा है.
साल 1990 में बीजेपी ने सत्ता से बाहर रहते हुए मुग़लकालीन मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए देश भर में रथयात्रा निकाली थी. इस रथ यात्रा की वजह से बीजेपी अपना वैचारिक आधार बनाने के साथ ही राजनीतिक सफलता की नींव रखने में सफल हुई.
ये अब तक स्पष्ट नहीं है कि राहुल गांधी इस यात्रा के ज़रिए अपनी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में फिर से प्रासंगिक बना पाएंगे या नहीं.'
पाकिस्तानी अख़बार डॉन ने क्या लिखा है?
कांग्रेस पार्टी में हाल ही में अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में राज्यसभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की जीत हुई है. लेकिन उन्हें चुनौती देने वाले शशि थरूर गुट की ओर से चुनाव के दौरान धांधली करने का आरोप भी लगाया गया था.
यही नहीं, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि खड़गे को गांधी परिवार का समर्थन हासिल था. लेकिन इसके बाद भी संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक के रूप में लंबा करियर पूरा करने वाले शशि थरूर को इस चुनाव में अपेक्षा से कहीं ज़्यादा वोट मिले.
मगर चुनाव नतीजे आने के बाद शशि थरूर को वो जगह और अधिकार नहीं दिए गए जितनी उनके समर्थकों को उम्मीद थी.
पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अख़बार डॉन ने अपने एक लेख में कांग्रेस की 'भारत जोड़ो यात्रा' और खड़गे की अपेक्षित सफ़लताओं को एक सूत्र में पिराने की कोशिश की है.
अख़बार लिखता है, ''राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिए अपनी पार्टी और देश की ख़राब सेहत सुधारने की कोशिश करना चाहते हैं. लेकिन 12 राज्यों से होते हुए 150 दिनों में 3570 किलोमीटर की यात्रा करना कोई चमत्कारी काम नहीं है.
और न ही राहुल गांधी की ओर से कैमरों की मौजूदगी के बिना समुद्र में गोते लगाने की क्षमता दिखाना. लेकिन सांप्रदायिक रूप से बँटे हुए कर्नाटक में हिजाब पहने स्कूली बच्ची का हाथ थामे हुए राहुल गांधी की मुस्कराती तस्वीर ही नेहरू और गांधीवादी भारत का विचार था.

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कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में खड़गे जी का मूल काम बीजेपी को हराना है जो कि उन्होंने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में स्वीकार भी किया है. लेकिन उन्हें इस उद्देश्य की चुनावों में जीत से तुलना नहीं करनी चाहिए.
खड़गे का काम इस यात्रा से मिली ऊर्जा के ज़रिए एक गठबंधन तैयार करना होगा जिसका मूल मक़सद बीजेपी को हराना होना चाहिए.
कांग्रेस इससे पहले कई मौक़ों पर भी हाथ आए मौक़े गँवाती दिखी है. इसकी ओर से सीट शेयरिंग को लेकर दबाव विपक्षी दलों को एक साथ आने से रोकता रहा है. विपक्ष को साथ लाकर एक मज़बूत चुनाव जिताऊ मंच बनाना कांग्रेस पार्टी का प्रधानमंत्री बनाने से ज़्यादा अहम है.''

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ब्रिटिश अख़बार गार्डियन ने क्या लिखा है?
कांग्रेस पार्टी को इस यात्रा से होने वाले अपेक्षित फ़ायदों को एक तरफ़ रखा जाए तो 'भारत जोड़ो यात्रा' को राहुल गांधी की छवि को मज़बूत करने की दिशा में अहम क़दम माना जा रहा है.
राहुल गांधी को विपक्ष में रहते हुए ग़ैर चुनावी महीनों में संभवत: पहली बार इतनी ज़्यादा मीडिया कवरेज़ मिली होगी.
ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अख़बार द गार्डियन में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्रोफ़ेसर मधुलिका बनर्जी का एक लेख छपा है. वो इस यात्रा के साथ चली थीं.
अख़बार लिखता है 'ये पूरा अभियान किसी अहिंसक सेना के विशाल सैन्य अभियान जैसा था. अलग-अलग भाषाई समुदायों और पृष्ठभूमियों के लोगों को इस मार्च में शामिल होते देखना काफ़ी दिलचस्पी भरा था.
ये मिनी इंडिया का मार्च जैसा था. हमें पता था कि ये भारत मौजूद है, लेकिन इसका अनुभव कम ही होता है. पुरानी मुलाक़ातों की तरह, मैंने इस मार्च में चलते हुए भी राहुल गांधी को काफ़ी विनम्र और तेज़ बुद्धि का शख़्स पाया है.
उन्हें चुनौती देना और उनसे असहमत होना संभव था जो कई भारतीय नेताओं के साथ संभव नहीं था. नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा करना संभव नहीं है क्योंकि वह तो प्रेस कॉन्फ्रेंस भी नहीं करते हैं.
मोदी की सभाओं में लोगों को वैभव के दर्शन होते हैं. लेकिन इससे इतर राहुल गांधी की बढ़ी हुई दाढ़ी और आम लोगों के साथ तस्वीरें एक अच्छी राजनीतिक छवि गढ़ती है.

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पिछले कुछ सालों में कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक पतन के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. उन पर अनिच्छा से राजनीति करने और पर्याप्त समय न देने का आरोप लगाने के साथ-साथ पप्पू का भी ख़िताब दिया गया है. लेकिन पार्टी की इस गति के लिए पार्टी के नेता और संगठन भी ज़िम्मेदार हैं.
लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस यात्रा ने इन आरोपों का निराकरण कर दिया है. इस यात्रा ने पार्टी कार्यकर्ताओं को एक मक़सद दिया है. और राहुल गांधी की ओर से इस बड़ी यात्रा को आयोजित करवाने के बाद उन पर लगा पप्पू का ठप्पा सही नहीं जान पड़ता.'
(कॉपी- अनंत प्रकाश)
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