राहुल गांधी के अटल की समाधि पर जाने के क्या मायने हैं?

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते राहुल गांधी
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना आख़िरी लोकसभा चुनाव 2004 में लड़ा था.

लेकिन चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मिली हार के बाद वाजपेयी भारत की सक्रिय राजनीति से अलग हो गए थे.

दूसरी ओर राहुल गांधी ने 2004 में ही पहली बार चुनावी राजनीति में दस्तक दी थी.

राहुल गांधी ने 2004 में उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था और जीत मिली थी. अमेठी से ही राहुल के पिता राजीव गांधी चुनाव लड़ते थे.

2004 के आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए पर सोनिया गांधी के नेतृत्व वाला गठबंधन यूपीए भारी पड़ा था.

राहुल गांधी जब संसद पहुँचे तब अटल बिहारी वाजपेयी सांसद रहते हुए भी ख़राब सेहत के कारण संसद नहीं आ पाते थे.

आडवाणी नेता प्रतिपक्ष बन गए थे और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री. राहुल ने सांसद रहते हुए संसद में कभी वाजपेयी को मोर्चा संभालते नहीं देखा.

राहुल गांधी 10 साल तक अपनी सरकार में लोकसभा सांसद रहे और पिछले आठ सालों से विपक्षी सांसद हैं.

कांग्रेस जब 2004 से 2014 तक सत्ता में रही तो राहुल मंत्री नहीं बने और कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हुई तो नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक भी जीत नहीं हासिल कर पाई.

राहुल मंत्री अपनी इच्छा से नहीं बने थे और नेता प्रतिपक्ष बनने भर उनके पास सांसद नहीं थे.

ये भी पढ़ें:-

अटल बिहारी वाजपेयी

इमेज स्रोत, Getty Images

वाजपेयी का सीधा सामना सोनिया गांधी ने किया था और अब राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का सीधा सामना कर रहे हैं.

कहा जा रहा है कि कांग्रेस अभी अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रही है और इसी मुश्किल से निकालने के लिए राहुल ने सात सितंबर 2022 से कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'भारत जोड़ो यात्रा' की शुरुआत की है.

राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' नौ राज्यों से होते हुए दिल्ली पहुँची.

इसी यात्रा के क्रम में राहुल ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर जाकर श्रद्धांजलि दी थी. राहुल ने वाजपेयी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की समाधि पर भी श्रद्धांजलि अर्पित की थी.

हालांकि वाजपेयी की समाधि पर राहुल गांधी के जाने की चर्चा ज़्यादा हो रही है.

कई लोग इसे राहुल की राजनीति में विरोधाभास से जोड़कर देख रहे हैं तो कई लोग उनकी समझदारी के रूप में भी देख रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं कि इसमें राहुल की राजनीति का विरोधाभास और उनकी समझदारी दोनों देख सकते हैं.

राहुल गांधी
getty
मेरी माँ मेरे कमरे में आईं और पास बैठकर रोने लगीं. वह मानती हैं कि जिस सत्ता को पाने के लिए लोग बेताब हैं, वह दरअसल, ज़हर है.
राहुल गांधी
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष

किदवई कहते हैं, ''2019 में शिव सेना के उद्धव ठाकरे कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने. ये वही शिव सेना है जो सावरकर के हिन्दुत्व की राह पर चलने की बात करती है. दूसरी तरफ़ राहुल गांधी सावरकर को आड़े हाथों लेने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते हैं.

राहुल गांधी सावरकर को माफ़ीवीर कहते हैं. अटल बिहारी वाजपेयी भी सावरकर को उसी रूप में देखते थे, जैसे मोदी देखते हैं. इस रूप में देखें तो लगता है कि यह राहुल की राजनीति का विरोधाभास है.''

'भारत जोड़ो यात्रा' में शामिल जाने-माने राजनीतिक ऐक्टिविस्ट योगेंद्र यादव से पूछा कि वह राहुल के अटल की समाधि पर जाने को कैसे देखते हैं?

योगेंद्र यादव कहते हैं, ''राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' के ज़रिए जो संदेश देना चाहते हैं, अटल जी की समाधि पर जाना उसी का हिस्सा है. मैं इसमें कोई विरोधाभास नहीं देखता हूँ. राहुल ने कहा है कि वह नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान खोल रहे हैं.

राहुल कहते भी रहे हैं कि वह वैचारिक विरोध को व्यक्तिगत नफ़रत या दुश्मनी की तरह नहीं लेते हैं. राहुल धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और आधुनिक मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध हैं. मैं उन्हें क़रीब से देख रहा हूँ और मेरी समझ यही बनी है कि उनमें सत्तालोलुपता नहीं है, लेकिन सत्ता और राजनीति के ज़रिए परिवर्तन करना ज़रूर चाहते हैं.''

योगेंद्र यादव कहते हैं, ''राहुल में एक किस्म का संकल्प है. उनके घुटने में तकलीफ़ है, लेकिन 'भारत जोड़ो यात्रा' से डिगे नहीं.''

ये भी पढ़ें:-

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

वायपेयी का गांधी परिवार से रिश्ता

लेकिन रशीद किदवई इसे दूसरी तरह से भी देखते हैं.

वह कहते हैं, ''अटल बिहारी वाजपेयी का नेहरू-गांधी परिवार से संबंध कड़वाहट भरा नहीं रहा है. कई मौक़ों पर अटल बिहारी वाजपेयी ने नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की तारीफ़ की है.

अटल बिहारी वाजपेयी का वो वीडियो आज भी सोशल मीडिया पर घूमता रहता है जिसमें कह रहे हैं कि जब वो विदेश मंत्री बने तो उनके ऑफ़िस से नेहरू की तस्वीर हटा दी गई, लेकिन उन्होंने वो तस्वीर दोबारा लगवाई थी.

बांग्लादेश अलग बनाने के लिए वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की प्रशंसा की थी. राजीव गांधी की उदारता का बखान भी वाजपेयी कर चुके हैं कि कैसे उनके बीमार पड़ने पर विदेश में इलाज कराने का ऑफ़र दिया था.''

वाजपेयी ने नेहरू की तस्वीर को लेकर 1999 में संसद में कहा था, ''कांग्रेस के मित्र शायद भरोसा नहीं करेंगे. साउथ ब्लॉक में नेहरू जी का एक चित्र लगा रहता था. मैं आते-जाते देखता था. नेहरू जी के साथ सदन में नोंकझोंक भी हुआ करती थी. मैं नया था, पीछे बैठता था.

कभी-कभी बोलने के लिए तो मुझे वॉकआउट करना पड़ा था. लेकिन धीरे-धीरे मैंने जगह बनाई. जब मैं विदेश मंत्री बना तो देखा कि गलियारे से नेहरू जी की फ़ोटो ग़ायब है. मैंने पूछा कि वह चित्र कहाँ गया तो किसी ने उत्तर नहीं दिया. वो चित्र फिर से वहाँ लगा दिया गया.''

अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी भाषण में कहा था, ''ऐसा नहीं है कि नेहरू जी से मतभेद नहीं थे. मतभेद चर्चा में गंभीर रूप से उभरकर सामने आते थे. मैंने एक बार पंडित जी से कह दिया था कि आपका एक मिला-जुला व्यक्तित्व है, जिसमें चर्चिल भी हैं और चेंबरलेन भी. वो नाराज़ नहीं हुए. शाम को मुलाक़ात हुई और उन्होंने कहा कि तुम्हारा भाषण बहुत अच्छा था और हँसते हुए चले गए.''

ये भी पढ़ें:-

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

रशीद किदवई कहते हैं, ''राहुल ने उस वाजपेयी को श्रद्धांजलि दी है, जो नेहरू, इंदिरा और राजीव की तारीफ़ करते थे. दूसरी तरफ़ इमरजेंसी में वाजपेयी जेल भी गए थे. राहुल गांधी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देकर शायद यह भी बताना चाह रहे हैं कि बीजेपी को वाजपेयी ने जो दिशा दी थी वह ठीक थी और मोदी बीजेपी को ग़लत दिशा में ले जा रहे हैं.

यह बात भी सही है कि सोनिया गांधी वाजपेयी को सांप्रदायिक राजनीति के मामले में घेरती रही हैं. राहुल गांधी के वाजपेयी की समाधि पर जाने से एक संदेश यह भी गया है कि उन्हें वाजपेयी की बीजेपी स्वीकार्य है, लेकिन मोदी की बीजेपी नहीं.''

फ़रवरी 2003 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने संसद के सेंट्रल हॉल में हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर की तस्वीर का अनावरण किया था.

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के सेंट्रल हॉल में सावरकर की तस्वीर लगाने का फ़ैसला किया था. तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कलाम को पत्र लिखकर अनावरण समारोह में नहीं जाने की अपील की थी.

सावरकर गांधी की हत्या में सह-अभियुक्त बनाए गए थे. हालांकि उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था.

आईआईटी बॉम्बे में प्रोफ़ेसर रहे और इतिहास के जाने-माने अध्येता राम पुनियानी से पूछा कि राहुल गांधी संसद में कभी पीएम मोदी को अचानक गले लगा लेते हैं तो कभी वाजपेयी की समाधि पर चले जाते हैं, वह करना क्या चाहते हैं?

राम पुनियानी कहते हैं, ''राहुल गांधी बदल रहे हैं. या यूँ कहें कि वह ख़ुद को मांज रहे हैं. मोदी को गले लगाने के बाद अब बहुत आगे बढ़ गए हैं. मुझे नहीं लगता है कि मोदी को अब उस तरह से गले लगाएँगे. तब उनका शायद यह मक़सद रहा हो कि वह मोदी की विचारधारा का विरोध करते हैं, लेकिन उनसे नफ़रत नहीं करते हैं.''

प्रोफ़ेसर पुनियानी कहते हैं, ''अटल बिहारी वाजपेयी भारत के तीन बार प्रधानमंत्री बने थे. राहुल गांधी बाक़ी के दिवंगत प्रधानमंत्रियों की समाधि पर जा रहे थे तो वाजपेयी की समाधि पर भी चले गए. शायद वह दिखाना चाह रहे हैं कि उनकी राजनीति में कोई शत्रुता का भाव नहीं है.

मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि राहुल गांधी के वाजपेयी की समाधि पर जाने से उनकी सांप्रदायिक राजनीति के प्रति नरमी बरतने के संकेत हैं. मेरा मानना है कि वाजपेयी सांप्रदायिक राजनीति के बहुत ही चालाक खिलाड़ी थे. उन्होंने बीजेपी को सत्ता तब दिलाई जब बीजेपी सांप्रदायिक राजनीति की जड़ें मज़बूत करने में लगी थी.''

अटल बिहारी वाजपेयी

इमेज स्रोत, Getty Images

अटल की शख़्सियत

रशीद किदवई कहते हैं कि वाजपेयी सरकार से कांग्रेस के अच्छे संबंध थे. विपक्ष और सरकार के बीच सेतु था. लेकिन अब वो चीज़ें नहीं दिखती हैं.

किदवई कहते हैं कि 'मोदी सरकार में सत्ता केंद्रीकृत है और 'कांग्रेस मुक्त भारत' की बात की जा रही है. वाजपेयी सरकार में ऐसा नहीं था. हालाँकि वाजपेयी की सरकार गठबंधन से बनी थी और मोदी सरकार के पास पूर्ण बहुमत है. गठबंधन और पूर्ण बहुमत की सरकार के चरित्र में फ़र्क़ होता है.'

बाबरी मस्जिद विध्वंस में वाजपेयी का वह भाषण आज भी लोग याद करते हैं, जिसमें उन्होंने ज़मीन समतल करने की बात कही थी.

वाजपेयी भी कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की बात करते थे. वाजपेयी भी हिन्दू राष्ट्र की वकालत करते थे. लेकिन ये सारा कुछ गठबंधन वाली सरकार में संभव नहीं था.

2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में पूर्ण बहुमत से सरकार बनी तभी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा और अयोध्या में विवादित ज़मीन पर राम मंदिर भी बन रहा है. लेकिन इसके साथ ही वाजपेयी का एक दूसरा चेहरा भी था.

वह पाकिस्तान से शांति समझौते के लिए बस से 1999 में लाहौर गए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'आप दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते.'

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

वाजपेयी जब लाहौर गए थे तब उनके साथ दिग्गज पत्रकार कुलदीप नैयर भी थे.

कुलदीप नैयर ने अपनी आख़िरी किताब 'ऑन लीडर्स एंड आइकन्स: फ़्रॉम जिन्ना टू मोदी' में लिखा है कि वाजपेयी को इस बात का आभास था कि उनके पाकिस्तान दौरे को भारत में लोग सकारात्मक रूप में नहीं लेंगे. लाहौर में भी वाजपेयी के दौरे का जमात-ए-इस्लामी ने विरोध किया था. यहाँ तक कि वाजपेयी के काफ़िले की गाड़ियों पर पत्थर भी फेंके गए थे.

2002 में जब गुजरात में भीषण दंगे हुए थे तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे.

तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे और वाजपेयी ने उन्हें राजधर्म पालन करने की नसीहत सार्वजनिक रूप से दी थी. कहा जाता है कि वाजपेयी नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी अड़ गए थे.

राम पुनियानी कहते हैं कि 'हम राजनीति को सफ़ेद या काले की तरह देखेंगे तो जड़ता को तोड़ नहीं पाएंगे और भारत जैसे विविधतापर्ण देश में तो यह राजनीति चल भी नहीं सकती है.'

वह कहते हैं, ''आडवाणी और बीजेपी तो मोहम्मद अली जिन्ना को देश बाँटने का गुनहगार मानते हैं, लेकिन आडवाणी बीजेपी प्रमुख रहते हुए 2005 में जिन्ना की मज़ार पर गए थे और उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.

आडवाणी ने जिन्ना को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें सेक्युलर और हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत बताया था. ये अलग बात है कि इसके बाद आडवाणी बीजेपी में किनारे हो गए.''

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

राहुल की दुविधा?

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह को लगता है कि राहुल गांधी का अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर जाना उनकी कन्फ़्यूज़ राजनीति का नतीजा है.

प्रदीप सिंह कहते हैं, ''कांग्रेसी अटल को अंग्रेज़ परस्त कहते हैं. सांप्रदायिक कहते हैं. फिर अचानक से पता चलता है कि राहुल गांधी अटल की समाधि पर श्रद्धांजलि देने पहुँच गए हैं.

इसी तरह संसद में उन्होंने प्रधानमंत्री को अचानक गले लगा लिया था. वह तो बहुत ही असहज करने वाली स्थिति थी. कोई पद नहीं लेंगे, लेकिन फ़ैसले सारे लेंगे वाली राजनीति से राहुल गांधी को दूर होने की ज़रूरत है.''

प्रदीप सिंह को लगता है कि राहुल गांधी का अटल की समाधि पर जाना उनकी गंभीर राजनीति को नहीं दर्शाता है.

नई दिल्ली स्थित अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि 'सदैव अटल' पर जाने से एक दिन पहले ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी यानी एआईसीसी के समन्वयक गौरव पांधी ने ट्वीट कर अटल बिहारी वाजपेयी को अंग्रेज़ों का मुखबिर बताया था.

गौरव पांधी ने अपने ट्वीट में लिखा था, ''1942 में आरएसएस के सभी सदस्यों की तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 'भारत छोड़ो आंदोलन' का बहिष्कार किया था. जो इस आंदोलन में शामिल थे उनके ख़िलाफ़ वाजपेयी ने अंग्रेज़ों के लिए मुखबिर का काम किया था. बाबरी मस्जिद विध्वंस में भी अटल बिहारी वाजपेयी ने भीड़ को उकसाया था.''

गौरव की इस टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ था तो उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया. कहा जाता है कि कांग्रेस शुरू से एक ऐसी पार्टी है, जिसके भीतर धुर वामपंथी, दक्षिणपंथी और समाजवादी भी रहे हैं.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

नेहरू ने अपनी कैबिनेट में हिन्दू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी शामिल किया था.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी और बाद में यही जनसंघ बीजेपी में तब्दील हो गया था. 2019 में शिव सेना को जब कांग्रेस ने समर्थन किया था तो इसे भी कांग्रेस के अतीत से जोड़ा गया था.

शिव सेना उन पार्टियों में से थी जिसने 1975 में इंदिरा गांधी की आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया था. तब शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने इसे देश हित में बताया था.

आपातकाल के दो साल बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ था और इसमें न तो शिव सेना को और न ही कांग्रेस को बहुमत मिला था. इन दोनों से जनता पार्टी की ज़्यादा सीटें थीं.

बाल ठाकरे ने तब कांग्रेस के मुरली देवड़ा का समर्थन किया था और वही मुंबई के मेयर बने थे.

1980 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को शिव सेना का समर्थन मिला था. इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि मुंबई में ट्रेड यूनियन की राजनीति को ख़त्म करने के लिए इंदिरा गांधी ने शिव सेना को बढ़ावा दिया था.

सोनिया गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

सत्ता ज़हर

राहुल गांधी जब राजनीति में आए तो उनकी छवि अनिच्छुक नेता के तौर पर मीडिया में बनी.

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी आत्मकथा 'वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़' में दावा किया था कि राहुल गांधी ने ही सोनिया गांधी को 2004 में प्रधानमंत्री बनने से रोका था.

नटवर सिंह के मुताबिक़, राहुल गांधी को डर था कि उनकी माँ की भी हत्या हो सकती है.

जनवरी, 2013 में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक जयपुर में हुई थी. इसी बैठक में राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया था.

उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने एआईसीसी की बैठक को संबोधित करते हुए कहा था, ''बीती रात आप सबने मुझे बधाई दी. लेकिन मेरी माँ मेरे कमरे में आईं और पास बैठकर रोने लगीं. वह मानती हैं कि जिस सत्ता को पाने के लिए लोग बेताब हैं, वह दरअसल, ज़हर है.

मेरी दादी को उनके सुरक्षाकर्मियों ने ही मार दिया, जिन्हें दोस्त समझकर मैं बैडमिंटन खेला करता था. मेरे पिता के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने लोगों के जीवन में उम्मीद जगाई थी. हमें सत्ता के पीछे नहीं भागना है बल्कि लोगों के बीच सत्ता को ले जाना है.''

राहुल गांधी 52 साल के हो गए हैं. पार्टी की कमान छोड़ चुके हैं. पार्टी की कमान लंबे समय बाद ग़ैर गांधी-नेहरू परिवार के व्यक्ति के पास है.

ख़ुद महज़ एक लोकसभा सांसद हैं. अभी 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ''मैंने राहुल गांधी को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब मैं वो राहुल गांधी नहीं हूँ.''

लेकिन राहुल जब 26 दिसंबर को वाजपेयी की समाधि पर गए तो उन्हें लोगों ने नेहरू-गांधी परिवार के वारिस के तौर पर ही देखा.

पहचान की राजनीति के दौर में राहुल अपनी पहचान से पीछा छुड़ाने की बात क्यों कर रहे हैं?

'भारत जोड़ो यात्रा' में शामिल जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और कई आंदोलनों से जुड़े रहे योगेंद्र यादव कहते हैं कि 'जो अपनी पुश्तैनी पहचान छोड़ता है, बड़ी पहचान बनाता है.'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)