मोरबी हादसे के एक महीने, कुछ अहम सवालों के जवाब

इमेज स्रोत, BIPIN TANKARIA
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात के मोरबी में बने सस्पेंशन ब्रिज पर हादसे को एक महीना हो गया है. 30 अक्टूबर 2022 (रविवार) की शाम को हुए इस हादसे में क़रीब 141 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हुए थे.
इस मामले में पुल की मरम्मत करने वाली एजेंसी के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज किया गया है.
राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए एक पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति भी बनाई है.
सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत और रख-रखाव का काम मोरबी के औद्योगिक घराने ओरेवा ग्रुप को सौंपा गया था. यह समूह अजंता ब्रांड की घड़ियों का निर्माण करता है. ओरेवा ग्रुप के प्रमुख जयसुखभाई पटेल हैं.
इस मामले में अब तक कई नई जानकारियां सामने आई हैं और कुछ सवालों के जवाब मिले हैं. हालांकि, कई जवाब अब भी अनसुलझे हैं.
ऐसे ही कुछ सवालों और नई जानकारियों पर एक नज़र-

इमेज स्रोत, Ani
कहां चल रही मामले की सुनवाई?
इस मामले की सुनवाई मोरबी में सेशन कोर्ट या ज़िला अदालत में चल रही है. साथ ही गुजरात हाई कोर्ट ने भी इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया है.
सेशन कोर्ट में सरकारी वकील ने फ़ोरेंसिक जांच की रिपोर्ट भी पेश की है.
वहीं, कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में भी दायर की गई थीं.
इन याचिकाओं में हादसे के कारणों की जांच सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अगुवाई में कराने, सीबीआई जांच और हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों को ज़्यादा मुआवज़ा देने की मांगें शामिल थीं.
ये भी पढ़ें:-मोरबी हादसाः समय से पहले ही क्यों खोल दिया गया पुल?

इमेज स्रोत, Getty Images
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 21 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान इस हादसे को 'बड़ी त्रासदी' बताया था. लेकिन, ये देखते हुए कि गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान ले लिया है, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया.
हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को इस मामले पर हाई कोर्ट जाने की अनुमति दे दी. कोर्ट ने याचिककर्ता की ओर से उपस्थित वकील के उठाए कुछ मसलों पर गुजरात हाई कोर्ट को ध्यान देने के भी सलाह दी. इनमें मसलों में शामिल था-
- इस आपराधिक कृत्य की जांच के लिए स्वतंत्र जांच.
- नगर पालिका के अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय करने की ज़रूरत.
- पुल की मरम्मत और रखरखाव कर रही एजेंसी की ज़िम्मेदारी तय करना.
- हादसे में जान गवां चुके लोगों के परिजनों को उपयुक्त मुआवज़ा देना.

इमेज स्रोत, RAJESH AMBALIA/BBC
सरकारी वकील ने कोर्ट में क्या बताया?
फ़ोरेसिंक साइंस लैब की रिपोर्ट के हवाले से सरकारी वकील एचएस पंचाल ने सेशन कोर्ट में पुल गिरने की वजह बताई.
उन्होंने कहा कि फ़ोरेसिंक एक्सपर्ट के मुताबिक़ पुल नई फ़्लोरिंग का भार नहीं सह सका और उसके केबल टूट गए.
पंचाल ने अदालत के बाहर पत्रकारों को बताया, "हालांकि फ़ोरेंसिक रिपोर्ट बंद लिफ़ाफ़े में अदालत को सौंपी गई है, लेकिन रिमांड की अर्ज़ी में ये लिखा गया है कि ब्रिज की केबलों को नहीं बदला गया था. सिर्फ़ फ़्लोरिंग ही बदली गई थी."
"चार लेयर वाली एल्युमिनियम की चादरों से फ़्लोर को बनाया गया था. इसका वज़न इतना बढ़ गया कि पुल को थामे रखने वाली केबल इसका भार नहीं सह पाई और पुल गिर गया."
अदालत को ये भी बताया गया कि जिन ठेकेदारों को रिपेयर का काम दिया गया था वे इसे करने के लिए योग्य नहीं थे.
सरकारी वकील ने सेशन कोर्ट को बताया कि 30 अक्टूबर को पुल पर जाने के लिए क़रीब 3,165 टिकट जारी किए गए थे.
हालांकि, सभी टिकट नहीं बिके पर कंपनी ने पुल की क्षमता को लेकर कोई जायज़ा नहीं लिया था.

इमेज स्रोत, ANI
ओरेवा कंपनी को कैसे मिला मरम्मत का काम?
ओरेवा कंपनी को पुल की मरम्मत और रखरखाव की ज़िम्मेदारी दिए जाने के तरीक़े पर भी सवाल उठ रहे हैं.
मरम्मत और रखरखाव को लेकर कंपनी और नगर पालिका के बीच अनुबंध भी हुआ था.
लेकिन, इस काम को लेकर कोई निविदा नहीं निकाली गई थी. अमूमन सरकारी प्रोजेक्ट या काम निविदा के माध्यम से ही आवंटित किए जाते हैं.
गुजरात हाई कोर्ट ने 15 नवंबर को हुई सुनवाई में पूछा था कि ओरेवा ग्रुप को बिना टेंडर के इस पुल की मरम्मत की ज़िम्मेदारी कैसे दे दी गई.
कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया स्थानीय नगर पालिका की चूक के कारण ये दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई है. कैसे एक कंपनी पर इतने महत्वपूर्ण कार्य के लिए निविदा जारी किए बिना प्रशासन ने इतनी मेहरबानी दिखा दी.
कोर्ट ने कहा कि स्थानीय निकाय की ओर से इस तरह की लापरवाही निंदनीय है.
कोर्ट ने पूछा कि साल 2008 को हुए अनुबंध के साल 2017 में ख़त्म होने के बाद निविदा निकालने के लिए क्या कोई क़दम उठाए गए थे.
दरअसल, ये अनुबंध ख़त्म होने के बाद 2017 से 2022 तक पुल की मरम्मत का काम बिना किसी अनुबंध के ओरेवा कंपनी के ही पास था.
हालांकि, मार्च 2022 को इस पुल को मरम्मत के लिए सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए बंद कर दिया गया था.
कंपनी ने साल 2020 में कई बार ज़िला कलेक्टर को ये भी सूचित किया था कि अनुबंध के बिना वो सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत शुरू नहीं करेगी.
नगर पालिका के साथ टिकट की रक़म को लेकर भी कंपनी का विवाद चल रहा था.
ओरेवा ग्रुप ने साल 2020 में एक बार फिर से कॉन्ट्रैक्ट पाने के लिए आवेदन किया जिसे कोरोना महामारी के कमज़ोर पड़ने के बाद इसी साल मार्च में नगरपालिका ने स्वीकार कर लिया.

इमेज स्रोत, Ani
समय से पहले क्यों खुला पुल?
समझौते की तारीख से इस पुल को 8 से 12 महीनों में खोला जाना था. इस बीच इसकी मरम्मत होनी थी, लेकिन पुल को सात महीनों में ही खोल दिया गया.
हादसे से चार दिन पहले दिवाली के त्योहार के दौरान ये पुल लोगों के लिए खोल गया था. पुल पर जाने के लिए लोगों को टिकट दी जाती थी.
कंपनी के साथ हुए अनुबंध में कुल नौ बिंदु हैं जिसमें टिकट की यह दर भी शामिल है. हालांकि, अनुबंध में टिकट के अलावा किसी भी मुद्दे को विस्तार से नहीं बताया गया है और न ही कोई शर्त रखी गई है.
अनुबंध के चौथे बिंदु में लिखा है, "इस समझौते के साथ, पुल को ओरेवा समूह द्वारा ठीक से पुनर्निर्मित कर जनता के लिए खोल दिया जाएगा. इस में समझौते की तारीख़ से लगभग 8 से 12 महीने लगेंगे."
लेकिन इस समझौते के सातवें महीने में ही पुल खोल दिया गया.

इमेज स्रोत, BIPIN TANKARIA
समझौते की ख़ामियां
मोरबी के ऐतिहासिक सस्पेंशन ब्रिज की मरम्मत और रखरखाव का काम मोरबी के औद्योगिक घराने ओरेवा ग्रुप को सौंपा गया था. यह समूह अजंता ब्रांड की घड़ियों का निर्माण करता है. इसके अलावा बल्ब, लाइटें और घरेलू इस्तेमाल के अन्य उपकरण भी बनाता है.
इस समूह और मोरबी नगरपालिका के बीच 300 रुपये के स्टांप पेपर पर अनुबंध हुआ है
इस चार पेज के अनुबंध में टिकट दरों के लिए जितना विवरण दिया है, उतनी स्पष्टता पुल के रख-रखाव की शर्तों के लिए नहीं मिलती है.
समझौते के मुताबिक़, दोनों पक्षों में, "पुल के प्रबंधन जैसे कि ओ एंड एम (ऑपरेशन और मेंटेनेंस), सुरक्षा, सफ़ाई, रखरखाव, भुगतान संग्रह, स्टाफ़िंग आदि का अनुबंध हुआ है."
एग्रीमेन्ट में कलेक्टर, नगर पालिका और ओरेवा समूह द्वारा पुल पर जाने की दर और 2027-28 तक उन दरों मे वार्षिक कितनी बढ़ोतरी की जाएगी, उसका विवरण भी दिया गया है.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
इसके अनुसार, वर्तमान टिकट दर 15 रुपए है जिसे वर्ष 2027-28 तक इसे 25 रुपये तक बढ़ाया जाना है. इस समझौते में यह भी लिखा गया है कि वर्ष 2027-28 के बाद प्रवेश शुल्क में हर साल दो रुपये की वृद्धि होगी.
अनुबंध में कुल नौ बिंदु हैं जिसमें टिकट की यह दर भी शामिल है. हालांकि, अनुबंध में टिकट के अलावा किसी भी मुद्दे को विस्तार से नहीं बताया गया है और न ही कोई शर्त रखी गई है.
समझौते के तीसरे खंड में एक वाक्य में कहा गया है कि ''पुल की मरम्मत और उसे चालू करने का सभी खर्च अजंता मैन्युफै़क्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड (ओरेवा ग्रुप) द्वारा वहन किया जाएगा."
पुल की मरम्मत की क्या ज़रूरतें हैं और इसकी मरम्मत कैसे की जाएगी, इस बारे में कोई विवरण नहीं है.
सातवां बिंदु यह निर्धारित करता है कि पुल के राजस्व और व्यय का भुगतान समझौते की अवधि के दौरान ओरेवा समूह को किया जाएगा.

इमेज स्रोत, Ani
क्या मिला था फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट?
इस हादसे के बाद पुल के फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट को लेकर भी सवाल उठने लगे थे. पुल खोलने से पहले फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट नहीं लिया गया था बल्कि ये पुल तय समय से पहले ही खोल दिया गया था.
मोरबी नगर निगम के चीफ़ ऑफ़िसर ने अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि 'पुल को मरम्मत के बाद फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि अभी तक यहां सेफ़्टी ऑडिट नहीं हो सका था.'
हादसे के कारण का ज़िक्र करते हुए उन्होंने अख़बार को ये भी बताया कि 'ओरेवा ग्रुप ने नगर निगम को ये जानकारी नहीं दी कि पुल 26 अक्टूबर से दोबारा खोला जा रहा है.'
अख़बार ने चीफ़ ऑफ़िसर से पूछा कि पुल खोलने को लेकर निगम की ओर से क्या कंपनी को कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था या फिर फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट मिलने तक यहाँ पर्यटकों की एंट्री पर रोक लगाने जैसा कोई आदेश जारी हुआ था.
इस पर उन्होंने कहा, "हमारे पास समय ही नहीं था. वो सिर्फ़ दो दिन पहले ही खुला था. हमें इस तरह की कार्रवाई करने का मौका ही नहीं मिला."

इमेज स्रोत, ANI
जांच में अब तक क्या-क्या मिला?
इस मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है. गुजरात के गृह मंत्री हर्ष सांघवी ने इसकी घोषणा की थी.
वहीं, पुलिस भी अपने स्तर से मामले की जांच कर रही है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक शुरुआती फोरेंसिक जांच में पाया गया है कि पुल की केबल्स पर जंग लगी थी, एंकर पिन टूटे हुए थे और नट-बोल्ट ढीले थे.
पुल की मरम्मत के दौरान इन बातों पर ध्यान नहीं दिया गया. वहीं, मरम्मत में लगाई गई मेटल की नई फ्लोरिंग के बाद भी पुल का वजन बढ़ गया.
वहीं, जांच आयोग इस मामले में ये भी पता लगाएगा कि मरम्मत के दौरान पुराने केबल ही इस्तेमाल किए गए थे या नए केबल लगाए गए थे. अगर केबल पुराने थे तो उनकी भार उठाने की क्षमता कितनी थी. साथ ही पुल के डिज़ाइन की जांच भी की जाएगी.
ये भी पता लगाया जाएगा कि पुल का मुआयना हुआ था या नहीं. पुल के निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता को भी परखा जाएगा.
ये भी पता लगाया जाना है कि क्या तीसरे पक्ष के स्ट्रक्चरल इंजीनियरों ने पुल का मुआयना किया था या नहीं.

इमेज स्रोत, BIPIN TANKARIA
म्युनिसिपल चीफ़ ऑफ़िसर संदीप सिंह झाला ने बीबीसी गुजराती को बताया था, "सात मार्च को हुए कॉन्ट्रेक्ट में ओरेवा ग्रुप को 15 साल के लिए इस ब्रिज के मेंटेनेंस और रेनोवेशन के लिए दिया गया था. इसके आधार पर ब्रिज का रेनोवेशन किया गया. नवीनीकरण पूरा होने पर, मंज़ूरी के साथ सभी दस्तावेज़ जमा कर इस पुल को खोलना होगा."
उन्होंने आगे कहा, "इस पुल पर हमेशा 20-25 के जत्थे में लोगों को भेजा जाना था. अब उन्होंने जीर्णोद्धार के लिए किस सामग्री का इस्तेमाल किया? इसकी भारवहन क्षमता क्या थी? यह जांच का विषय है. इसके लिए एक जांच आयोग है."
वहीं, राज्य के मानवाधिकार आयोग ने हाई कोर्ट को बताया है कि आयोग के अध्यक्ष और एक सदस्य इस हादसे के प्रभावों की जांच कर रहे हैं.
आयोग ये भी देख रहा है कि परिवारों को मुआवज़ा दिया जा रहा है या नहीं.
इस मामले में सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो लाख और घायलों को 50 हज़ार रुपये मुआवजा देने की घोषणा की थी.

इमेज स्रोत, Getty Images
30 अक्टूबर का वो दिन और हादसा...
मच्छु नदी पर बना ये मोरबी पुल स्थानीय लोगों के बीच एक आर्कषक पर्यटन स्थल था.
आसपास के इलाक़ों से कई लोग इसे देखने के लिए जमा हुए थे. इस पुल को दिवाली की छुट्टियों के कारण खोला गया था और बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आए थे. बताया गया था कि हादसे के समय पुल पर करीब 500 लोग थे.
30 अक्टूबर की शाम को जब लोग पुल पर खड़े थे तो पुल अचानक टूटकर गिर गया. कई लोग मच्छु नदी में गिर गए तो कई नदी के पार ज़मीन पर गिरे. कई लोगों ने पुल से लटककर अपनी जान बचाई.
रात भर लोगों को पानी से बाहर निकालने का काम चलता रहा. नदी में मौजूद शवों को बाहर निकालने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. इस हादसे में कई बच्चों की भी जान चली गई.
बचाव कार्य में विभिन्न बलों के 200 से अधिक कर्मियों ने काम किया.
शुरुआती दौर में कहा गया कि पुल पर लोगों की संख्या ज़रूरत से ज़्यादा होने के चलते पुल भार सहन नहीं कर पाया और गिर गया.
लेकिन, बाद में पुल की मरम्मत में ही गड़बड़ियां होने की बात भी सामने आई जिससे मरम्मत के लिए हुए अनुबंध और फिटनेस सर्टिफिकेट को लेकर सवाल उठने लगे थे.
पुल टूटने के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, गृह मंत्री हर्ष सांघवी मोरबी पहुंचे.
इस हादसे के एक दिन बाद एक नवंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने मोरबी के पुल का दौरा किया था.
उन्होंने काफ़ी देर तक घटनास्थल पर खड़े रहकर बेहद बारीकी से हादसे के बारे में पूरी जानकारी ली. पुल का जायज़ा लेने के बाद वो घायलों से मिलने अस्पताल भी गए.

इमेज स्रोत, ANI
कौन-कौन गिरफ़्तार?
इस मामले में पुलिस नौ लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है. इनमें ओरेवा कंपनी के मैनेजर भी शामिल हैं.
गिरफ़्तार हुए लोगों में ओरेवा कंपनी के प्रबंधक दीपक नवीनचंद्र पारेख और दिनेश मनसुख दवे, टिकट कलेक्टर मनसुख वालजी टोपिया और मदार लखभाई सोलंकी, ब्रिज कॉन्ट्रैक्टर लालजी परमार और देवांग परमार शामिल हैं.
इनके अलावा पुलिस ने तीन सुरक्षा गार्डों को भी गिरफ़्तार किया है जिनके नाम मुकेशभाई चौहान और दिलीप गोहिल हैं.

ओरेवा ग्रुप ने हादसे पर क्या कहा?
इन सवालों को लेकर ओरेवा ग्रुप के प्रमुख जयसुखभाई पटेल ने कहा, "ये लगभग 150 साल पुराना सस्पेंशन ब्रिज है जो मोरबी के राजा के समय का है. इसे रख-रखाव, संचालन और सुरक्षा के लिए 15 साल के लिए हमारी कंपनी को सौंपा गया. सरकार और मोरबी नगरपालिका के बीच चार पन्नों के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं."
जयसुखभाई ने कहा, "ये सस्पेंशन ब्रिज मोरबी की पहचान है. पिछले छह महीने से ये मरम्मत के लिए बंद था. इसे बैठक के दिन जनता के लिए खोल दिया गया था."
उन्होंने कहा, "चूंकि ये एक लटकता हुआ पुल है, इसलिए इसकी मरम्मत के लिए विशेष कंपनी की मदद ली गई. इसकी ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए प्रकाशभाई की मदद ली गई जिन्होंने साल 2007 में भूकंप के बाद इस पुल के क्षतिग्रस्त होने के बाद भी मरम्मत का काम किया था."
"इस बार क़रीब दो करोड़ रुपये की लागत से इसकी पूरी तरह मरम्मत की गई थी."

इमेज स्रोत, GUJARATTOURISM
सस्पेंशन ब्रिज का इतिहास
1879 में बनकर तैयार हुआ ये सस्पेंशन पुल उस दौर में इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण था. लेकिन अब 143 साल बाद ये एक बड़े हादसे का कारण बन गया.
यह पुल 1.25 मीटर चौड़ा और 233 मीटर लंबा था.
केबल की तारों से लटके इस तरह के पुलों को झूला पुल भी कहा जाता है. इंजीनियरिंग की भाषा में इन्हें सस्पेंशन ब्रिज कहा जाता है.
इस तरह के पुल किसी आधार पर टिके होने के बजाए केबल के सहारे तोनों तरफ़ मज़बूत आधार से लटके होते हैं.
ऋषिकेश के लक्ष्मणझूला और रामझूला पुल सस्पेंशन ब्रिज के चर्चित उदाहरण हैं. रोज़ाना हज़ारों पर्यटक यहां से गुज़रते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















