मोरबी हादसा: ओरेवा ग्रुप को सिर्फ़ इस बात के लिए थी प्रशासन की इजाज़त की ज़रूरत- प्रेस रिव्यू

मोरबी हादसा

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रविवार को गुजरात के मोरबी नदी में पुल गिरने के मामले में पुलिस ने ओरेवा ग्रुप के दो मैनेजरों को गिरफ़्तार किया है. इसके बाद से ही मोरबी नगर निगम और पुल का रख-रखाव कर रही कंपनी के बीच हुए समझौते पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

लेकिन अख़बार 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी पड़ताल में पाया है कि कंपनी इस ब्रिज के काम को साल 2008 से देख रही है. हादसे में अब तक 134 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है.

ओरेवा ग्रुप की प्रमुख कंपनी अजंता मैन्यूफ़ैक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड और मोरबी नगर निगम के बीच हुए ताज़ा समझौते के तहत अब कंपनी को अगले 15 सालों के लिए पुल के रख-रखाव की पूरी ज़िम्मेदारी दे दी गई थी. इसमें पुल का संचालन और देख-रेख, सुरक्षा, टिकट व्यवस्था, सफ़ाई और यहाँ तक कि कर्मचारियों की तैनाती भी शामिल है.

अख़बार कहता है कि नए समझौते के अनुसार, साल 2027-2028 के बाद ही ये कंपनी टिकट के दाम हर साल 2 रुपये के हिसाब से बढ़ा सकती थी. फिलहाल व्यस्कों के लिए टिकट की कीमत 15 रुपये प्रति व्यक्ति है.

765 फुट लंबे इस पुल में सुरक्षा के लिए छह फुट की चेनलिंक्ड जालियां भी थीं. इस साल 7 मार्च को हुए समझौते के बाद कई महीनों तक ये पुल पर्यटकों के लिए बंद रहा क्योंकि ओरेवा ग्रुप इसके नवीनीकरण का काम कर रहा था.

इंडियन एक्सप्रेस ने समझौते की कॉपी के हवाले से लिखा है कि कंपनी को अगर किसी चीज़ के लिए मोरबी ज़िला अधिकारी और नगर निगम की हरी झंडी की ज़रूरत थी, तो वो है टिकट के दाम.

हालांकि, इस समझौते में एक समय पर पुल पर अधिकतम लोगों की सीमा का ज़िक्र नहीं है. ओरेवा ग्रुप को कॉन्ट्रैक्ट की पूरी अवधि के लिए "व्यावसायिक गतिविधियां और ब्रांडिंग" करने की छूट दी गई है.

मोरबी मगर निगम के चीफ़ ऑफ़िसर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पुल को मरम्मत के बाद फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट इसलिए नहीं दिया गया था क्योंकि अभी तक यहां सेफ़्टी ऑडिट नहीं हो सका था. हादसे के कारण का ज़िक्र करते हुए उन्होंने अख़बार को ये भी बताया कि ओरेवा ग्रुप ने नगर निगम को ये जानकारी नहीं दी कि पुल 26 अक्टूबर से दोबारा खोला जा रहा है.

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इमेज कैप्शन, पुल हादसे के मामले में पुलिस ने नौ लोगों को हिरासत में लिया

अख़बार ने चीफ़ ऑफ़िसर से पूछा कि पुल खोलने को लेकर निगम की ओर से क्या कंपनी को कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था या फिर फ़िटनेस सर्टिफ़िकेट मिलने तक यहाँ पर्यटकों की एंट्री पर रोक लगाने जैसा कोई आदेश जारी हुआ.

इस पर उन्होंने कहा, "हमारे पास समय ही नहीं था. वो सिर्फ़ दो दिन पहले ही ख़ुला था. हमें इस तरह की कार्रवाई करने का मौका ही नहीं मिला."

नगर निगम का क्या कहना है?

नगर निगम की अध्यक्ष कुसुम परमार ने अख़बार को बताया, "हमने पूरा पुल ही ओरेवा ग्रुप को सौंप दिया था, इसलिए पर्यटकों की सुरक्षा का ज़िम्मा भी उन्हीं का था. ब्रिज की देखरेख और संचालन के लिए समझौता करने को वो हमारे पास आए थे."

अख़बार के अनुसार समझौते में साफ़-साफ़ लिखा है कि पुल से होने वाली 'आमदनी-खर्चा' दोनों ही ओरेवा ग्रुप का होगा और सरकार, बाहर, नगरपालिका या किसी भी अन्य इकाई का इसमें कोई दखल नहीं रहेगा.

अख़बार के अनुसार, पुल की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए कंपनी को समझौते के बाद इसे खोलने के लिए करीब 10 महीने का समय दिया गया था लेकिन ये केवल सात महीने में ही खुल गया.

कंपनी ने क्या कहा?

ओरेवा ग्रुप के प्रबंधकों में से एक दीपक पारेख ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, "फिलहाल हादसे से जुड़ी जानकारी का इंतज़ार किया जा रहा है लेकिन पहली नज़र में ऐसा लग रहा है कि ये पुल इसलिए गिरा क्योंकि एक समय पर बहुत सारे लोग इसके बीचोंबीच जाकर पुल को एक ओर से दूसरी ओर झुलाने की कोशिश कर रहे थे."

ओरेवा ग्रुप पहली बार इस पुल का रख-रखाव नहीं देख रहा था.

अख़बार के अनुसार, साल 2008 से 2018 के बीच भी कंपनी के पास पुल के देखरेख का कॉन्ट्रैक्ट था. हालांकि, कंपनी ने टिकट के दामों पर नगरपालिका से मतभेदों की वजह से समझौते को रिन्यू कराने के लिए आवेदन नहीं दिया. हालांकि, नगरपालिका का कहना है कि नया समझौता होने से पहले भी ओरेवा ग्रुप ही 2018 से 2022 के बीच भी पुल का रख-रखाव करती रही.

ओरेवा ग्रुप ने साल 2020 में एक बार फिर से कॉन्ट्रैक्ट पाने के लिए आवेदन किया, जिसे कोरोना महामारी के कमज़ोर पड़ने के बाद इसी साल मार्च में नगरपालिका ने स्वीकार किया.

गुजरात के दो ज़िलों में अल्पसंख्यक शरणार्थियों को मिलेगी नागरिकता, MHA का आदेश

गृह मंत्रालय

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केंद्र सरकार ने सोमवार को अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले और वर्तमान में गुजरात के दो ज़िलों में रह रहे हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता कानून, 1955 के तहत भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया है.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के अनुसार, इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुजरात के मेहसाणा और आणंद ज़िलों के अधिकारियों को निर्देश भी दे दिया है.

अख़बार के अनुसार, ये पहली बार नहीं है जब ज़िला अधिकारियों को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से ये शक्ति दी गई हो. इससे पहले साल 2016, 2018 और 2021 में भी मंत्रालय भारत में वैध दस्तावेज़ों के साथ आए छह समुदायों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के लिए इस तरह के आदेश जारी कर चुका है. नागरिकता देना केंद्र सरकार के अधीन आने वाला विषय है और गृह मंत्रालय समय-समय पर अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करता रहा है.

हालांकि, इस संबंध में अधिसूचना विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के बजाय नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जारी की गई है. सीएए भी तक देश में लागू नहीं हुआ है.

साल 2019 में पास हुआ सीएए 31 दिसंबर, 2014 तक भारत मे आने वाले छह अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नागरिकता देने की बात करता है.

गृह मंत्रालय की ओर से 31 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान से हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के वैध शरणार्थियों को लाभ देने की बात कही गई है. ये अधिसूचना उन लोगों के लिए है, जो पहले ही नागरिकता कानून, 1955 के तहत नागरिकता के लिए आवेदन कर चुके हैं.

अख़बार के अनुसार सीएए लागू होने से वैध शरणार्थियों को केवल नागरिकता देने की प्रक्रिया का समय घटेगा. सीएए भारत में बिताई कुल समयावधि की सीमा को 11 साल से घटाकर पाँच साल करे देगा.

अमित शाह

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इमेज कैप्शन, गृह मंत्रा अमित शाह

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये किसी भी नागरिक के मौजूदा अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं करता है.

सरकार ने शीर्ष न्यायालय को बताया था कि सीएए कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने सीएए को चुनौती वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए अब छह दिसंबर की तारीख़ तय की है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मेंदिए राजद्रोह कानून में बदलाव के संकेत

सुप्रीम कोर्ट

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केंद्र सरकार ने सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से राजद्रोह कानून में बदलाव के लिए समय मांगा है. सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाज़त देते हुए, सुनवाई को जनवरी के दूसरे सप्ताह तक के लिए टाल दिया है.

हालाँकि, कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि इस दौरान 11 मई को दिया अंतरिम आदेश लागू रहेगा. इसके तहत राजद्रोह कानून के अंतर्गत नए केस दर्ज करने पर रोक लगाई गई थी.

अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, सुनवाई के दौरान केंद्र ने अदालत में तर्क दिया कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में राजद्रोह कानून के मामले पर कुछ फ़ैसला लिया जा सकता है.

केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने चीफ़ जस्टिस यूयू ललित के सामने कहा, "इस मामले पर विचार किया जा रहा है और संसद के शीतकालीन सत्र से पहले कुछ बदलाव हो सकते हैं...उम्मीद है कि संसद के अगले सत्र से पहले, कुछ होगा."

अख़बार के अनुसार अटॉर्नी जनरल की ओर से ये जवाब ऐसे समय में दाखिल किया गया है जब तीन दिन पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यों के गृह मंत्री के साथ हुई बैठक के दौरान कहा था कि सरकार संसद में नए सीआरपीसी और आईपीसी पर प्रस्ताव लाने की योजना बना रही है.

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