सुप्रीम कोर्ट ने कहा आईटी एक्ट की 66 A धारा में अब गिरफ़्तारी नहीं, पहले के केस रद्द हों: प्रेस रिव्यू

सुप्रीम कोर्ट

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अंग्रेज़ी अख़बार बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सूचना प्रद्यौगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट) की धारा 66A के तहत किसी भी शख़्स पर अब कार्रवाई नहीं की जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट ने सात साल पहले ही इस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था लेकिन इसके बावजूद इसके तहत लोगों पर केस दर्ज किए जाते रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार के फ़ैसले को लागू करने के दिशानिर्देश तय किए. इनके तहत सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 (A) को असंवैधानिक करार दिया गया था.

आईटी एक्ट 2000 की धारा 66 (A) के तहत किसी भी व्यक्ति के लिए कंप्यूटर या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल करके आपत्तिजनक जानकारी भेजना दंडनीय अपराध था,

इस नियम के तहत किसी व्यक्ति का ऐसी जानकारी भेजना भी दंडनीय अपराध था जिसे वह गलत मानता है. यहां तक कि अगर मैसेज से किसी को गुस्सा आए, असुविधा हो वो भी अपराध था. गुमराह करने वाले लिए ईमेल भेजना भी इस धारा के तहत दंडनीय अपराध माने गए थे.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सहित दो न्यायाधीशों की बेंच ने साल 2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के मामले में फ़ैसला सुनाते हुए आईटी एक्ट, 2000 की धारा 66A को रद्द कर दिया था.

इसके तहत प्रावधान था कि सोशल मीडिया पर 'आपत्तिजनक, उत्तेजक या भावनाएं भड़काने वाले पोस्ट' पर व्यक्ति को गिरफ्तारी किया जा सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को संविधान के अनुच्छेद 19(1) (A) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार के ख़िलाफ़ बताकर निरस्त कर दिया था.

मोबाइल फोन

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पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ संस्था ने इस मामले में याचिका दायर की थी. संस्था ने कोर्ट में दलील दी कि साल 2015 में इस एक्ट के रद्द होने के बावजूद देश भर में इस फ़ैसले को नज़रअंदाज़ करते हुए कई मामले आईटी एक्ट के 66A धारा के तहत दर्ज किए.

याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को कोर्ट के आदेश को लागू ना करने का ज़िम्मेदार बताया.

उन्होंने कहा, " केंद्र सरकार इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय और राज्यपालों के ज़रिेए इसे लागू करना सुनिश्चित कर सकती थी."

इस दलील के जवाब में केंद्र ने कहा कि "सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कराना उसकी ज़िम्मेदारी नहीं है, इसके लिए राज्यों में एक स्थानीय नियामक का गठन होना चाहिए."

चीफ़ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट की बेंच ने कहा, "ये एक गंभीर चिंता का विषय है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद कुछ राज्यों में इस धारा में केस दर्ज हो रहे हैं. ऐसे में केंद्र सरकार राज्यों के मुख्य सचिव से संपर्क करें और इस मामले में जानकारी लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन कराएं."

कोर्ट ने सुनवाई के बाद ये दिशानिर्देश जारी किए

  • यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि आईटी अधिनियम 2000 की धारा 66(A) संविधान का उल्लंघन है. उन मामलों में जहां नागरिक इस धारा के तहत आरोपों का सामना कर रहे हैं उन पर ये धारा हटा दी जाए.
  • पुलिस बल, राज्यों के गृह सचिव, केंद्र शासित प्रदेशों के अनुपालन अधिकारी धारा 66A के तहत मामला दर्ज नहीं करेंगे.
  • जिन लोगों पर कई धाराएं लगी हैं और 66A उनमें से एक है तो इस धारा को रद्द माना जाए.
  • जब भी कोई प्रकाशन, चाहे वह सरकारी, अर्ध-सरकारी या निजी हो, इस धारा के संबंध में कोई जानकारी प्रकाशित करता है तो पाठकों को सूचित किया जाना चाहिए कि धारा 66(A) को सुप्रीम कोर्ट ने असंवाधानिक घोषित किया है.
नोटबंदी

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2016 में हुई नोटबंदी की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ 8 नवंबर साल 2016 को केंद्र सरकार की ओर से 500-1000 के नोट को अवैध घोषित करने के फ़ैसले के छह साल बाद अब सुप्रीम कोर्ट इसकी जांच करेगा.

बुधवार को पांच जजों की बेंच ने तय किया कि इस फ़ैसले की और इसे लागू करने के तरीके की जांच की जाएगी.

इस याचिका का विरोध करते हुए केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि कोर्ट इस पर अपना वक़्त ज़ाया ना करे क्योंकि ये फ़ैसला अब किया जा चुका है. लेकिन इस दलील को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच करने का फ़ैसला लिया है.

जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर, बीआर गवाई, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमण्यन और बीवी नागार्थन की बेंच, पांच जजों की बेंच ने केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक को नोटिस जारी किया है, दोनों को 9 नवंबर तक यह बताने को कहा है कि किस क़ानून के तहत 1000-500 रुपए के नोटबंद किए गए थे. हलफ़नामा दायर कर ये जानकारी कोर्ट को देने को कही गई है.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रख रहे पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदंबरम ने नोटबंदी को 'बिना दिमाग़' वाली प्रक्रिया बताया और कहा कि इससे आम लोगों की बेइंतहा तकलीफ़ हुई. लोग एटीएम के बाहर लंबी क़तारों में खड़े रहे, दवाओं ज़ैसी ज़रूरी चीज़ नहीं खरीद सके, नौकरी खो दी.

उन्होंने कहा कि नोटबंदी काला धन, आतंकवाद रोकने में भी फेल ही साबित हुई.

चिदंबरम ने कोर्ट में कहा कि सरकार रिज़र्व बैंक के कहने पर नोटबंदी के फ़ैसले लेती है लेकिन यहां इसका उलटा हुआ.

" 7 नवंबर 2016 को सरकार ने रिज़र्व बैंक को एक ख़त लिखा जिसमें 500-1000 के नोट बंद करने को लेकर अनुशंसा की थी. जल्दबाज़ी में रिज़र्व बैंक के बोर्ड ने अगले दिन ही दिल्ली में मुलाकात की. सिफ़ारिश को कैबिनेट के पास भेजा गया और इसके बाद इस पर मुहर लग गई और अधिसूचना जारी कर दी गई."

एजुकेशन लोन

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बिना कोलेट्रल मिल सकता है 10 लाख का एजुकेशन लोन

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ केंद्र सरकार गारंटी एजुकेशन लोन की सीमा 7.5 लाख से बढ़ा कर 10 लाख करने वाली है.

लोन के आवेदनों की स्वीकृति और अस्वीकृति में देरी की शिकायतों के बीच सरकार चाहती है कि लोग सार्वजनिक बैंकों से ज़्यादा लोन लें इस मंशा के तहत ये क़दम उठाया जा सकता है.

अभी 7.5 लाख तक का एजुकेशन लोन लेने के लिए किसी भी तरह का कोलेट्रल यानी (संपत्ति के दस्तावेज़) नहीं देने पड़ते हैं.

द इंडियन एक्सप्रेस के मिली जानकारी के साथ वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा विभाग ने गारंटी सीमा को 33 प्रतिशत बढ़ाने पर शिक्षा मंत्रालय के साथ चर्चा शुरू कर दी है.

दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्य सरकार की योजनाओं के तहत कुल गारंटी लोन 10 लाख रुपये तक मिलता है.

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