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उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी रोज़गार मेला, क्या कह रहे हैं बेरोज़गार?
- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को फोकस में रखते हुए रोज़गार मेले की शुरुआत की है. यह भी दावा किया जा रहा है कि राज्य में पहली बार किसी सरकार ने ऐसे मेले की शुरुआत की है.
बुधवार को इसकी शुरुआत लखनऊ के जाने माने शिया पीजी कॉलेज के मैदान से हुई है और सरकार का दवा है कि वो इसी मेले की तर्ज़ पर पूरे प्रदेश के 18 अल्पसंख्यक बहुल मंडलों में रोज़गार मेलों का आयोजन करेगी.
पिछले कुछ दिनों में भाजपा, मुसलमानों में पिछड़े माने जाने वाले पसमांदा मुसलमानों को बड़ी जनसभाओं के ज़रिये पार्टी से जोड़ने की कोशिश कर रही है.
राज्य सरकार प्रदेश में हज़ारों मदरसों का सर्वे करा कर मुसलमानों को मुख्यधारा से जोड़ने के दावे कर रही है.
वैसे इस रोज़गार मेले को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों में काफ़ी उत्साह नज़र आया है.
मेले के बारे में छात्रों की राय
शिया पीजी कॉलेज में पढ़ने वाली तूबा हसन कहती हैं "ये बहुत अच्छी चीज़ है क्योंकि जिस तरह से बेरोज़गारी है, ऐसे में इस मेले की बहुत ज़रूरत है. सरकार अच्छी चीज़ें हमारे लिए कर रही है. इसके बदले में हम लोगों को भी मेहनत करनी चाहिए ताकि हम लोग इन चीज़ों के क़ाबिल हों."
तूबा हसन कहती हैं , "यह सरकार के अच्छे इरादे बताता है, उनका इरादा सच्चा है, वो अपनी ड्यूटी और सर्विस सच्चाई से कर रहे हैं."
मेले में आई छात्रा तबस्सुम कहती हैं कि उन्होंने 'अमर उजाला', 'वी वन' लिमिटेड जैसी कंपनियों में अपना सीवी दिया है.
ख़ास तौर से अल्पसंख्यक इलाके में आयोजित इस रोज़गार मेले में क्या तब्बसुम को परमानेंट नौकरी मिलने की उम्मीद है.
मेले में मौजूद अवसरों के बारे में वो कहती हैं, "यहां मिले-जुले ऑफ़र हैं. अभी फ़िलहाल कोई तय भी नहीं कर रहा है. कह रहे हैं कि आप हमारे यहां ट्रेनिंग में आइए, कोर्स करिए और उसके बाद जॉब के लिए सेलेक्शन होगा."
तबस्सुम कहती हैं, "आप देख ही सकते हैं कि यहां कितनी भीड़ है, बहुत बेरोज़गारी है. बहुत लोग आए हैं, जिनके पास नौकरी नहीं हैं."
मेले में नौकरियों की गुणवत्ता पर उठाए कुछ छात्रों ने सवाल
मेले में सबसे ज़्यादा वैकेंसी रैपिडो राइडर्स की थी. मेले के प्रवेश गेट पर मौजूद एक विशाल वैकेंसी बोर्ड के मुताबिक़ कुल 1000 लोगों की ज़रूरत थी. रैपिडो शहरों में टू-व्हीलर से यातायात सुविधा देने वाली की कंपनी है.
इस मेले में स्विगी की 50, ओला की 30 और सिक्योरिटी गार्ड के 300 पदों के लिए आवेदन स्वीकार किए जा रहे थे. एसबीआई, एलआईसी, आईटीसी, श्रीराम लाइफ़ इंश्योरेंस जैसी कंपनियां भी मेले में हिस्सा ले रही थीं.
वैकेंसी बोर्ड पर मौजूद अनुमानित सैलरी आंकड़ों के मुताबिक़, इन नौकरियों से आप 11,000 से लेकर 30,000 तक कमा सकते हैं.
छात्र अर्सलान हाशिम ने बताया, "मेरे हिसाब से यहाँ सिर्फ़ पब्लिसिटी हो रही है. अगर अब ग्रेजुएट को गार्ड की नौकरी देंगे, रैपिडो चलवाएंगे, छोटे-मोटे काम करवाएंगे, तो क्या वो इज़्ज़त से काम कर पायेगा? मैंने रैपिडो के स्टॉल पर पता किया तो उन्होंने कहा ड्राइविंग की नौकरी है. एक दो कंपनियां हैं जो ठीक-ठाक रोज़गार दे रही हैं.''
वो कहते हैं, ''बच्चे तो उम्मीद लगा कर आते हैं कि शायद आज कुछ काम बने. 10, 11,12 हज़ार रुपये में आदमी क्या कर लेगा? इतना सब सजावट कराके बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है. जॉब ड्राइविंग की दे रहे हैं, गार्ड की दे रहे हैं. तो क्या बीकॉम, एमकॉम करके आदमी गार्ड की नौकरी करेगा?"
बीएससी थर्ड ईयर के छात्र मोहम्मद साहिल भी नौकरी के लिए अप्लाई करने के लिए इस जॉब फ़ेयर में आए थे. उनकी शिकायत है कि वो कंप्यूटर साइंस के छात्र हैं और इस मेले में उनके मुताबिक़ एक भी बड़ी आईटी कंपनी नहीं आई है. वो कहते हैं आईटी के नाम पर यहाँ स्विग्गी आई है.
साहिल कहते हैं कि, "रोज़गार मेले के नाम पर यहाँ ओला ड्राइवर की जॉब आई है, स्विगी में खाना बेचने की जॉब. मेरे हिसाब से मोदी जी ने कहा था कि पकौड़ा तलवाएंगे तो वो चल रहा है यहाँ पर.
अल्पसंख्यकों के लिए अच्छी बात है, उन्हें ड्राइवरी करनी चाहिए, यह सब चीज़ें उन्हें करनी चाहिए. हम लोग कंप्यूटिंग जानते हैं, हमने जावा पढ़ा है, पाइथन पढ़ा है, सीएसएस पढ़ा है. इसके हिसाब से मुझे यहाँ कोई नौकरी नहीं दिख रही है."
मोहम्मद साहिल कहते हैं कि रोज़गार अल्पसंख्यकों के लिए नहीं बल्कि सभी हिन्दुस्तानियों के लिए मुद्दा है.
वो कहते हैं, "यहाँ रोज़गार लेने सिर्फ़ अल्पसंख्यक नहीं आया है. यहाँ हमारे बहुत सारे भाई आए हैं. हम लोग मिली-जुली आबादी में रहने वाले लोग हैं. हम जय राम, सीता राम, जय श्री राम, हर हर महादेव, सब सब जानते हैं. हमें सिर्फ सलाम नहीं सिखाया गया है.
हमारे दादा कानूनगो थे और वो धोती कुर्ता पहनते थे. उन्हें किसी ने कभी मुसलमान समझा नहीं, वो पंडित की श्रेणी में आते थे. तो हमें आप मुसलमान ब्राह्मण समझिए."
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मदरसों के छात्र भी पहुंचे रोज़गार मेले में
लखनऊ के चांदगंज से मदरसा आलिया के सहायक अध्यापक मौलाना जमील अहमद निज़ामी भी अपने मदरसों के छात्रों को लेकर इस रोज़गार मेले में पहुंचे. उनके मुताबिक़ पहली बार मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को किसी रोज़गार मेले में शामिल होने का मौका मिल रहा है.
वो कहते हैं कि, "उत्तर प्रदेश की सरकार मदरसों के छात्रों के एक हाथ में लैपटॉप और एक हाथ में क़ुरान देखना चाहती है. यह पहले से मालूम होता तो मदरसे के बच्चे इसमें आते और अपने हिसाब से नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते थे. लेकिन फिर भी बच्चे अपना सीवी देकर अपना नाम भर रहे हैं."
मौलाना जमील अमहद निज़ामी कहते हैं कि लखनऊ के 18 सरकारी अनुदानित मदरसों के छात्र भी इस रोज़गार मेले में शिरकत कर रहे हैं.
योगी सरकार ने क्यों लगाया अल्पसंख्यक बहुल इलाके में रोज़गार मेला?
इस रोज़गार मेले की मंशा के बारे में क्षेत्रीय सेवायोजन कार्यालय लखनऊ में सहायक निदेशक अरुण कुमार भारती कहते हैं, "ये रोज़गार मेला सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के लिए नहीं है. अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र में है. शासन का आदेश था कि अल्पसंख्यक बहुल इलाके में करें."
अरुण कुमार भारती बताते हैं कि मेले में मिलने वाले रोज़गार में सैलरी 12 से 16 हज़ार मिलेगी. वो कहते हैं, "एसबीआई के लिए एक पद के लिए साढ़े सैंतीस हज़ार के वेतनमान पर रखने के लिए कंपनी आई है. आज के मेले में हमने प्रचार प्रसार किया की सेवायोजन पोर्टल पर पंजीकरण कराने वाले ही बच्चे भाग लें."
अल्पसंख्यकों के लिए ही इस रोज़गार मेले के आयोजन करवाने के सवाल पर अरुण कुमार कहते हैं, इसका मकसद ये ही है कि "इस क्षेत्र के भी बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा भाग ले सकें जो आपको दिख भी रहा है. इस समुदाय के बच्चे ज़्यादा हैं आज के मेले में."
मेले में उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी भी पहुंचे.
उन्होंने कहा, "आज योगी सरकार ने अपने वादे पर खरे उतरते हुए, हज़ारों की संख्या में यहां रोज़गार देकर, विपक्ष के मुंह पर करारा तमाचा मारने का काम किया है.
चाहे अच्छी शिक्षा देने की बात हो, चाहे हमारी बहनों को सुरक्षा देने की बात की चाहे रोज़गार से हमें जोड़कर हमारी कौम को तरक्क़ी की तरफ़ आगे ले जाने की बात हो हर मौके पर योगी सरकार हमारे साथ ईमानदारी से खड़ी हुई है."
क्या कहते हैं बेरोज़गारी से जुड़े आंकड़े?
2006 की सच्चर आयोग की रिपोर्ट ने मुसलमानों में व्यापक बेरोज़गारी के बारे में लिखा था कि, "सामाजिक धार्मिक समुदायों यानी धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर बंटे समाज में मुसलमान ग्रैजुएट्स दूसरे धर्मों, जातियों और बिरादरियों के ग्रैजुएट्स के मुक़ाबले में ज़्यादा बेरोज़गार हैं. 25 प्रतिशत से भी ज़्यादा."
सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के बाद मुसलमानों को लेकर देश में कोई सरकारी शोध या स्टडी नहीं हुई जिसके आधार पर मौजूदा हाल का अनुमान लगाया जा सके.
अक्टूबर 2022 में जारी हुई सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक बेरोज़गारी दर के मामले में उत्तर प्रदेश कई राज्यों से बेहतर स्थिति में है.
देश में ग्रामीण इलाकों में शहरी इलाकों के मुक़ाबले बेरोज़गारी बढ़ी हुई है. अक्टूबर में देश में बेरोज़गारी दर बढ़कर 7.77 फ़ीसदी पर पहुंच गई. इसमें से शहरी इलाकों में बेरोज़गारी 7.21 और ग्रामीण इलाकों में यह 8.4 फ़ीसदी पर रही.
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