परीक्षा पास की लेकिन नहीं मिला नियुक्ति पत्र, अब नौकरी के लिए कर रहे पदयात्रा

    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी के लिए

परेशान कर देने वाली गर्मी और उमस में युवकों का एक दल पैदल ही नागपुर से दिल्ली के सफ़र पर है. इन्हें उम्मीद है कि ये मुश्किल भरा सफ़र उन्हें आगे राहत देगा, सरकार का दिल पसीजेगा और उनकी मागें पूरी हो पाएंगी.

इनके सफ़र का मक़सद है कि सरकार इन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में नियुक्ति दे. इन्होंने केंद्रीय अर्धसैनिक सिपाही भर्ती परीक्षा साल 2018 पास की थी, लेकिन अभी तक इन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है.

विशाल लंगदे, महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले के हैं. इनके परिवार में बूढ़े मां-बाप हैं. परिवार अपना जीवन गुज़र बसर मज़दूरी करके करता रहा है. लेकिन विशाल के माता-पिते ने उनकी पढ़ाई पूरी कराई गई ताकि वो अपने जीवन में कुछ कर सकें.

विशाल भी पढ़ने के दौरान छोटे-मोटे काम करते थे लेकिन उनका सेलेक्शन होने के बावजूद उन्हें अब तक नियुक्ति पत्र का इंतज़ार है.

विशाल ने बताया, "हर तरह की कोशिश के बाद हमने कठिन सफर का यह रास्ता चुना है ताकि सरकार हमारी बात सुन ले. हम हर रोज़ 30-35 किलोमीटर का सफर तय कर रहे हैं. वैसे हम चाहते हैं कि 50 दिनों में इसे पूरा करें लेकिन इसमें असल में कितना समय लगेगा, ये बता पाना मुश्किल है."

सरकार का पक्ष

आंदोलन कर रहे इन अभ्यर्थियों को भारत सरकार के अवर सचिव ने पिछले साल नवंबर में एक जवाब भी दिया था.

इस चिट्ठी में कहा गया था, "कर्मचारी चयन आयोग को 60,210 अभ्यर्थियों की भर्ती का निर्देश दिया गया था. इसके लिए 55,912 अभ्यर्थियों का चयन पहले किया जा चुका है. कुछ एक रिक्तियों को न्यायालय के विभिन्न आदेशों के तहत खाली रखा गया है और लगभगल 4,000 पदों को पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध न होने के कारण नहीं भरा जा सका है."

पदयात्रा में लड़कियां भी शामिल हैं

विशाल कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि पदयात्रा के बाद अब सरकार उनकी बात सुन लेगी.

विशाल का सफर इस साल पहली जून को महाराष्ट्र के नागपुर से शुरू हुआ था. इस वक्त ये लोग मध्य प्रदेश के सागर ज़िले से गुजरते हुए दिल्ली की तरफ बढ़ रहे हैं. इस पैदल मार्च की शुरुआत 40 लोगों ने की थी लेकिन अब इसमें कुल 60 लोग हो चुके हैं.

विशाल का कहना है, "हम ऐसे समय में पदयात्रा कर रहे हैं जब गर्मी ऐसी है कि लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं."

विसाल बताते हैं कि पैदल चलते हुए इनके कई साथी बीमार भी पड़ रहे हैं और उनके पैरों में छाले भी आ रहे हैं. लेकिन ये उनकी हिम्मत ही है कि ये लोग ठीक होते ही फिर से अपने सार्थियों के साथ शामिल हो जाते हैं. अब तक आठ लोग इस सफ़र में बीमार पड़ चुके हैं. यात्रा कर रहे 60 लोगों में से 8 लड़कियां भी शामिल हैं.

'काग़ज़ात का वेरिफेकेशन भी हो गया था'

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा के अमित कुमार भी अपनी मांग को लेकर इस दल में शामिल हैं.

अमित कुमार के परिवार में उनकी विधवा मां, दो बड़ी बहनें और एक छोटा भाई है. उनके पास एक खेत था, जो उन्हें पिता के इलाज के लिए गिरवी रखना पड़ा था. इस वक़्त परिवार अपने गुज़र बसर के लिए गांव में ही काम कर रहा है.

अमित कुमार इससे पहले हुए दिल्ली के जंतर मंतर के पास हुए धरना प्रदर्शन और आमरण अनशन में शामिल रहे हैं.

अमित कुमार ने बताया, "सरकार हमारी मांग सुनने को तैयार नहीं है. हमारे काग़ज़ातों का वेरिफेकेशन भी हो गया था लेकिन उसके बावजूद सरकार ने हमें नियुक्ति नहीं दी."

शिबू बर्मन का दर्द

पश्चिम बंगाल के शिबू बर्मन भी इस पदयात्रा में शामिल हैं. उत्तर दिनाजपुर से ताल्लुक रखने वाले शिबू बर्मन ने सवाल पूछा, "आप को मालूम है कि एक दिन का खाना और रहने में ही कितना पैसा लग जाता है? उसके बावजूद हमने कोशिश करके पढ़ाई की और हमारा सेलेक्शन भी हुआ. लेकिन उसके बावजूद हमें नियुक्ति नहीं दी गई."

बर्मन ने कहा, "गर्मी की जो स्थिति है, वो आपको मालूम है लेकिन उसके बावजूद देश सेवा के जज़्बे की वजह से हम यह पदयात्रा कर रहे हैं. हमारी मागों को सुना जाना चाहिए."

शिबू के परिवार में मां-बाप के अलावा एक बहन हैं जिसकी शादी हो चुकी है. बहन की शादी के दौरान उनपर काफी उधार चढ़ चुका है. परिवार का बड़ा होने की वजह से सारी ज़िम्मेदारियां शिबू पर ही हैं. उनका कहना है कि सरकार को हमारी मजबूरी को समझना चाहिए.

शिबू को उम्मीद है कि दिल्ली पहुंचने पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके दल की मुलाक़ात हो सकेगी और उन्हें नौकरी का नियुक्ति पत्र भी मिल जाएगा.

ग़रीब परिवारों के लड़के-लड़कियां

दल में शामिल सभी लड़के और लड़कियां बेहद ग़रीब परिवार से आते हैं. इनमें से अधिकाश युवाओं पर घर के दूसरे सदस्यों की ज़िम्मेदारी भी है.

यह लोग एसएससी जीडी 2018 की परीक्षा में शामिल हुए थे. इसके नतीजे पिछले साल जनवरी में जारी किए गए थे.

उस वक्त लगभग 60 हज़ार पदों के लिए निकाली गई थी. भर्ती में 55 हज़ार उम्मीदवारों को नौकरी मिल गई लेकिन तकरीबन पांच हज़ार अभ्यर्थी नियुक्ति पत्र पाने से रह गए.

हालांकि इनका दावा है कि इनके साथ अब लगभग 2,500 लोग ही हैं क्योंकि कुछ लोगों को स्थानीय स्तर पर निकली पुलिस भर्ती और अन्य परीक्षाओं में जगह मिल गई. लेकिन ये अभी भी अपने हक़ के लिये संघर्ष कर रहे है.

यह पहला मौक़ा नहीं है जब इन्होंने पैदल सफ़र करके उनके साथ हुए अन्याय की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की है.

बल्कि इससे पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर ये लोग एक साल तक आंदोलन कर चुके हैं लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला.

इस दौरान उनका दावा है कि उन्होंने कुछ केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों से मिलकर अपनी बात भी रखी. कुछ सांसदों ने इनकी बात संसद में उठाई भी लेकिन फिर भी इन्हें नियुक्ति नहीं मिली.

उसके बाद इन्हें बताया गया कि इनकी मदद केंद्रीय मंत्री कर सकते हैं इसलिए उन्होंने उसके बाद नागपुर के संविधान चौक पर धरना दिया और आमरण अनशन रखा.

लेकिन फिर भी उनकी मुश्किलों का हल नहीं निकला तो उन्होंने पदयात्रा का ये मुश्किल सफर शुरू किया.

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