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एविएशन सेक्टर पर मंडरा रहा ख़तरा, जा सकती हैं और नौकरियां
- Author, निधि राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई से
34 साल की ऋतिका श्रीवास्तव अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. बीते नौ सालों से वो एविएशन सेक्टर यानी विमानन उद्योग में काम कर रही थीं लेकिन फ़िलहाल उनके पास नौकरी नहीं है.
दिल्ली के छतरपुर इलाक़े में रहने वाली ऋतिका कुछ वक़्त के लिए अपने गृहनगर वाराणसी (उत्तर प्रदेश) शिफ्ट हो गई हैं.
ऋतिका ने बीबीसी को बताया, "दिल्ली में रहने का ख़र्च उठाने के लिए हमारे पास ताक़त नहीं बची. बचत के पैसे ख़त्म हो गए. मेरे पति को भी उनकी पूरी तनख़्वाह नहीं मिल रही. उन्हें अपनी तनख़्वाह का 30 फ़ीसद ही मिल रहा है और मार्च के महीने से मेरे पास भी नौकरी नहीं है."
ऋतिका एक जानी-मानी एयरलाइन कंपनी के रेवेन्यू डिपार्टमेंट में काम करती थीं. मार्च के महीने में एक दूसरी एयरपोर्ट कंपनी में ज्वाइन करने के लिए उन्होंने ये नौकरी छोड़ दी.
उनकी ज्वाइनिंग की तारीख़ 20 मार्च 2020 थी. लेकिन कोरोना महामारी के कारण ये ऑफ़र रोक दिया गया.
फ़ोन पर ऋतिका ने बताया, "उन्होंने हमें नौकरी से निकाला नहीं. उन्होंने कहा कि स्थिति सामान्य होने पर वो हमें वापिस काम पर बुला लेंगे. लेकिन अब ये मुश्किल ही लग रहा है."
ऋतिका के पति एक चार्टर्ड प्लेन कंपनी में काम करते हैं. ये कंपनी अभिनेताओं और राजनेताओं जैसे हाई प्रोफ़ाइल लोगों के स्पेशल उड़ान मुहैया कराती है.
ऋतिका कहती हैं, "हम वापिस घर आ गए ताकि कम से कम हम किराया और रोज़मर्रा के दूसरे ख़र्च कम कर सकें."
वो कहती हैं, "मैं बीते सात महीनों से अपने लिए नौकरी तलाश रही हूं. मैं जहां भी जाती हूं मुझसे कहा जाता है कि मेरे पास केवल एविएशन सेक्टर में काम करने का अनुभव है और दूसरे सेक्टर के लिए मैं योग्य नहीं हूं जबकि मैं फ़ाइनेंस बैकग्राउंड से हूं."
'बुरी तरह प्रभावित पायलट'
एयर इंडिया के कुछ कर्मचारियों के लिए तो समस्या कोरोना महामारी से काफ़ी पहले ही शुरू हो गई थी.
अब तक एयर इंडिया के क़रीब साठ पायलट तनख़्वाह और अलाउंस की माँग लेकर कोर्ट का रुख़ कर चुके हैं. इन पायलट्स का दावा है कि कंपनी ने ग़लत तरीक़े से उनका कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म किया है और अप्रैल के महीने से उन्हें तनख़्वाह और अलाउंस नहीं दिया है.
बीबीसी ने कुछ पायलट्स से बात की जिन्होंने अपना नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा कि उनके लिए घर का ख़र्च चलाना अब मुश्किल हो रहा है.
एक पायलट ने कहा, "आप कह सकते हैं कि हमें नौकरी से निकाल दिया गया है. हमने दिसंबर में ही इस्तीफ़ा दे दिया था लेकिन एयर इंडिया ने कहा कि वो चाहते हैं कि हम नौकरी न छोड़ें. उन्होंने हमारी तनख़्वाह भी बढ़ाई थी लेकिन असल में ऐसा नहीं हुआ और कोरोना के कारण लॉकडाउन लग गया. अब उन्होंने हमें बर्ख़ास्त कर दिया है."
वो कहते हैं, "मैंने पायलट बनने के लिए 60-70 लाख रूपये ख़र्च किए हैं. इसकी ट्रेनिंग दो-तीन साल की होती है. पायलट की नौकरी मिलना आसान नहीं है. एविएशन सेक्टर दूसरे सेक्टर की तरह नहीं है. यहां लोग आसानी से नौकरियां नहीं बदल सकते."
"हमारे पास बेहद सीमित विकल्प होते हैं और अगर ये पूरा सेक्टर फ़िलहाल मुश्किल के दौर से गुज़र रहा है तो हमें कहीं भी नौकरी नहीं मिलेगी."
कोर्ट का रुख़ करने वाले एक पायलट ने बताया, "दरअसल हम अब तक ट्रेनिंग के लिए लिया गया लोन चुका रहे हैं. बैंक अपना पैसा वापिस माँग रहे हैं. वो हमारे घर आकर हमसे लोन का पैसा माँग रहे हैं. मैं उन्हें पैसे कैसे चुकाऊंगा? ये सब काफ़ी तनावपूर्ण है. मुझे नहीं पता कि वो कब मेरी कार उठा कर ले जाएं. सच कहूं तो मैं घर चलाने के लिए दो-तीन हज़ार रूपये तक उधार ले रहा हूं. मेरी ज़िंदगी पूरी तरह पलट गई है, मुझे अब रातों को नींद नहीं आती."
इंडियन कमर्शियल पायलट एसोसिएशन के महासचिव प्रवीण कीर्ति कहते हैं कि कोरोना महामारी ने पायलट्स को सबसे बुरी तरह प्रभावित किया है.
प्रवीण ने बीबीसी को बताया, "अधिकांश कर्मचारी चाहते हैं कि वो प्रोविडेंट फ़ंड में जमा अपने पैसों का इस्तेमाल करें लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इसके लिए कई सारे नियम हैं."
वो कहते हैं कि इंडिगो के अलावा शायद ही किसी और एयरलाइन कंपनी ने अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकालते वक़्त उनकी बेहतरी के लिए कुछ किया हो.
इंडिगो ने जिन कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा दिया और उन्हें एडवांस में दो-तीन महीने की तनख़्वाह भी दी.
कितनी गंभीर है समस्या?
इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) के एक आकलन के मुताबिक़ देश में एविएशन और इससे जुड़े सेक्टर में काम करने वाले क़रीब 30 लाख लोगों की नौकरियां जा सकती हैं.
केयर रेटिंग्स में रिसर्च एनालिस्ट उर्विशा जगशेठ कहती हैं, "धंधा चालू रखने के लिए और बही-खाता दुरुस्त रखने के लिए एयरलाइन कंपनियों के पास एक ही उपाय रह गया है कि वे अपनी उड़ान सेवाओं को संतुलित करें या फिर उनमें कटौती करें."
वो समझाती हैं कि एयरलाइन कंपनियों के राजस्व में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही. साथ ही कंपनियों के लिए एविएशन फ्यूल, एयरपोर्ट नेविगेशन चार्ज, पार्किंग, मेन्टेनेंस के ख़र्च में किसी तरह की कटौती करना मुश्किल है. ऐसे में जिस मद में कटौती संभव है, वो है तनख़्वाह और कर्मचारियों का अलाउंस.
उर्वशी जगशेठ कहती हैं, "विमानन उद्योग में अभी जिस तरह काम चल रहा है उसे देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि सभी कर्मचारी बेहतर स्थिति में होंगे. आने वाले दिनों में अगर बिज़नेस नहीं बढ़ा तो और लोगों की नौकरियां भी जा सकती हैं."
महामारी से पहले भी कम नहीं थी मुश्किलें
लेकिन ऐसा नहीं है कि एविएशन सेक्टर के लिए मुश्किलें कोरोना महामारी के कारण आई हैं. भारत में कोरोना महामारी के दस्तक देने से पहले से ही ये सेक्टर मुश्किलों के दौर से गुज़र रहा था.
वित्त वर्ष 2020 में एक के बाद एक कई ऐसी घटनाएं हुई जिनका असर इंडस्ट्री की क्षमता और विकास के साथ-साथ लोगों की यात्रा पर पड़ा.
इस साल जेट एयरवेज़ ने काम बंद कर दिया, फ्लाइट कंट्रोल सॉफ्टवेयर में तकनीकी गड़बड़ी के कारण बोइंग मैक्स 737 विमानों को उड़ान भरने से रोक दिया गया, एयरबस ए320 नियोज़ के प्रैट्ट एंड व्हिट्नी इंजन में समस्या के कारण इन विमानों के उड़ने पर रोक लगा दी गई.
वित्त वर्ष 2020 में एविएशन टर्बाइन फ्यूल की क़ीमतों में थोड़ी कमी ज़रूर आई और उम्मीद की गई कि इंडस्ट्री को इससे फ़ायदा होगा. लेकिन यात्रियों के लिए टिकट की क़ीमतें कम रखने की चुनौती के चलते कुछ तिमाही में कंपनियों को नुक़सान झेलना पड़ा.
जानकार मानते हैं कि दुनिया भर में देशों की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विमानन कंपनियों के काम करने के तरीक़े, यात्रा और पर्यटन पर कोरोना महामारी का व्यापक असर पड़ा है. महामारी के बाद भी एविएशन सेक्टर को इस झटके से उबरने में अभी लंबा वक़्त लगेगा.
देश में उड़ानें एक बार फिर चालू कर दी गई हैं लेकिन जिस तरह ये वायरस रुकने का नाम नहीं ले रहा, उसका असर लोगों की यात्रा पर पड़ रहा है.
इंडिया क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आईसीआरए) की उपाध्यक्ष किंजल शाह कहती हैं, "आईसीआरए के आकलन की मानें तो वित्त वर्ष 2021 में घरेलू यात्रियों की संख्या 41 फ़ीसद से घट कर 46 फ़ीसद तक हो जाएगी. ये आंकड़ा वित्त वर्ष 2016 से भी निचले स्तर पर पहुँच जाएगा."
इंडस्ट्री के सामने चुनौतियां
एविएशन सेक्टर के सामने फ़िलहाल सबसे बड़ी चुनौती है यात्रियों की संख्या. आईसीआरए की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2020-21 में यानी 25 मई 2020 से 30 सितंबर 2020 के बीच घरेलू यात्रियों की संख्या 110 लाख थी. वहीं वित्त वर्ष 2020 में इस दौरान यात्रियों की संख्या 702 लाख थी. यानी यात्रियों की संख्या में साल भर में 84.2 फ़ीसद की गिरावट दर्ज की गई है.
महामारी के दौर में घरेलू यात्रियों की संख्या का सीधा असर इंडस्ट्री पर तो पड़ा ही है, इसके अलावा दुनिया के दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को लगे झटके का असर भी इंडस्ट्री पर पड़ना तय है.
माना जा रहा है कि आर्थिक मुश्किलों के कारण कम ही लोग यात्रा करेंगे और महामारी का ख़तरा ख़त्म होने के बाद भी धीमी रिकवरी की ही उम्मीद की जा सकती है.
ऐसी कंपनियां जो आर्थिक स्तर पर मज़बूत स्थिति में हैं वो इस मुश्किल दौर से कुछ वक़्त में निकाल पाएंगी लेकिन पहले से ही मुश्किलें झेल रही कंपनियों के लिए अस्तित्व बचाए रखने का संकट पैदा हो सकता है.
सीएपीए-सेंटर फ़ॉर एविएशन में दक्षिण भारत के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी कपिल कौल ने बीबीसी को बताया, "देखा जाए तो पूरी इंडस्ट्री इस वक़्त मुश्किल स्थिति में है."
वो कहते हैं, "धीरे-धीरे माँग बढ़ रही है लेकिन फ़िलहाल ये पर्याप्त नहीं है. बिज़नेस के लिए यात्रा या पर्यटन के लिए यात्रा जैसे मुख्य सेक्टर के बढ़ने जैसे कोई आसार नहीं दिख रहे. वित्त वर्ष 2022 के आख़िर तक किसी तरह के विस्तार की कोई उम्मीद नहीं है."
सरकार की क्या हो भूमिका?
अंतरराष्ट्रीय यात्रा शुरू करने के लिए भारत सरकार ने फ़िलहाल 13 देशों के साथ एयर बबल के ज़रिए यात्रा शुरु की है.
लेकिन जानकार मानते हैं कि फ़िलहाल विमानन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी आर्थिक स्थिति है.
फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए एविएशन कंपनियों को सीधे कैश के साथ-साथ सरकारी मदद से क्रेडिट लाइन और लोन की ज़रूरत है.
उर्विशा जगशेठ कहती हैं, "एयरपोर्ट की पार्किंग फ़ीस और नेविगेशन सर्विस में तीन महीने की छूट से इन कंपनियों को अपना पैसा बचाने में थोड़ी मदद मिल सकती है. साथ ही इन कंपनियों को आर्थिक मदद की भी ज़रूरत है."
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