प्रोफ़ेसर जोसेफ़: एक प्रश्न की वजह से जिनके हाथ काट दिए गए

- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ पर हमला विवादित मुस्लिम संगठन पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया यानी पीएफ़आई के लोगों ने किया था. भारत सरकार ने पिछले ही महीने इस संगठन पर पाबंदी लगा दी है. बीबीसी ने केरल जाकर इस भयानक हमले और उसके बाद आज तक की घटनाओं को जानने की कोशिश की है.
(चेतावनी- यह कहानी कुछ लोगों को विचलित कर सकती है)
12 साल पहले की यह घटना प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के दिमाग़ में अब तक ताज़ा है. वह जुलाई महीने की बारिश का मौसम था. उस समय प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की उम्र 52 साल थी. वो एक स्थानीय कॉलेज में मलयालम भाषा पढ़ाते थे. एक रविवार को वो अपनी मां और बहन के साथ कार पर घर लौट रहे थे.
लेकिन घर से महज़ 100 मीटर की दूरी पर एक वैन ने उनका रास्ता रोक लिया. इस मिनी वैन से छह लोग निकले और वो प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की कार की तरफ टूट पड़े. इन हमलावरों में से एक के पास एक कुल्हाड़ी भी थी.
उनमें से एक प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की कार के ड्राइवर की तरफ़ का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगा, जबकि एक हाथ में चाकू लेकर उनकी तरफ़ बढ़ा. बाक़ी तीन लोग कार के पिछले दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, जहां प्रोफ़ेसर की बहन बैठी थीं.
इसी बीच एक हमलावर ने कुल्हाड़ी से ड्राइवर के दरवाज़े का शीशा तोड़ दिया. अब तक प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की समझ में आ गया था कि वो बड़ी मुसीबत में फ़ंस चुके हैं.
उसके बाद कुल्हाड़ी वाले हमलावर ने हाथ डालकर अंदर से कार का दरवाज़ा खोल दिया और प्रोफ़ेसर को घसीटते हुए कार से बाहर निकाल लिया. फिर हमलावरों ने उनके हाथ और पांव पकड़कर कर झुला दिया.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ चिल्ला रहे थे, "मुझे मत मारो, मुझे मत मारो". फिर लकड़ी की तरह कुल्हाड़ी से एक हमलावर उनके हाथ और पांव काटने लगा.
उनका बायां हाथ कटकर अलग हो गया जबकि दाहिना हाथ कटकर शरीर से लटक गया.

16 घंटे तक चला ऑपरेशन
यह शोर सुनकर प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के बेटे और उनकी पत्नी घर से भागते हुए वहां पहुंचे. उनके बेटे ने एक चाकू के सहारे हमला कर रहे शख़्स को खदेड़ने की कोशिश की.
उसके बाद हमलावरों ने पेट्रोल बम में आग लगाई और अपनी गाड़ी में सवार होकर वहां से फ़रार हो गये.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को पड़ोसियों की मदद से अस्पताल पहुंचाया गया. उनका एक कटा हुआ हाथ टूटे पत्ते की तरह पड़ोसी के बगीचे में पड़ा हुआ था. इस हाथ को एक थैले में डालकर अलग से हॉस्पिटल पहुंचाया गया.
घर से 50 किलोमीटर दूर प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को जब हॉस्पिटल पहुंचाया गया तब वो बेहोश थे. उसके बाद इमरजेंसी में छह डॉक्टरों ने 16 घंटे तक प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का ऑपरेशन किया. इस दौरान उन्हें 16 बोतल ख़ून चढ़ाया गया और उनके कटे हुए हाथ को जोड़ा गया. उनकी हथेली और बांह की भी सर्जरी की गई.
इस सर्जरी के 18 घंटे के बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को होश आया था. इस घटना की ख़बर सुनते ही हॉस्पिटल में भीड़ इकट्ठा होने लगी और लोगों का गुस्सा बाहर आने लगा. प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को हॉस्पिटल से 35 दिन के बाद डिस्चार्ज किया गया.
इस दौरान 11 दिन तक उनको क्रिटिकल केयर में रखा गया था.
क्या कसूर था प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का कहना है, "मेरा कसूर यह था कि मैंने परीक्षा के लिए एक प्रश्न बनाया था. कुछ लोगों के मुताबिक़ इससे इस्लाम का अपमान हुआ था. इसने मेरी ज़िदगी छीन ली थी."
इस हमले के चार महीने पहले की बात है. एक फ़ोन कॉल से सुबह जल्दी ही प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की नींद खुल गई थी. वो रात ठीक से सो नहीं पाए थे और जगने के बाद भी थोड़ा सुस्त महसूस कर रहे थे.
फ़ोन पर दूसरी तरफ न्यूमैन कॉलेज के प्रिंसिपल थे. यह कॉलेज एक स्थानीय कैथोलिक चर्च चलाता है. प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का इस कॉलेज में शिक्षक के तौर पर दूसरा साल था.
हालांकि वो 25 साल से अलग-अलग जगहों पर शिक्षक के तौर पर काम कर चुके थे.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ याद करते हैं कि प्रिंसिपल ने उनसे कहा था कि कॉलेज के मैदान में पुलिस भरी हुई है. वो यहां से दूर ही रहें तो बेहतर होगा.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ बताते हैं, "प्रिंसिपल ने आगाह किया कि अगर आप यहां आएंगे तो लोग और भड़क सकते हैं."
प्रोफ़ेसर ने जवाब किया, "क्यों? मैंने कुछ ग़लत नहीं किया है." फिर प्रिंसिपल ने उनको बताया कि यहां पैगंबर मोहम्मद के अपमान होने की बातें फैलाई गई हैं और कॉलेज की दीवार पर इसके पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं.

प्रश्नपत्र में क्या था
जिस सवाल से लोग भड़के हुए थे वह ''एक सनकी इनसान और ईश्वर'' के बीच हुआ काल्पनिक संवाद था जिसे प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने एक किताब से लिया था. ये डायलॉग, पटकथाओं पर लिखी एक किताब से लिया गया था जिसके लेखक फ़िल्मकार कुंज मुहम्मद हैं.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के मुताबिक़ उन्होंने पीटी कंजू मुहम्मद के नाम से ही मुहम्मद शब्द लेकर 'द मैड मैन मुहम्मद' बना दिया था.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का कहना है. "मुसलमानों में 'मुहम्मद' नाम बहुत ही आम बात है. यह मेरे दिमाग में ही नहीं आया कि लोग इसे ग़लतफ़हमी में पैगंबर मोहम्मद से जोड़ लेंगे."
"इस परीक्षा में 32 छात्र शामिल हुए थे जिनमें चार मुसलमान भी थे, लेकिन किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की. केवल एक मुस्लिम छात्रा को इस सवाल पर थोड़ी हिचक हुई थी."
इधर तनाव बढ़ने के साथ ही पुलिस प्रदर्शनकारियों को कॉलेज के गेट पर रोक रही थी. उधर भीड़ ने शहर की दुकानों को जबरन बंद कराना शुरू कर दिया. इस बीच कॉलेज ने प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को सस्पेंड करने का एलान कर दिया.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ बताते हैं, "मुझे ऐसा लग रहा था कि बिना बताए किसी इंसान को नंगा कर दिया गया हो." उसके बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने अपनी पत्नी सालोमी से कपड़े पैक करने को कहा और बस से शहर से निकलने की तैयारी करने लगे.
अगले कुछ दिनों तक वो एक शहर से दूसरे शहर तक भटकते रहे. वो सस्ते होलटों में ठहरते थे और टीवी पर यह सब देख रहे थे.
पुलिस ने उनकी गिरफ़्तारी के लिए चार टीमें बनाई थीं. यहां तक कि उनके 22 साल के बेटे को पुलिस उठाकर ले गई ताकि उनके पिता के ठिकाने का पता लगा सके.
आख़िरकार छह दिनों के बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. प्रोफ़ेसर को उस जेल में रखा गया जहां 15 अन्य क़ैदी मौजूद थे. इनमें क़त्ल और ग़ैरक़ानूनी शराब बेचने वाले अभियुक्त भी शामिल थे.
इस बीच पुलिस उनके घर से पासपोर्ट, बैंक के दस्तावेज़ और बाक़ी काग़ज़ात उठाकर ले गई. सबसे बड़ी बात यह है कि पुलिस ने उन पर ईशनिंदा और ईश्वर का अपमान करने का आरोप लगाया था.
इस घटना के बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के कॉलेज ने सार्वजनिक तौर पर माफ़ी भी मांगी. जबकि पुलिस उनहें प्रश्न पत्र का अभियुक्त कह रही थी. कॉलेज ने प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को कई तरह के आरोपों की एक सूची भी भेजी थी जिसमें किसी धर्म को मानने वालों के विश्वास के साथ खिलवाड़ करना भी शामिल था.

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प्रोफ़ेसर पर हमले की कोशिश
जेल जाने के क़रीब एक हफ़्ते के बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को ज़मानत मिल गई और फिर वो अपने ससुराल वालों के साथ रहने लगे. वहां से बाहर निकलने में भी वो सावधानी बरतने लगे.
वो बताते हैं, "मुझे लगने लगा था कि कट्टर लोग मुझे जान से मारने की कोशिश ज़रूर करेंगे." उसके बाद तीन बार प्रोफ़ेसर की तलाश में आए लोग उनके घर पहुंचे थे. एक बार तो वो बाल-बाल बच गए.
पहली बार वो घर पर नहीं थे. इसी दौरान छह लोग ख़ुद को छात्र बताकर उनके दरवाज़े पर आए थे. उन लोगों का कहना था कि वो प्रोफ़ेसर से मिलकर कॉलेज मैगज़ीन के लिए उनके संस्मरण को लिखना चाहते हैं.
दूसरी बार वे लोग अपनी बेटी के इलाज के बहाने चंदा मांगने प्रोफ़ेसर के घर गए थे. उन लोगों ने एक चिट्ठी भी सौंपी और कहा कि यह आपके एक जानने वाले ने लिखी है.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ याद करते हैं, "मैंने अपने क़दम खींचे और दरवाज़े के अंदर आ गया. मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया. उस चिट्ठी पर मेरा नाम लिखा था, मुझे लगा कि यह एक लेटर बम हो सकता है."
"उसके बाद वो लोग घर से बाहर निकल गए और अपने बाइक पर सवार होकर चले गये. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं दिख रहा था."
"मैं समझ गया था कि वो फिर से आएंगे और मुझ पर हमला करने की कोशिश करेंगे. मैंने अपने पड़ोसी से बात की तो उन्होंने मुझे यहां से कहीं और चले जाने की सलाह दी."
"लेकिन मैं अपनी बूढ़ी मां और अपने परिवार को नहीं छोड़ सकता था. फिर मैं घबराने लगा."
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जब हमला हो गया
फिर प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस ने उन्हें रात में घर के बाहर पेट्रोलिंग का भरोसा दिया और चली गई.
मई के अंतिम सप्ताह में एक दिन वे लोग फिर से दोपहर के वक़्त प्रोफ़ेसर के घर पर आए. उनमें से दो लोगों ने दरवाज़े पर आकर बेल बजाया और कहा कि वे बैंक से आए हैं. उनमें से एक ख़ुद को पुलिसवाला बता रहा था.
वो आम लोगों की तरह कपड़े पहने था और प्रोफ़ेसर को ढूंढने के लिए हर कमरे की तलाशी लेने लगा. फिर उन्होंने बाइक पर घर का चक्कर लगाया और वहां से चले गए.
उसके बाद से प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने अपने घर की सुरक्षा और बढ़ा दी. घर के दरवाज़ों को बोल्ट लगाकर बंद कर दिया गया. इसके अलावा घर के अंदर से कोई न कोई हर वक़्त बाहर की छोटी-सी चार-दीवारी पर नज़र रखने लगा.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने एक लोहार से दो चाकू भी बनावाए और उन्हें अपने कमरे के पर्दे के पीछे छिपाकर रखने लगे. उन्होंने घर से निकलना भी लगभग बंद कर दिया. लेकिन जुलाई की उस सुबह क़िस्मत ने उनका साथ नहीं दिया था और उन पर हमला हो गया.
पुलिस ने उस हमले के बाद 31 लोगों को हिरासत में लिया था. ये सभी लोग पीएफ़आई के सदस्य थे. यह विवादास्पद मुस्लिम संगठन साल 2006 में बना था. पिछले ही महीने इस संगठन पर पांच साल का प्रतिबंध लगाया गया है. इस पर आतंकी संगठनों से जुड़े होने का आरोप लगाया गया है. हालांकि पीएफ़आई ने हमेशा इससे इनकार किया है.

दोषियों को सज़ा
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ पर हुए हमले के मामले में 13 लोगों को दोषी क़रार दिया गया था. उनमें से 10 दोषियों को 8 साल की सज़ा सुनाई गई थी. जांच एजेंसियों ने इसे छोटी सज़ा बताकर इसके ख़िलाफ़ अपील की है. यह मामला अभी भी कोर्ट में है.
इस मामले में बाद में 11 अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया था. फिलहाल कोर्ट में इनका ट्रायल चल रहा है. इससे जुड़े 400 चश्मदीदों को घटना का सुबूत पेश करना है. इस हमले के एक दशक बाद भी प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को मुआवज़े के तौर पर मिलने वाले 8 लाख रुपये का इंतज़ार है. कोर्ट के आदेश से यह मुआवज़ा दोषियों से वसूला जाना है.
इस हमले के वक़्त जैकब पुन्नूज़ केरल पुलिस के प्रमुख थे. उन्होंने बीबीसी को बताया, "अपने पुलिस करियर में मैंने जिन मामलों की जांच की है, यह उनमें योजना बनाकर किया गया सबसे बड़ा हमला था."
"इसके लिए बहुत बड़ी योजना बनाई गई थी. टार्गेट की पहचान की गई, जहां हमला किया जाना था वो जगह चुनी गई और हर तरह की सावधानी बरती गई. इसके अलावा तीन गाड़ियां रखी गई थीं जिनमें दो भागने के लिए थीं."
हमलावरों ने कम से कम चार बार अलग-अलग जगहों पर मीटिंग कर हमले से जुड़ी हर बात पर चर्चा की थी. इससे पहले दो बार तो प्रोफ़ेसर घर से बाहर थे और एक बार उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया था. यानी तीनों बार प्रोफ़ेसर के घर पर हमला नाकाम हो गया था.
उसके बाद हमलावरों ने एक मिनी वैन ख़रीदी और उस पर नकली नंबर प्लेट लगवाये. एक मोटर साइकिल सवार ने घर और चर्च का रास्ता जानने के लिए प्रोफ़ेसर की कार का पीछा भी किया था.
जैकब पुन्नूज़ बताते हैं, "वो लोग इतने शातिर थे कि उन्होंने हमले के लिए नए फ़ोन और सिम कार्ड तक का इस्तेमाल किया था. लेकिन उनमें से एक हमलावर ने एक छोटी-सी ग़लती कर दी. उसने नए सिम कार्ड का टेस्ट करने के लिए उसे अपने फ़ोन में लगाकर किसी नंबर पर फ़ोन किया और काट दिया. हमने उस नंबर की पहचान कर ली."
अगस्त 2010 में हॉस्पिटल से छुट्टी के महज़ एक महीने के बाद प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को कॉलेज से निकाल दिया गया.
उसके बाद केरल में कई प्रदर्शन हुए. शिक्षकों ने उनके इलाज के लिए चंदा इकट्ठा किया. उन्हें कई लोगों ने समर्थन और संवेदना वाली चिट्ठियां भेजीं . शिक्षा और संस्कृति से जुड़े कई लोगों ने उन्हें नौकरी से निकाले जाने की निंदा की. उनके समर्थन में दो प्रदर्शनकारी तो कॉलेज के बाहर ही भूख हड़ताल पर बैठ गए थे.

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परिवार को हुई काफ़ी परेशानी
एक स्थानीय अख़बार ने तो यहां तक लिख दिया कि प्रोफ़ेसर को अपनी पत्नी और दो बच्चों की परवरिश करनी है और इसकी अनदेखी करते हुए संवेदनहीन लोग ही किसी को नौकरी से निकाल सकते हैं.
उसके बाद भी प्रोफ़ेसर की ज़िदगी में कई बार मुश्किलें आईं. अपनी हथेली, बांह और पैरों के इलाज़ के लिए उन्हें साल 2010 और 2011 में कई बार ऑपरेशन कराना पड़ा. उनके दाहिने हाथ ने कुछ भी महसूस करना बंद कर दिया. फिर उन्होंने बाएं हाथ से लिखने और खाने का अभ्यास शुरू किया.
उसके बाद उनके परिवार को ज़िंदगी के लिए संघर्ष करना पड़ा. बच्चों की पढ़ाई के लिए क़र्ज़ लिया था, इस क़र्ज़ को चुकाने के लिए घर के जेवर गिरवी रखे गए. प्रोफ़ेसर की पत्नी सालोमी एक दुकान में काम करने लगीं. वो सरकार की तरफ से चल रही योजना में भी काम करती थीं.
इस परिवार के लिए उम्मीद की एकमात्र किरण साल 2013 में आई जब कोर्ट ने उन पर लगाए गए ईशनिंदा के आरोप को ख़ारिज़ कर दिया. कोर्ट ने कहा कि प्रश्न न समझ पाने की वजह से इस विवाद को कुछ मुस्लिमों ने खड़ा किया है.
उस समय प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के हाथ में चार साल से कोई नौकरी नहीं थी. उनके मुताबिक़ यह फ़ैसला कुछ पलों की खुशी लेकर आया था.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने बीबीसी को बताया, "उनकी पत्नी अवसाद में चली गई थीं और कहती थीं कि वो मरना चाहती हैं." उसके बाद घरवालों ने सारे कीटनाशक घर से हटा दिए. सभी चाकुओं को छिपा दिया. उनकी सारी दवाओं को आलमारी में बंद कर रखा जाने लगा.
लेकिन इन सब उपायों से कुछ भी हासिल नहीं हुआ. मार्च 2014 में एक दिन लंच करने के बाद सालोमी ने आत्महत्या कर ली. उनकी मौत के बाद कॉलेज पर गुस्सा फूट पड़ा और प्रोफ़ेसर के परिवार की परेशानियों के लिए कॉलेज पर आरोप लगने लगा.
पत्नी की मौत के तीन दिन बाद कॉलेज ने प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को वापस नौकरी पर रख लिया. उस समय उनके रिटारटमेंट में महज़ तीन दिन बचे हुए थे.
हालांकि केरल के स्थानीय कैथोलिक चर्च की तरफ़ से एक चिट्ठी को एक धार्मिक सभा में पढ़ा गया जिसमें लिखा था, "प्रोफ़ेसर जोसेफ़ का सवाल ईशनिंदा और धर्म के अपमान से जुड़ा हुआ था, जिसकी वजह से एक ख़ास धर्म के छात्रों को तकलीफ़ हुई."
इस चिट्ठी में लिखा था. "धर्म सभा ने जनता के दबाव में नहीं बल्कि मानवीय आधार पर दया दिखाते हुए उन्हें वापस नौकरी पर रखा है."

अंतिम दिनों में नौकरी पर रखे गए
अंतिम दिनों में नौकरी पर वापस रख लेने का मतलब था कि प्रोफ़ेसर जोसेफ़ को सारी बक़ाया सैलरी और रिटायरमेंट के बाद की सुविधाएं मिलेंगी. बाद में एक और पादरी की तरफ से प्रोफ़ेसर के समर्थन में बुलेटिन जारी कर कहा गया कि एक घटना की वजह से प्रोफ़ेसर की ज़िदगी नर्क के समान हो गई.
प्रोफ़ेसर कहते हैं, "मैंने एक सिपाही की तरह अपने ऊपर हुए हमले का सामना किया, लेकिन सालोमी की मौत मुझे आज भी तड़पाती है."
अब प्रोफ़ेसर की ज़िंदगी एक पूरा चक्कर लगा चुकी है. वो कहते हैं, "एक लेखक के तौर पर मेरा फिर से जन्म हुआ है." अपने बाएं हाथ से उन्होंने 'ए थाउज़ेंट कट्स' "A Thousand Cuts" नाम से अपनी यादों पर 700 पन्नों की एक किताब लिखी है. यह किताब पिछले साल प्रकाशित हुई है और इसकी 30 हज़ार कॉपी बिक चुकी है.
इसके अलावा उन्होंने 'स्लिमर, मोस्टली सटीरिकल'"slimmer, mostly satirical" नाम से सीक्वल भी प्रकाशित किया है. अब वो छोटी कहानियों की एक किताब लिखने की योजना बना रहे हैं.
अब उनका घर भी बढ़ते परिवार के लिहाज़ से बड़ा हो गया है. रिटायरमेंट के बाद मिले पैसों से उन्होंने इसमें एक और फ्लोर बनवा लिया है. यहीं वो 95 साल की मां और 35 साल के बेटे के साथ रहते हैं. उनका बेटा एक स्टॉक ब्रोकिंग फ़र्म में वित्तीय सलाहकार के तौर पर काम करता है. इसी घर में प्रोफ़ेसर की इंजीनियर बहू और तीन साल का पोता भी रहता है.
वो एक बार आयरलैंड भी जा चुके हैं जहां उनकी बेटी एक नर्स का काम करती है और उसने एक भारतीय नर्स से शादी की है. इन्हें डेढ़ साल का एक बेटा भी है. प्रोफ़ेसर की बहन एक नन हैं और वो अक्सर अपने भाई से मिलने आती हैं. उनपर हुए हमले के वक़्त वो भी कार में ही मौजूद थीं.

अब कैसी है प्रोफ़ेसर जोसेफ़ की ज़िंदगी
आज डेनिम जीन्स के अंदर शर्ट डालकर और चश्मा लगाकर खड़े प्रोफ़ेसर को देखकर नहीं लगता कि वो 64 साल के हैं. न ही उन्हें देखकर लगता है कि एक दशक पहले उनकी ज़िंदगी इतने मुश्किल दौर से गुज़र रही थी. प्रोफ़ेसर के पिता एक किसान थे और मां एक घरेलू महिला. वो एक फ़ुर्तीले इंसान हैं. उनके चेहरे पर साहसिक शांति झलकती है.
प्रोफ़ेसर जोसेफ़ ने बीबीसी को बताया, "मैंने अपने ऊपर हमला करने वालों को माफ़ कर दिया है. वो एक बड़े खेल की एक कठपुतली हैं." प्रोफ़ेसर ने उन पर हमला करने वाले संगठन पीएफ़आई पर प्रतिबंध का भी स्वागत किया है.
लेकिन सुस्त रफ़्तार के चल रही क़ानूनी प्रक्रिया को वो अभी झेल रहे हैं.
वो कहते हैं, "जब भी केस से जुड़े किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जाता है तो मुझे उसकी पहचान करने के लिए जाना होता है. मुझे अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं. मैं एक साल पहले गवाही देने कोर्ट गया था और मुझे हमले से जुड़ी सारी यादों को ताज़ा करना पड़ा था."
बीबीसी ने प्रोफ़ेसर से कोई एक याद साझा करने को कहा तो उन्होंने ख़ामोशी भरे अपने ख़ास अंदाज़ में बताया. वो अपने परिवार के साथ एक बार को केरल में ही कहीं सैर-सपाटे के लिए गए थे. वहां उनकी मुलाक़ात एक छात्र और उनकी आठ साल की बेटी से हुई.
उस छात्र ने अपनी बेटी से कहा, "ये जोसेफ़ सर हैं जिनके साथ एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई थी." उसके बाद बेटी ने पूछा, "क्या ये वो ही हैं जिसका हाथ काटे जाने की ख़बर सुनकर आप चीख-चीख़कर रोने लगे थे?"
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